‘दो रकात के इमाम”do-rakat-ke-imam-book-dr-aslam-qasmi

मज़हबी लिबादे में मलबूस धोके बाज़ों से मुस्लमानों को ख़बरदार करने की कोशिश।

Link > ‘ऊर्दू पुस्तक ”دو رکعت کے امام” Urdu Book unicode link here

लेखक : डाक्टर मुहम्मद असलम क़ासिमी (एम-ए, पी-ऐच-डी)

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क़ौम क्या चीज़ है ? क़ौमों की इमामत किया है ?
इस को क्या समझें ये बेचारे दो रकात के इमाम

पेश लफ़्ज़
ये बात पायाए तहक़ीक़ को पहुंच चुकी है कि मग़रिब की दुनियाए ईसाईयत ने सलीबी जंगों में अहल इस्लाम से पै दरपे शिकस्त खाने के बाद महाज़-ए-जंग तबदील कर के मुस्लमानों की इस मज़हबी ताक़त को ही ख़त्म करना चाहा जो उन की ताक़त का असल सरचश्मा थी ,तहक़ीक़ से पता चलता है कि इस मैदान का पहला शहस राइमनड लल (Raymondlul)नाम का ईसाई मुफ़क्किर थाजिस ने अहल मग़रिब को इस जानिब मुतवज्जा करते हुए कहा कि आओ एक पर अमन सलीबी जंग शुरू की जाये जिसके असलेह ख़ालिस रुहानी हूँ लिहाज़ा उन्होंने अपने यहां मशरिक़ी उलूम के बड़े बड़े इदारे क़ायम किए जहां इस्लामी तालीम के माहिरीन पैदा करके उन्हें इस काम के लिए मुस्लिम ममालिक में भेजा जाता था कि वो मुस्लमानों की सफ़ों में घुस किराम मुस्लमानों से इस्लामी इक़दार का ख़ातमा कर दें उन्होंने इस्लाम और मुस्लमानों को नाक़ाबिल तलाफ़ी नुक़्सान पहुंचाया क्यों कि उनसे मुक़ाबला करना गो कि क़दरे आसान था और उनमें जिन्हों ने सामने आकर मुक़ाबला किया उनको अलिमन इस्लाम ने दंदाँशिकन जवाबात भी दिए लेकिन जो छुप कर मुस्लमानों की सफ़ों में घुसे और मज़हबी पेशवा बन कर मुस्लमानों में इस्लाम की शक्ल में ईसाईयत ,मग़रीबत और यहोदीत बेच गए उनसे मुक़ाबला बहुत मुश्किल था ,फिर उनके जो ख़रीदार हमारे ही दरमयान के अफ़राद हुए जिन्हें इस दौर में उन के स्लीपर सेल्स कहा जा सकता है उनसे मुक़ाबला करना और भी मुश्किल है ,इस के लिए ज़रूरी है कि पहले उनकी पहचान हो ,इस किताबचा में ऐसे धोका बाज़ों को पहचानने की ही कोशिश की गई है ,इस जद्द-ओ-जहद में मुझे कहाँ तक कामयाबी मिल सकी ये बात तो क़ारईन बताईनगे,में सिर्फ इतना कह सकता हूँ कि मैंने ये मुसव्वदा राय जानने के लिए चंद अहबाब को भेजा तो अक्सर ने उसे अपने दिल की आवाज़ कहा इन्हीं में से मेरे एक मुहिब ख़ास करम फ़रमां उमर कैरानवी हैं जिन्हों ने कहा कि मेरे मन की बात छीन ली में तो एक मुद्दत से कहता आ रहा हूँ कि क़ुरआन पढ़ो असल दीन तो क़ुरआन में है ।
मैं इन सभी दोस्तों का शुक्रिया अदा करता हूँ जिन्हों ने मेरी काविश को सराह कर मुझे हौसला बख़्शा ब-तौर-ए-ख़ास मुहम्मद उमर कैरानवी का शुक्रिया जो एक कम्पयूटर एक्सपर्ट होने के साथ साथ माहिर डिज़ाइनर भी हैं और उन्होंने सर-ए-वर्क़ की उम्दा डिज़ाइनिंग कर के इस किताबचे की शक्ल-ओ-सूरत संवारने में भरपूर तआवुन दिया, मेरे मुआविन ख़ास दाई-ए-इस्लाम मुहम्मद जावेद उर्फ़ भूरा,और डाक्टर मौलाना मुहम्मद अख़लाक़ क़ासिमी का भी शुक्रिया जिनमें सानी अलज़कर ने उर्दू ऐडीशन और अव्वल अलज़कर ने हिन्दी ऐडीशन के मुसव्वदे की अर्क़ रेज़ि से प्रफ़ू रीडिंग का काम अंजाम दिया ।

डाक्टर मुहम्मद असलम क़ासिमी ,

रूड़की

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ये दो रकात के इमाम-ए-शहर में चंद मुस्लिम साथीयों ने एक प्राईवेट एन जी ओ के बैनर तले नवंबर २००७ ईःमें ग़रीब ज़रूरतमंदों को चंद एक लिहाफ़ तक़सीम किए जिसके कुछ फोटोग्राफ्स इस ख़ाकसार ने सोशल मीडीया पर पोस्ट कर दिए थे इस पर कमेन्ट कर के किसी साहिब ने पूछा कि पैसा अमरीका से आया था या लंदन से फिर उसी शख़्स का दूसरा कमेन्ट मौसूल हुआ जिसमें पूछा गया था कि काम अमरीका के लिए कर रहे हो या इसराईल के लिए उस के बाद इसी शख़्स ने तीसरे कमेन्ट में कहा कि हम जल्द ही मस्जिद मस्जिद जा कर अवाम को तुम लोगों से होशयार रहने के लिए बेदार करेंगे ,उस शख़्स के इस आख़िरी कमेन्ट से अंदाज़ हुआ कि कमेन्ट करने वाला कोई मज़हबी लाईन का आदमी है तहक़ीक़ से मालूम हो इक्का जनाब किसी मस्जिद में इमाम हैं।

हमारी बद आमालयां

–क़ौमी सतह पर बद आमालीयों की इबतिदा,अख़लाक़ी ज़वाल से होती है ,इस दौर का मुस्लमान बद आमालीयों के आख़िरी पाएदान पर खड़ा है ,वतन-ए-अज़ीज़ की बात करें तो एक जानिब सूरत-ए-हाल ये है कि मुख़ालिफ़ीन इस्लाम और मुस्लमानों को जड़ से उखाड़ फेंकने की ऐलानीया प्लैनिंग कर रहे हैं ,इक़तिदार की कुर्सीयों पर क़ाबिज़ लीडरान और बिरादरान-ए-वतन के मज़हबी रहनुमा बिरादरान वतन में मुस्लिम दुश्मनी को हुआ दे रहे हैं ,मस्जिद के बाहर नमाज़ियों पर हमले से मोप लॉंचिंग तक और लू जिहाद की इल्ज़ाम तराशियों से एक साल में इक्कीस सौ मुस्लिम लड़कीयों को हिंदू लड़कों की बहू बनाने के ऐलान तक और सबसे बढ़कर मलिक का आईन तबदील करके सैकूलर मलिक को हिंदू स्टेट बनाने और दो हज़ार पच्चीस या दो हज़ार पच्चास तक मलिक को मुस्लमानों से ख़ाली कर अलीने की हर्ज़ा सराइयों तक की बातें क्या हमारी आँखें खोलने के लिए काफ़ी नहीं हैं।
माज़ी क़रीब में बर्मा के मुस्लमानों के साथ जो कुछ हवाउस ने वतन-ए-अज़ीज़ के मुस्लिम मुख़ालिफ़ीन के हौसलों को हुआ दी है और वो यहां पर भी बर्मा की तारीख़ दोहराने के इमकानात तलाश करने लगे हैं ज़राए इबलाग़ के उरूज के इस दौर में बहुत कुछ आम हूजा ताहे ,बर्मा में वहां की हुकूमत की सरपरस्ती में अंजाम दी जाने वाली मुस्लिम नसल कुशी के वाक़ियात की ख़बरें बर्मा से बाहर ना जाएं इस पर बर्मा की हुकूमत ने पहरे बिठाए फिर भी सोशल मीडीया वग़ैरा के ज़रीया वहां पर मची तबाही की ख़बरों से दुनिया वाक़िफ़ हो गई ,लेकिन इस नसल कुशी पर दुनियावालों की ख़ामोशी ने जहां मुस्लमानों में मायूसी का माहौल पैदा किया है वहीं मुस्लिम दुश्मनों के हौसलों को बुलंद करने का काम भी किया है ,इस की ताईद में सोशल मीडीया पर वाइरल कुछ वीडीयो क्लिप्स को पेश किया जा सकता है।
एक वीडीयो क्लिप में भगवा पोशाक में मलबूस मज़हबी लीडर दिखने वाला एक शख़्स कह रहा है श्रम आनी चाहीए कि बर्मा एक छोटा सा मुलक है उसने एक झटके में दस लाख मुस्लमानों कुमलक से निकाल बाहर किया है और हमारे लीडर कुछ नहीं कर रहे हैं एक दूसरी वीडीयो क्लिप में कुछ साधू संत मर यदैन को हाथ उठवाकर ये अह्द कराते दिखाई दे रहे हैं कि हम मुल्ला मियाऊं से कोई राबिता नहीं रखेंगे,एक और कल्पि में बिरादरान वतन की आलमी तंज़ीम के सेक्रेटरी कह रहे हैं कि मुस्लमान गुजरात भूल गए तो मुज़फ़्फ़र नगर तो याद होगा एक दीगर वीडीयो में एक लीडर कहता दुख रहा है कि हम दो हज़ार पच्चीस तक मलिक को मुस्लमानों से ख़ाली करा लेंगे ।
और ये ख़बर कि बिरादरान वतन की आलमी तंज़ीम के ज़िम्मेदारों ने एक साल में इक्कीस सौ मुस्लिम लड़कीयों को हिंदू लड़कों की बहू बना ने का निशाना तै किया है ,मलिक के टीवी चैनल्स पर भी चली है और अख़बारात की ज़ीनत भी बनी है ।
ये तो फ़रीक़ मुख़ालिफ़ की सर गरमीयों की एक मामूली झलक थी,मामूली इस लिए कि ये सब वो ख़बरें हैं जो आम हो गईं और हम उनसे वाक़िफ़ हो गए ,ज़ाहिर है कि जो बराबर घात में है वो ख़ामोशी से किया-क्या साज़िशें कर रहा है इस के बारे में सिर्फ अंदाज़ा ही किया जा
सकता है ।
दूसरी जानिब हम मुस्लमान हैं जिनको मिटाकर रिखदीने के लिए दुश्मन तरह तरह के हथकंडे अपना रहा है लेकिन, हम वो क़ौम हैं जो तारीख़ से भी कुछ ना सीख सके क्यों कि हम अपनी तारीख़ भी तो नहीं पढ़ते लिहाज़ा वो सब कुछ करने पर लगे हैं जो इस से पहले भी हो चुका है और पूरी क़ौम उस की सज़ा भगत चुकी है गोया तारीख़ ख़ुद को दोहरा रही है, मशहूर इस्लामी मुअर्रिख़ नसीम हिजाज़ी की ज़बान में कि।
जब इस्लाम दुश्मन तातारी आलम-ए-इस्लाम पर आख़िरी ज़रब लगाने के लिए अपनी तलवारें और नेज़े दरुस्त कर है थे उस वक़्त बग़दाद में इस्लाम के नाम-लेवा सिर्फ ये जानने के लिए बेक़रार थे कि किस फ़िरक़े के अलिमन की ज़बान के नशतर दूसरों की बनिस्बत
ज़्यादा तेज़ और ज़्यादा ज़हर-आलूद हैं। ( आख़िरी चट्टान स ३५७ )
तीन काम, करने के
अगर आप इस बात पर ग़ौर करें कि इस तरह के हालात का मुक़ाबला कैसे किया जाये तो ये बात तस्लीम करनी होगी कि सबसे पहली शर्त ये है कि मुस्लमानों के माबैन इजतिमाईयत और इत्तिहाद पैदा हो,क्यों कि रेशे जब जुदा-जुदा होते हैं तो बहुत कमज़ोर होते हैं और मामूली ताक़त से टूट जाते हैं लेकिन जब मिलकर रस्सी बन जाते हैं तो उन्ही कमज़ोर रेशों को तोड़ना मुश्किल हो जाता है ,इजतिमाईयत होगी तभी तो हम मिल बैठ कर दुश्मन की साज़िशों का तोड़ या उस के हमलों से बचाओ की तदाबीर सोच सकते हैं ,दूसरा काम ये है कि अपने में के इक़तिसादी ,समाजी सयासी और तालीमी तौर पर कमज़ोर लोगों को ताक़तवर बनाने की कोशिश करें ताकि वो अपनी कमज़ोरी के सबब दुश्मन का आसान लुक़मा ना बन सकें ,तीसरा काम जिसका ख़ास ताल्लुक़ हम वतनों से है ये है कहा सलाम और मुस्लमानों के ताल्लुक़ से फैलाई जा रही ग़लत-फ़हमियों के अज़ाले की कोशिश की जाये ,क्यों कि मुस्लमानों के साथ मुल्क भर में जो बेरहमी का सुलूक किया जा रहा है जिसके नतीजे में मोप लॉंचिंग जैसे हादिसात हो रहे हैं इस की बुनियाद ही इस बात पर है कि कुछ मुफ़ाद परस्त फ़िर्क़ा परस्तों ने सयासी फ़ायदे के लिए आम ग़ैर मुस्लिमों के ज़हनों को इस्लाम और मुस्लमान के तईं नफ़रत से भर दिया है जिसकी बुनियाद झूट और बोहतान पर है जैसे ये कि मुस्लमान शिद्दत-पसंद होता है ,वो इस मुल्क में इस्लामी हुकूमत क़ायम करना चाहता है ,वो चार चार बीवीयां रखकर ज़्यादा बच्चे पैदा करता है इस से वो अपनी आबादी बढ़ा कर मुल्क पर अपना ग़लबा चाहता है ,वग़ैरा वग़ैरा ।
ज़ाहिर है कि ये सब बातें बे-बुनियाद हैं और हमें उनकी मुदल्लिल तरदीद करनी चाहीए क्यों कि अवाम के दिमाग़ में बैठी अफ़्वाहें बहुत ख़तरनाक होती हैं जैसे गिरगिट के बारे में अवाम के दरमयान ये बात मशहूर है कि उसे मारना सवाब है तो बस लोग ,खासतौर पर बच्चे उसे जहां पाते हैं मारने दौड़ते हैं उस के पीछे की सच्चाई किया है उसे कोई जानने या समझने की कोशिश नहीं करता जो मुख़्तलिफ़ इलाक़ों में अलग अलग बयान की जाती हैं जब कि सच्च ये है कि उनमें से सब अफ़्वाहें हैं उनका हक़ीक़त से कोई लेना देना नहीं
जब हालात ऐसे होजाएं जैसे इस दौर में ब-तौर-ए-ख़ास वतन-ए-अज़ीज़ में मुस्लमानों के हैं तो क़ौमों की सूरत-ए-हाल क्या होती है उसे मशहूर आलम दीन मौलाना सज्जाद नामानी के अलफ़ाज़ में जे़ल में मुलाहिज़ा फ़रमाएं ,ये इक़तिबास उनकी एक तक़रीर से लिया गया है जो उन्होंने फरवरी २०१८-ए-में महाराष्ट्र के शहर अहमद नगर में की थी और इस का मतन माहनामा अलफ़रक़ान में शाय भी हुआ था ।
ये हमारी तारीख़ का इक्का हम मरहला है, अगर उस वक़्त क़ौम को दूसरी हिक्मत-ए-अमली की तरफ़
नहीं ले जाया गया तो क़ौम हार मान जाएगी, शिकस्त खा जाएगी, और इस के बाद फिर क़ौमों का उठना बहुत मुश्किल होता है, क़ौम अगर हार मान जाये और अंदर से टूट जाये, तो फिर उस क़ौम में इर्तिदाद और बग़ावत फैलने के इमकानात बहुत बढ़ जाते
हैं, मायूसी इर्तिदाद तक और ग़ुस्सा दहश्तगर्दी तक ले जाता है,यही वजह है कि क़ुरआन ने कहा:कि …….. ख़ुदा की रहमत से काफ़िर ही मायूस होते हैं यानी मायूसी कुफ़्र-ओ-इर्तिदाद तक ले जाती है और ले जा रही है।तवज्जा से सुनिए! में ये नहीं कि रहा हूँ कि ले
जाएगी, में कि रहा हूँ मायूसी कुफ़्र तक ले जा रही है।हमें पता नहीं कि अब मुस्लमान जिए श्री राम के नारे लगाने में फ़ख़र महसूस कर रहा है, पांचसौ रोपीए में ईमान बेचा जा रहा है दूसरी तरफ़ जो ग़ुस्सा और फ़रस्ट्रेशन है वो ले जाता है इस तरफ़ जिसको
आजकल की इस्तिलाह में दहश्तगर्दी कहते हैं और ये दोनों रास्ते हलाकत के हैं फ़ाज़िल मुक़र्रर ने जिस इर्तिदाद की बात की उसे आज हम अपनी आँखों से देख रहे हैं बी-बी सी न्यूज़ सर्विस की ख़बर के मुताबिक़ ४जुलाई २०१७ ईः-ए-को झारखंड के शहर बेगूसराय में अनवर नाम के एक मुस्लमान नाम बदल कर आनंद भारती बन गए उन्होंने अपने दो बेटों आमिर और समीर को भी अमन भारती और सुमन भारती बना लिया ,उन्होंने उस का हलफ़नामा भी अदालत में पेश किया और शहर के बिशम्बर मंदिर में जाकर अपने हिंदू बनने का ऐलान भी किया ।
दूसरी दिल दहला देने वाली ख़बर महाराष्ट्र से आई जहां एक आर टी आई से पता चला कि गुज़श्ता चार सालों में पूरे महाराष्ट्र से २६३मुस्लमानों ने इस्लाम छोड़कर हिंदू बन जाने का सरकारी तौर पर ऐलान किया ,ये ख़बर दिल्ली से शाय होने वाले हिन्दी हफ़तरोज़ा अख़बार कांति के ४ता ८ फरवरी २०१८ ईः-ए-के शुमारे में शाय हुई ।
आज़ादी से पहले मुबय्यना तौर पर मुस्लमानों को मुर्तद करने की तहरीक शुधी तहरीकके नाम से शुरू हुई थी जिसे उस वक़्त ख़ातिर-ख़्वाह कामयाबी ना मिल सकी ,लेकिन इस वक़्त हालात ऐसे क्यों पैदा हो गए कि हम मज़कूरा किस्म की ख़बरें सुनने को मजबूर हैं इस पर ग़ौर करने की ज़रूरत है।
पुख़्ता ईमान रखने वाला मुस्लमान कभी इस तरह की साज़िशों का शिकार नहीं हो सकता मगर दबे कुचले कमज़ोर ,ग़रीब और नादार अफ़राद को शैतानी ताक़तें अपना लुक़मा बना लेती हैं इस की ज़िम्मेदारी इन मुस्लमानों पर है जो कमज़ोरों और ग़रीबों की सिद्ध नहीं लेते और उन्हें शैतान का आसान शिकार बनने के लिए बे-यार वमदद गार छोड़े रखते हैं ।
ऐसे हालात में अगर हमको इस मुल्क में इज़्ज़त-ओ-ओ- क़ार के साथ ज़िंदा रहना है तो मज़कूरा बाला तीन काम करने इंतिहाई ज़रूरी हैं, वाज़िह हो कि ये तीनों काम क़ुरआन-ए-करीम की तालीम से अख़ज़ किए गए हैं , अगली चंद सुतूर में करानी तालीमात की रोशनी में मज़कूरा तीनों अमोरकी मज़ीद वज़ाहत पेश है ।

उम का जायज़ा और आगे का लायेहा-ए-अमल तै किया जाये , और ये भी तै पाया कि शुरका में से हर एक हर हफ़्ते हसब-ए-इस्तिताअत कुछ ना कुछ रक़म भी जमा करे जिससे हत्तलमक़दूर किसी हद तक ग़रीबों की मदद की जा सके ,शुरू में हमने जिस लिहाफ़ तक़सीम प्रोग्राम का ज़िक्र क्या वो इसी के तहत अंजाम दिया गया था ,जिस पर एक मस्जिद के इमाम साहिब इस क़दर भड़के कि उन्हें इस काम में मुस्लिम दुश्मनों की साज़िश नज़र आने लगी ।
उम्मत दो रकात के इमामों के नर्ग़े में
इस वक़्त पूरी उम्मत अल्लामा इक़बाल की ख़ास इस्तिलाह दो रकात के इमाम के नर्ग़े में है जो नहीं चाहते कि समाज में इस्लामी तालीमात पर इस तरह का अमल हो कि कुछ तबदीली आजाए ,वो बस इसी क़दर का काम चाहते हैं जिससे उनकी रोज़ी रोटी चलती रहे ,इस लिए चाहे आप क़ुरआन हाथ में लिए उन्हें ये बताते फिर जाएं कि देखो में जो कुछ कर रहा हूँ उस का हुक्म क़ुरआन-ए-करीम की इस और इस आयत में है फिर भी वो ये मानने को तैयार नहीं होंगे कि उनके इलावा कोई और भी देन का काम कर सकता है ,क्यों कि हिन्दुओं के ब्रह्मणों की तरह मुस्लिम समाज में भी उनका इजारा जो क़ायम हो चुका है ।
दो रकात के इमामों ने डुबोया मिल्लत का सफ़ीना
इन ही दो रकात के इमामों ने मिल्लत का सफ़ीना डुबोया है ,इस से इनकार नहीं किया जा सकता कि जब से मुल्तान के सकनजे में आई है तब से वो ज़वाल-ओ-इन्हितात का शिकार है , उन्होंने उम्मत को इस मुक़ाम पर ला खड़ा किया कि अब उस के उभर ने की दूर दूर तक कोई शक्ल नज़र नहीं आती,एक दौर था जब उम्मत मुस्लिमा बला शिरकत-ए-ग़ैरे दुनिया की सुपर पावर थी और एक तवील अह्द ऐसा गुज़रा है जब उसने अक़्वाम आलम की इमामत के फ़राइज़ अंजाम दिए हैं दुश्मन ने इस की ताक़त को तोड़ने की बहुत कोशिश की लेकिन वो उस वक़्त तक कामयाब ना हो सका जब तक वोदोरकात का इमाम बन कर ना सिर्फ हमारी सफ़ों में दाख़िल हो गया बल्कि हमारा पेशवा और राहनुमा बन बैठा और हम इसी दुश्मन के पीछे हाथ बाँधे खड़े रहे , इस तरह की मज़हबी क़ियादत ने ही मिल्लत का बीड़ा ग़र्क़ किया है ,शायद बहुतों को ये सच्च कड़वा लगे लेकिन ये सच्च वाक़ई सच्च है और ये सिर्फ़ मेरा ही दावा नहीं है बल्कि मिल्लत के मुफ़क्किर आज़म शयर-ए-मशरिक़ अल्लामा इक़बाल ने बड़ी वज़ाहत के साथ उसे अपने एक शेअर में यूं कहा है कि ।

ना जाने ,कितने सफ़ीने ,डुबो चुकी, अब तक
फ़क़ीह-ओ-सूफ़ी-ओ-मिला की ना ख़ुश अंदेशी

बात कड़वी है मगर सच्च है जिसके तारीख़ी सबूत मौजूद हैं ,आईए तारीख़ी सबूतों के साथ में ये दावा आपके सामने रखता हूँ, कोई मामूली इलम रखने वाला भी अज़ ख़ुद तारीख़ के सफ़हात से इस दावे की तसदीक़ कर सकता है ।
मिल्लत इस्लामीया ने अपनी तशकील के वक़्त से कम-ओ-बेश एक हज़ार साल तक इस दुनिया में सुपर पावर का रोल अदा क्या, उस की ज़बानें अरबी और फ़ारसी को इंटरनैशनल ज़बानें तस्लीम किया जाता था ,उनके उलूम का ही दुनिया में चर्चा था दुनिया के किसी भी कोने से अगर कोई इलम की प्यास बुझाने उठता तो वो मुस्लमानों के क़ायम करदा इलमी इदारों का ही रख करता था ,वो ही दुनिया की सबसे बड़ी अस्करी ताक़त थे जिसके नतीजे में पूरी दुनिया उनके सामने ना सिर्फ सर निगों थी बल्कि उन्हें ख़राज भी अदा किया करती थी ,चुनांचे अब्बासी ख़लीफ़ा हारून रशीद के वो अलफ़ाज़ जो उसने एक चलते हुए बादल के टुकड़े को देखकर कहे थे कि तो चाहे जहां जा के बरस ,तेरे बरसने से ज़मीन में जो कुछ भी पैदा होगा उस का ख़राज मेरे ही पास आना है ,तारीख़ के सफ़हात में दर्ज हैं ,मगर शैतान भी ताक में था जो अज़ल में ही अल्लाह के हुज़ूर ये चैलेंज कर के आया था कि मैं तेरे उन बंदों को गुमराह करने की कोशिशों में कोई कसर उठा ना रखूँगा ( क़ुरआन सूरा हिज्र ३९ /सूरा स ८२)बिलआख़िर उसने दो रकात का इमाम बन कर कम-अज़-कम तीन मौक़ों पर मिल्लत को ऐसी ज़रब लगाई है कि इस का शीराज़ा ही नहीं बिखरा बल्कि लुटिया ही डूब गई लुटिया भी ऐसी डूबी कि मिल्लत मिल्लत ना रही ,अब हमें जो कुछ नज़र आरहा है वो मिल्लत नहीं बल्कि किसी बड़ी शए के डूबने के बाद डूबने की जगह सतह समुंद्र पर जो झाग नज़र आते हैं महिज़ वो झाग बाक़ी हैं ,ये एक तल्ख़ हक़ीक़त है आप चाहें तो कहने वाले को गालियां दे लें ,इस सच्चाई को तस्लीम करने से इनकार कर दें लेकिन इस से तारीख़ी सच्चाई पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।

मिल्लत की तबाही के तीन मवाक़े

अपने इस दावे पर मैं तारीख़ से तीन मवाक़े की निशानदेही करूँगा जो एक ज़ी-शुऊर और ग़ैर जानिबदार इन्सान से ये तस्लीम करवाने के लिए काफ़ी है कि कहने वाले की बात में दम है लेकिन इस से पहले ये अर्ज़ करना भी ज़रूरी समझता हूँ कि जिन दोरकात के इमामों ने मिल्लत का सफ़ीना डुबोया है उनसे ये उम्मीद रखना कि वो मिल्लत के डूबे हुए सफ़ीने को निकाल लाएँगे या निकालने की फ़िक्र वकोशश करेंगे अक्लमंदी नहीं है हाँ कुछ उम्मीद है तो उन ग़ैर जानिबदार फ़िक्र के हामिल नौजवानों से है जो सर में ग़ौर वफ़कर करने वाला दिमाग़ और सीने में मिल्लत के लिए तड़पने वाला दिल रखते हैं ,वो अल्लाह की इस किताब(क़ुरआन-ए-करीम ) को पढ़ें और समझें जिसके समझने पर आम आदमी के लिए इन दो रकात के इमामों ने इस लिए क़दग़न लगा रखा है कि कहीं आम आदमी हक़ीक़ी दीन से वाक़िफ़ हो कर उनके चंगुल से ना निकल जाएं और ख़ुद फ़ैसला करलीं ,क्यों कि क़ुरआन दुश्मनों की दस्त-ओ-बुरद से महफ़ूज़ है और इस की तो हिफ़ाज़त का ज़िम्मा ही ख़ुद परवरदिगार ने लिया है ।
अब तारीख़ के इन तीन मवाक़े का ज़िक्र किया जाता है कि जिन मौक़ों पर दो रकात के इमामों ने मिल्लत का सफ़ीना डुबोया है जिनका ज़िक्र शयर-ए-मशरिक़ अल्लामा इक़बाल ने मज़कूरा शेअर ( ना जाने कितने सफ़ीने डुबो चुकी अब तक । फ़क़ीह-ओ-सूफ़ी-ओ-मिला की ना ख़ुश अंदेशी) में किया है।
ये एक मुस्लिमा हक़ीक़त है कि दौर-ए-हाज़िर में मग़रिब की ईसाई दुनिया को इस कायनात में सुपर पावर होने का एज़ाज़ हासिल है ,इलमी ,इक़तिसादी और अस्करी तीनों ताक़तें इन ही के पास हैं( और यही तीनों ताक़तें वो हैं जो किसी क़ौम को सुपर पावर बनाती हैं) इसी तरह ये भी एक तस्लीम शूदा हक़ीक़त है जिसे दोस्त दुश्मन सब तस्लीम करते हैं कि ईसाई दुनिया से पहले मुस्लिम दुनिया उस काइनात-ए-रंग-ओ-बू में सुपर पार थी ,उन्हीं का इलम इलम था उन्हीं की ज़बान अरबी इंटरनैशनल ज़बान थी दुनिया में उन्हें का वर्ल्ड आर्डर चलता था ,वो ही दुनिया की सबसे बड़ी अस्करी ताक़त थे ,दुनिया की इक़तिसादीयात पर भी उन्हें का क़बज़ा था ,उनके हाथों से इस तमगे को छीन कर उसे मग़रिब की ईसाई दुनिया के हाथों में थमाने का काम उन्हें दो रकात के इमामों ने किया है ,ये महिज़ इल्ज़ाम नहीं बल्कि तारीख़ी हक़ीक़त है उसे कोई तस्लीम नहीं करता है तोना करे उस की सच्चाई पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़े गा और ये सच्च सच्च ही रहेगा,ये कड़वा सच्च तारीख़ की किताबों में इस क़दर वाज़िह लफ़्ज़ों में दर्ज है कि कोई आँखें बंद कर के भी इस के दिखाई ना देने का बहाना नहीं कर सकता ।
पहला मौक़ा
१४५० ईः -ए-में यूरोप के मलिक जर्मनी में प्रैस (छापाख़ाना ) की ईजाद हुई तो दो रकात के इमामों ने उसे इजाद-ए-कुफ़्फ़ार कह कर मुस्लिम दुनिया में हराम क़रार देते हुए इस पर पाबंदी लगादी ,ये दौर वो था जब किताबें जो इलम की इशाअत के लिए बुनियाद का पत्थर हैं ,महिज़ मख़तूतात (हाथ से लिखे हुए मुसव्वदे) की शक्ल में शाही कुतुब ख़ानों या कुछ मख़सूस इलमी शख़्सियात के पास ही मौजूद होती थीं और आम आदमी की इन तक पहुंच ना-मुम्किनात में से थी ,यूरोप में प्रैस की ईजाद और मुस्लिम दुनिया में इस पर पाबंदी से ये हुआ कि एक जानिब यानी मुस्लिम दुनिया में तो सूरत-ए-हाल वैसी की वैसी ही रही जबकि दूसरी जानिब यानी ईसाई दुनिया में और इस के साथ साथ दुनिया की दीगर अक़्वाम में भी किताबें छापे ख़ानों में छिप-छुप कर आम से आम आदमी के हाथों में सस्ते दामों पहुंचने लगी,ये इलमी ख़ज़ाना वही होता था जिसे अहल यूरोप मुस्लमानों से सीखते थे जिसे बग़दाद और क़ुर्तुबा के इलमी इदारों में दो ज़ानूँ हो कर ईसाई और यहूदी तिश्नगान उलूम ने हासिल किया था ,ये वही सूरत-ए-हाल थी जिसका तसव्वुर इक़बाल जैसे शायर को तड़पा कर रख देता है और वो उसे यूं शेअर में ढाल देते हैं।

वो इलम के मोती किताबें अपने आबा-ए-की
जो देखा उनको यूरोप में तो दिल होता है सीपारा

एक हज़ार सफ़हात की एक किताब को हाथ से लिखने या उस की नक़ल तैयार करने में एक मेहनती से मेहनती इन्सान के भी आठ दस महीने ज़रूर सिर्फ़ होंगे जब कि इसी ज़ख़ामत की एक हज़ार किताबें प्रैस में एक या दो घंटों में छापी जा सकती हैं ।
दो रकात के इमामों के इस एक फ़तवे का असर ये हुआ कि यूरोप की ईसाई दुनिया के घर-घर में इलम के चर्चे होने लगे मामूली से मामूली इन्सान के घर में किताबों की शक्ल में इलमी ख़ज़ानों का ढेर लगने लगा ,बल्कि बड़े बड़े मुस्लिम दानिशवरों ,फ़नकारों और इलमी शख़्सियात के हाथों के लिखे मख़तोते जो मख़सूस घरों में या दूर दराज़ की लाइब्रेरीयों में इलमी शाहकार की शक्लों में मौजूद थे और चंद मख़सूस हाथ ही इन तक पहुंचते थे, उन्हें यूरोप के ईसाई और यहूदी अलिमन ने प्रैस में छाप छाप आम कर दिया हत्ता कि आज ये बात मुस्लिम उल्मा भी तस्लीम करते हैं कि इब्न-ए-बतूता ,इबन जुबैर ,इसहाक़ बिन हनीन ,अलकिंदी , इबन रुशदावरा बिन ख़ुलद वन जैसे कितने ही मुस्लिम अलमणकी मारकৃालारी तसानीफ़ को अगर यूरोप के यहूदी और ईसाई अलिमन अपने छापे ख़ानों में छाप कर आम ना करते तो मुस्लिम दुनिया भी उनसे वाक़फ़ीयत हासिल ना कर पाती ।
यूरोप के यहूदी और ईसाई अलिमन ने सिर्फ यही नहीं किया बल्कि मुस्लिम दुनिया की इलमी शख़्सियात के इलमी कारनामों को यहां तक कि मुस्लमानों की बड़ी बड़ी मज़हबी किताबों को अरबी में भी और उनका तर्जुमा कर के अपनी ज़बानों में भी ख़ूब छापा और घर-घर पहुंचाया ,ख़ुद पढ़ा और दूसरों को पढ़वाया और उनमें जहां-जहां चाहा अपने मतलब का हज़फ़-ओ-इज़ाफ़ा भी किया चुनांचे ये तारीख़ के सफ़हात में दर्ज है कि हदीस की मशहूर मारूफ़ किताबें बुख़ारी,मौतिन इमाम अहमद इबन हनबल और तारीख़ तबरी और उन जैसी कितनी ही किताबें अज़ ख़ुद ऑडिट कर के यूरोप के ईसाई और यहूदी अलिमन ने शाय कीं ,तफ़सील के लिए देखें।
इस्लाम और मुस्तश्रिक़ीन जलद अव्वल-ओ-दोयम, अज़। सय्यद सबाह उद्दीन ,
मतबूआ। शिबली अकैडमी, आज़म गढ
ये था वो पहला मौक़ा जिसमें दो रकात के इमामों के एक फ़तवे ने इलम की दौलत मुस्लमानों के हाथों से निकाल कर ग़ैर मुस्लिम दुनिया में मुंतक़िल कर दी और ये सूरत-ए-हाल कम-ओ-बेश ढाई सौ साल रही जिसने इलम के मैदान में मिल्लत का सफ़ीना पूरी तरह ग़र्क़ कर दिया और यूरोप के ईसाईयों और यहूदीयों को इलम की दौलत से माला-माल कर दिया और वहां का आम से आम इन्सान आलिम फ़ाज़िल मुहक़्क़िक़ और मूजिद बनने लगा ,लिहाज़ा आज हम तारीख़ में पढ़ते हैं कि वो बहुत से अफ़राद जिन्हों ने इन्सानी दुनिया को ज़िंदगी की काया पलट देने वाली ईजादात से नवाज़ा उनमें से कोई एक मामूली बढ़ई का लड़का था और कोई किसी कबाड़ी की औलाद था जो रद्दी में आने वाली फटी पुरानी किताबें उठा कर पढ़ता था तो कोई मामूली किसान का लड़का था जो किताबें किराए पर ला कर उनका मुताला करने का शौक़ीन था ,वग़ैरा वग़ैरा ।
ये था वो पहला मौक़ा जिसने सूरत-ए-हाल को एक दम उलट के रखदया था और इलमी खज़ाने को एक क़ौम के हाथों से छीन कर दूसरी क़ौम के हाथों में थमा दिया था जिसकी वजह दोरकात के इमामों का सिर्फ एक फ़तवा था जिसकी बिना पर आलम-ए-इस्लाम में लग भग ढाई सौ सालों तक छापेखाने पर मज़हबी पाबंदी आइद रही ,अठारवीं सदी में एक नौ मुस्लिम जर्मन ने फिर से तुर्की के शहर इस्तंबोल में छापाख़ाना क़ायम करने की कोशिश की तो वहां के मुफ़्तई आज़म ने इस शर्त पर इस को इजाज़त दी थी कि इस में क़ुरआन-ए-मजीद और दीनी किताबें ना छापी जाएं । देखें ।
मिल्लत-ए-इस्लामीया की मुख़्तसर तारीख़ अज़ ।सर्वत सौलत ,जलद दोयम ,स ४४४,मतबूआ,मर्कज़ी मकतबा इस्लामी,दिल्ली
दूसरा मौक़ा
इलमी ताक़त के ज़ाइल हो जाने के बाद मुस्लमानों की अस्करी और फ़ौजी ताक़त को तोड़ने का नंबर था जिसके लिए दुश्मन ने पूरी तैयारी कर ली थी ईसाई दुनिया में इलम का दरयाए आम बह जाने के नतीजे में तरह तरह की ईजादात सामने आने लगी थीं ,बारूद तो मुस्लमानों की ईजाद थी और इस का तोप में पहला इस्तिमाल भी मुग़ल हुक्मराँ बाबर ने किया था लेकिन इस को छोटे और आम हथियार की शक्ल देकर हर एक फ़ौजी को इस से मुसल्लह कर देने का काम सबसे पहले ईसाई दुनिया में हुआ जिसे संगीन या बंदूक़ का नाम दिया गया और एक मौक़ा वो आया जब आम सिपाही को तलवार की जगह बंदूक़ से मसला किया जाने लगाबस ये सबसे अच्छा मौक़ा था मुस्लमानों की अस्करी ताक़त को ख़त्म करने का लिहाज़ा दो रकात के इमामों ने फ़तवा दिया कि मैदान-ए-जंग में बंदूक़ और संगीन का इस्तिमाल हराम है क्यों कि हमारे आबणो अज्दाद ने तीर-ओ-तलवार से जंग की है इस लिए सिर्फ उन्हीं रिवायती हथियारों का इस्तिमाल जायज़ है इस के इलावा इन तमाम फ़ौजी इस्लाहात को नाजायज़ क़रार दिया जो वक़्त की तबदीली के साथ साथ ज़रूरी समझी जाती थीं जैसे फ़ौजीयों के लिए चुस्त लिबास और सर पर हैट वग़ैरा , (हवाला ,मज़कूर स ४४८)
ये दौर वो था जब मुस्लिम दुनिया की क़ियादत तुर्की के हाथों में थी ,वही तुर्की जिसने क़ुस्तुनतुनिया को फ़तह कर के ईसाईयों के इस मिथ को चकना-चूर कर दिया था कि पोप आज़म की रुहानी ताक़त को दुनिया की कोई अस्करी ताक़त ज़ेर नहीं कर सकती वो तुर्की जिसकी अस्करी ताक़त के आगे यूरोप थर्रा ताथा जो पूरी दुनिया में सबसे बड़ी अस्करी ताक़त होने के सबब मुस्लमानों की अज़मत का निशान था और पूरी उम्मत मुस्लिमा के लिए ढाल का काम भी करता था दूर कात के इमामों के एक फ़तवे ने इस की तमाम फ़ौजी-ओ-अस्करी ताक़त को चकना-चूर कर के रख दिया नतीजा ये हुआ कि जो कभी दुनिया की सबसे बड़ी फ़ौजी ताक़त थी उसे यूरोप का मर्द बीमार कहा जाने लगा अब यूरोप की ईसाई दुनिया के लिए अच्छा मौक़ा था जो पाँच सौ साल तक सलीबी जंगों में मुस्लमानों का बाल बांका ना कर सके थे जो मुस्लमानों से मज़हब के नाम पर जंगें लड़ते लड़ते थक-हार कर बैठ गए थे उन्होंने पहली जंग-ए-अज़ीम में तुर्की ख़िलाफ़त को तहस नहस कर के रख दिया तमाम ईसाई ममालिक तो उस के हाथ से निकाले ही, उस की दस्त-ए-निगर के मुस्लिम ममालिक पर भी क़बज़ा कर के उन्हें भी आपस में तक़सीम कर लिया ,इस बंदरबांट में मुस्लिम ममालिक की सरहदें तक उन्होंने अपनी मर्ज़ी से तै कीं और इस तरह पूरे आलम-ए-इस्लाम के हिस्से बख़रे कर के उसे कमज़ोर कर दिया ,तुर्की भी हाथ से चला जाता अगर उस वक़्त का तुर्की फ़ौज का आला कमाँ-दार मुस्तफ़ा कमाल अतातुर्क प्रवानए- हज़ीमत पर दस्तख़त करने वाले ख़लीफ़ए- वक़्त और यूरोप के इत्तिहादियों से बग़ावत करके तुर्की को बचाने की कोशिश ना करता ,मुस्तफ़ा कमाल अतातुर्क जिसे आज यहूदी की औलाद ,फ़ासिक़ ,फ़ाजिर और मुनाफ़िक़ क़रार दिया जाता है उसने अपनी तग-ओ-दो से तुर्की तो बचा लिया लेकिन वो इस्लाम की नेअमत उज़्मा से महरूम हो गया क्यों कि दो रकात के इमामों के रवैय्ये ने इस के ज़हन में ये बात बैठा देती थी कि जो मज़हब अपनी मिल्लत को मज़बूत नहीं कमज़ोर करे और अपने आमाल से दुश्मनों के लिए आसानीयां फ़राहम करते हुए मिल्लत को उनके लिए आसान लुक़मा बना कर पेश कर दे वो मज़हब किसी काम का नहीं ,नतीजा ये हुआ कि वो मज़हब बेज़ार और इस्लाम बेज़ार हो गया ,मस्जिदें बंद कर दी गईं, मदरसों पर ताले डाल दिए गए ,नमाज़ पर पाबंदी लगा दी गई ,और वो फ़ौजी जो सुबह शाम क़ुरआन-ए-करीम की तिलावत किया करते थे उन्होंने क़ुरआन के औराक़ फाड़ फाड़ कर ,अलईआज़ बिल्लाह क़ुरआन को क़दमों के नीचे रौंदा ,ये दो रकात के इमाम वो हैं जिन्हों ने कभी हाथ की घड़ी को नाजायज़ कहा कभी रेडीयो सुनने को हराम क़रार दिया कभी माईक (लाऊड स्पीकर )के ख़िलाफ़ फ़तवे दिए और आज वो ख़ुद उन एशियन का भरपूर इस्तिमाल करते हैं, इन इश्याय को हराम क़रार देने के बाद वो फिर कब और कैसे हलाल हो गईं उस का किसी को कुछ पता नहीं ।
तीसरा मौक़ा
तीसरा और आख़िरी मौक़ा जिसने मिल्लत का तिया पानचा कर के इस के शीराज़े को ऐसा मुंतशिर किया कि इस का वजूद ही ख़त्म हो गया और इस मौक़ा पर मिल्लत का सफ़ीना ऐसा डूबा कि इस के बाद मिल्लत का कहीं इत्ता पता नहीं है ,इस मौक़ा को आप भी तारीख़ के औराक़ में तलाश कीजिए आप ख़ुद तस्लीम कर लेंगे बशर्तिके ग़ैर जानिब दारी का लिबास ज़ेब-ए-तन कर के समुंद्र की लहरों की ज़िद से निकल कर साहिल पर आजाऐं ।
ये कौन सा मौक़ा है ? जब हम उसे इस्लामी तारीख़ में तलाश करते हैं तो हमें पता चलता है कि वतन-ए-अज़ीज़ में अमीर ख़ुसरो तक एक तरह का इस्लाम था ना तो उम्मत में शीया ,सुनीत की असबीयत थी ,ना देवबंदी बरेलवी, अहल-ए-हदीस-ओ-ग़ैर मुक़ल्लिद और सलफ़ी ख़लफ़ी के झगड़े थे ,लेकिन शाह वली अल्लाह तक आते आते बेहतर ७२तरह का इस्लाम हो गया और ये हदीस बच्चे बच्चे को याद करा दी गई कि उम्मत में तहत्तर फ़िरक़े तो होने ही होने हैं जबकि ये किसी को ना बताया कि अल्लाह ने क़ुरआन-ए-करीम में ये हुक्म दिया है कि मुस्लमान फ़िर्क़ों में ना बटीं और सब के सब सिर्फ़ मुस्लमान रह कर अल्लाह की रस्सी को मज़बूती से थामे रहें वाअतसमवा बहुबल अल्लाह जमीआ-ओ-ला तफ़र्रुक़वा ( सूरा आल-ए-इमरान १०३ )मुस्लमानों को फ़िर्क़ों में बांटने का काम सिर्फ और सिर्फ उन ही दो रकात के इमामों का है , अगर मुख़लिस अलिमन किराम आज भी मिल्लत के मुंतशिर शीराज़े को मुत्तहिद कर ना चाहें तो इस का तिरयाक़ क़ुरआन की सूरत में आज भी उनके पास मौजूद है ।
एक हदीस है जो इस तरह है कि अल्लाह के रसूल ने फ़रमाया कि बनीइसराईल में बेहतर फ़िरक़े थे लेकिन मेरी उम्मत में तहत्तर फ़िरक़े हो जाएंगे लेकिन हक़ पर वो होगा जिस पर में और मेरे अस्हाब हैं
पहली बात तो ये कि ये हदीस है ,क़ुरआन नहीं है और उसूल ये है कि अगर कोई हदीस क़ुरआन के वाज़िह हुक्म से टकरा रही है तो ऊला अलिमन की ज़िम्मेदारी ये है कि इस की ऐसी तावील की जाये जिससे दोनों मुंतबिक़ हो जाएं और अगर ऐसी कोई सूरत ना निकल पाए तो हदीस को छोड़ क़ुरआन के हुक्म को लिया जाये,लेकिन यहां उल्टा हुआ है ,ऐसा लगता है कि किसी ने घर-घर जा कर मुस्लमानों के एक एक फ़र्द को ये बात याद करा दी है कि मुस्लमानों में तहत्तर फ़िरक़े होने ही होने हैं जबकि क़ुरआन का वाज़िह हुक्म लातफ़रक़वा(फ़र्र को मैं ना बिट्टू) किसी को ना बताया बल्कि मज़ीद ये भी कि कोई ख़ुद क़ुरआन पढ़ कर हक़ीक़त को ना समझ ले उस का इंतिज़ाम करते हुए अवाम एलिनास को क़ुरआन-ए-करीम के मफ़हूम वमतालब से हटा कर सिर्फ और सिर्फ तिलावत पर लगा दिया नतीजा ये हुआ कि क़ुरआन-ए-करीम के वाज़िह अहकामात की तिलावत करने वाला भी एक कलिमागो को काफ़िर और जहन्नुमी और ख़ुद कूजनती क़रार दे रहा है जबकि जन्नत-ओ-जहन्नुम पर इस का कोई बस नहीं वो ख़ालिस अल्लाह के क़बज़ए- क़ुदरत की चीज़ है, वो जिसे चाहे दे और जिसे चाहे ना दे।
क़ुरआन में है या अहा अलज़-ए-अआमनवाअतीअऊओ उल़्ला ऊओली अलामर-ए-मिनकुम (सूरा न्सन५९ ) ए ईमान वालों अल्लाह की इताअत करो और अल्लाह के रसूल की और अपने में से साहिब राय लोगों की ।
क़ुरआन-ए-करीम के इस क़ानून के तहत सबसे पहले कोई भी हुक्म क़ुरआन में देखा जाएगा अगर वहां कोई वाज़िह हिदायत मौजूद हो तो बस है फिर किसी चीज़ की ज़रूरत नहीं और रसूल के अहकामात (अहादीस) में अगर उस की ताईद में कुछ है तो सोने पे सुहागा, लेकिन अगर उस के ख़िलाफ़ कोई चीज़ नज़र आए तो ऊला उस की ऐसी तावील की जाएगी कि वो क़ुरआन से मुंतबिक़ हो जाये वर्ना उसे छोड़ दिया जाएगा क्यों कि वो क़ुरआन की मानिंद अल्लाह का कलाम नहीं है, और अगर कोई मुआमला ऐसा दर पेश हो जाये कि दोनों मुक़ामात पर कोई वाज़िह हुक्म ना हो तो उम्मत के साहिब फ़हम उल्मा से रुजू किया जाये।
लेकिन इस मुआमले में यानी उम्मत में गिरोहबंदी और फ़िर्काबंदी के मुआमले में तो क़ुरआन-ए-करीम में वाज़िह हुक्म मौजूद था बल्कि क़ुरआन में ये वार्निंग भी मौजूद थी कि अगर मुस्लमान ही मुस्लमान से झगड़ेगा तो तुम्हारी हुआ उखड़ जाएगी और तुम बुज़दिल हो जाओगे (सूरा इन्फ़ाल आयत ४६) क़ुरआन-ए-करीम के इस वाज़िह हुक्म के बाद किसी और शए की ज़रूरत ही कहाँ बाक़ी रह जाती है लेकिन अगर कोई ये तै कर बैठे कि उम्मत के हिस्से बख़रे कर के इस की ताक़त को तोड़ करहि दम लेना है और फिर वो क़ुरआन-ए-करीम को जो शरीयत की अस्लुलउसूल है इस की चंद
आयात को छोड़कर लाखों की तादाद में मौजूद अहादीस के समुंद्र में ग़ोता जा लगाए तो ये तो ऐसा समुंद्र है कि इस में सब के मतलब की बातें मिल जाती हैं क्यों कि ये अल्लाह का कलाम नहीं है ना ही अल्लाह ने क़ुरआन की मानिंद उस की हिफ़ाज़त का ज़िम्मा लिया है, कहा जाता है कि मुहद्दिस आज़म इमाम बुख़ारी को आठ लाख अहादीस ज़बानी याद थीं, उन्होंने छान पटख़ कर चंद हज़ार को ही अपनी किताब में शामिल किया फिर भी बाद के उल्मा कहते हैं कि कम अज़ कम छः अहादीस इस हतयात के बाद भी उनकी किताब में नक़ली और मौज़ू दर्ज हो गई ,लिहाज़ा लाख एहतियात के बाद भी अहादीस की मोतबरीयत क़ुरआन के दर्जे को नहीं पहुंच सकती।
अहादीस की ज़रूरत से इनकार नहीं है बल्कि अहादीस शरीयत का बुनियादी रुकन हैं बहुत से उमूर ऐसे हैं जो महिज़ अहादीस पर ही मौक़ूफ़ हैं जैसे नमाज़ का तरीक़ा और इस की रकातों की तादाद वग़ैरा ,जिन उमूर की रहनुमाई क़ुरआन में नहीं है यक़ीनन उन में अहादीस से मालूमात हासिल की जाएगी ,लेकिन जिसका वाज़िह हुक्म क़ुरआन में मौजूद हवउसे छोड़ देना बल्कि उसे छिपा देना और इस के ख़िलाफ़ हदीस निकाल लाना और उसे इतनी तशहीर देना कि उम्मत के एक एक फ़र्द को कुछ और याद हो या ना याद हो क़ुरआन का वो ग़ैर मतलूब हुक्म ज़रूर याद हो ,क्या इस में आपको साज़िश की बू नहीं आरही है ?
एक मिसाल और देखें ।क़ुरआन में है लैस अलयकुम जुनअह इन तणकुलूवा जमीआ ओ इशिताता योनि इस में कोई गुनाह नहीं कि अखटे खाओ या अलाहदा (सूरा नूर ६१)इस्लाम इस बात की तो हौसला-अफ़ज़ाई करता है कि शर्ब-ओ-तआम इजतिमाई तौर से एक दुस्तर ख़वान पर बैठ कर हो और ये भी तालीम देता है कि किसी इन्सान का खाकर या पी कर बचाया हुआ सामान नापाक नहीं हो जाता बशर्तिके उसने खाने पीने के साथ ममनूआत (शराब वग़ैरा )का इस्तिमाल ना क्या हो मतलब ये कि इस्लामी तालीम के मुताबिक़ अशयाइ ख़ुर्द-ओ-नोश में नाम निहाद झूट नहीं होता यक़ीनन ये बेहतर तालीम है जो इन्सानी समाज में आपसी इत्तिहाद-ओ-इजतिमाईयत को फ़रोग़ देने वाली है ,लेकिन कई अफ़राद का एक ही बर्तन में ग़ोता-ज़न होना ,पानी के एक बर्तन से कई मुख़्तलिफ़ अफ़राद को सेराब करना और इस पर ये भी इसरार करना कि एक शख़्स के इस्तिमाल के बाद अगर वही बर्तन दूसरा शख़्स इस्तिमाल कर रहा है तो उसे धोया ना जाये ,ये वहशी पन्ना और बे तहज़ीबी के सिवा कुछ नहीं है और उसे शरीयत के नाम पर करना यक़ीनन शरीयत को बदनाम करने की साज़िश है जब क़ुरआन ये कहता हो कि इस में कोई हर्ज नहीं कि तुम अखटे मिलकर खाओ पियो और या अलग अलग फिर इन दो रकात के इमामों का इस पर इसरार कि हमें इस्लाम के नाम पर मुस्लमानों को एक ग़ैर मुहज़्ज़ब समाज बना कर रिखदीना है शरीयत है या शरीयत के साथ दुश्मनी है ? ऐसे मुआमलात में अगर हदीस में मतलब का मवाद ना मिल सका तो हदीस घड़ने का काम भी ख़ूब हुआ है ,चुनांचे इस ज़िमन में एक फ़र्ज़ी ,मौज़ू औरमन घड़त हदीस ये बयान की जाती है कि सूओर अलमूओमिन-ए-शिफ़-ए-यानी मोमिन के झूटे में शफ़ण है ये हदीस अहादीस की किसी मोतबर किताब में नहीं है ,फिर भी इस पर फ़र्ज़ जैसा अमल है इस तरह की एक दो मिसालें नहीं बल्कि सूरत-ए-हाल ये है अगर आप इस शरीयत का मिलान क़ुरआन से करेंगे जो ये दो रकात के इमाम शरीयत के नाम पर पेश कर रहे हैं तो आपको लगेगा कि इन की शरीयत और है क़ुरआन की शरीयत और ।
गो अलफ़ाज़ मआनी में, तफ़ाओत नहीं लेकिन मिला की अज़ां और है मुजाहिद की अज़ान और
ये दोरकात के इमाम कहाँ से आए?
सवाल ये है कि ये दोरकात के इमाम आए कहाँ से और कैसे पैदा हुए? इस की एक लंबी तारीख़ है जिससे तारीख़ का हर तालिब-इल्म वाक़िफ़ है और इस्लामी तारीख़ की किताबों के सफ़हात के सफ़हात उनकी तफ़सील से पर हैं लेकिन मिल्लत को अपने सकनजे में जकड़े ये दो रकात के इमाम उस तारीख़ को अवाम तक पहुंचने नहीं देते ।
इन दो रकात के इमामों की पैदाइश कैसे हुई उस की मुख़्तसर तारीख़ यहां बयान की जाती है जो तफ़सील में जाना चाहे वो बज़ात-ए-ख़ुद इस्लामी तारीख़ का तफ़सीली मुताला कर सकता है ।
ये तो आप जानते होंगे कि यूरोप के ईसाई ममालिक एक मुद्दत तक मुस्लिम दुनिया से बरसर पैकार रहे इस दौर को सलीबी जंगों का दौर कहा जाता है ईसाई दुनिया ने मुस्लमानों से दर्जनों सलीबी जंगें लड़ें लेकिन हर एक में मुँह की खाई बिलआख़िर फ़्रांस के बादशाह लोई नहम ने यूरोप के ईसाई राजाओं को जमा किया और उनके दरमयान क़ुरआन-ए-करीम हाथ में लेकर क़ुरआन लहराते हुए कहा कि जब तक मुस्लमानों में ये किताब और इस की तालीमात रहेंगी उस वक़्त तक तुम मुस्लमानों को ज़ेर नहीं कर सकते ,अगर मुस्लमानों पर फ़तह चाहते हो तो उन्हें इस किताब की तालीमात से दूर करने के तरीक़े सोचो ,उस के बाद यूरोप में इस्लामी तालीम के बड़े बड़े इदारे क़ायम किए गए जिनमें यहूदी और ईसाई बच्चों को क़ुरआन-ओ-हदीस-ओ-उलूम इस्लामी में महारत हासिल करा कर उन्हें मौलवियों इमामों और सूफ़ियों की शक्लों में मुस्लिम दुनिया में फैला दिया गया ,इन यहूदी और ईसाई मौलवियों में बड़े बड़े काबिल मौलवी भी हुए हैं जिन्हों ने उलूम इस्लामी के ऐसे ऐसे इलमी कारनामे अंजाम दिए जिनकी मिसाल अह्देजदीद के मुस्लिम अलिमन में शाज़ो नादिर ही नज़र आऐगी ,उनके ज़रीये अंजाम दिए गए कामों को आज के दौर के मुस्लिम अलिमन क़दर की निगाह से भी देखते हैं और उनसे इस्तिफ़ादा भी करते हैं मिसाल के तौर पर सहा सत्ता की तमाम हदीसों की लफ़्ज़ी फ़हरिस्त मुरत्तिब करने का काम अलमाजमु अलमफ़हरसु लिऐ लफ़्फ़ाज़ अलहदीस अलनबौई के नाम से सात जिल्दों में हॉलैंड के डाक्टर ए ,जे वीनसक A.J.Vensiak १ १८८ ईः। १९३९ ईः, एक यहूदी आलिम हदीस ने किया है ,इस किताब में लफ़्ज़ों की पहचान से किसी भी लफ़्ज़ पर मुश्तमिल तमाम हदीसों को एक साथ जमा कर दिया गया है जिससे किसी भी मौज़ू की तमाम अहादीस को एक साथ देखना बहुत आसान हो गया है ,इस की ये किताब हमारे मलिक के बड़े मदरसों में मौजूद है और हमारे मुहद्दिसीन इस से इस्तिफ़ादा भी फ़रमाते हैं ,इसी तरह अरबी ज़बान की बहुत मोतबर डिक्शनरी अलमनजद जो हमारे मदरसों में मौलवी हज़रात के मुताले में रहती है वो एक ईसाई आलम की मुरत्तिब करदा है ।
डाक्टर ए,जे वीनसक की मानिंद क़ुरआन-ए-करीम पर ये काम करने वाला एक ईसाई आलम है जो जर्मन का रहने वाला है इस का नाम गुस्ताव फ्लाइ गुल (Flawgil) १८०२ ईः-ए-। १८७० ईः-ए-है उसने क़ुरआन-ए-करीम पर्तो बड़ा काम किया ही उस के इलावा अरबी ज़बान की बड़ी और अहम पच्चास किताबें ऑडिट कर के शाय की जिनमें हाजी ख़लीफ़ा की कशफ़ अलज़नोन सात जिल्दों में किताब अलफ़हरसत इबन नदीम मा फ़हरिस्त-ओ-मुक़द्दमा ,जैसी किताबें शामिल हैं,किताब अलज़नोन अरबी उलूम-ओ-फ़नून-ओ-तसनीफ़ात की हज़ार साला तारीख़ है जबकि किताब अलफ़हरसत मुस्लमानों की इबतिदाई चार सदीयों की इलमी तारीख़ का ख़ज़ाना है ।
फ्लाइ गुल के मुताल्लिक़ दूर हाज़िर के एक इस्लामी स्कालर के तणसरात क्या हैं उसे जे़ल की सुतूर में मुलाहिज़ा फ़रमाएं ।
फ्लाइ गुल का इस्लाम और मुस्लमानों पर सब से बड़ा एहसान जिससे मुस्लमान
कभी सबकदोश नहीं हो सकते ये है कि उसने क़ुरआन-ए-मजीद की फ़हरिस्त अलफ़ाज़ नुजूम
उल-क़ुरआन के नाम से मुरत्तिब की जिसकी मदद से क़ुरआन-ए-मजीद की हर आयत हसब-ए-
ज़रूरत निकाली जा सकती है ,इस के इलावा उसने तीन ज़ख़ीम जिल्दों में तारीख-ए-
अरब लिखी , सा लॅबी की मूनिस उल्लू ह्यद छाप कर शाय की ।
इस्लाम और मुस्तश्रिक़ीन ,जलद पंजुम स५३
मुरत्तिब। सय्यद सबाह उद्दीन
मतबूआ ।दारालमसनफ़ीन ,शिबली अकैडमी ,आज़म गढ
दीनॱएॱ इस्लाम के वो ईसाई और यहूदी अलमणजन की किताबें मुस्लिम दुनिया में बहुत पसंद की जाती हैं उनमें से कुछ के नाम यहां दर्ज किए जाते हैं ।
(१) हेनरी लामणस H.Lammans, १८७२ ईः । १९३७ ईः -ए-फ़्रांसीसी है ,इस की दो किताबों को इस्लामी दुनिया में बहुत पसंद किया जा ताहे एक इस्लामी इन्साईक्लो पीडीया और दूसरी इस्लाम और ताइफ इस्लामी उलूम पर इस की और भी बहुत सी किताबें हैं ।
(२)ब्रेल Barel, ये शख़्स १८१४ ईः-ए-में हॉलैंड में पैदा हुआ,कट्टर ईसाई था लेकिन इस्लामी उलूम का ज़बरदस्त माहिर हुआ है ,उसने हॉलैंड के शहर लाईडन में अपने नाम पर ही एक इस्लामी छापाख़ाना क़ायम किया था जिसमें अरबी में उलूम इस्लामी की पाँच सौ से ज़्यादा किताबें छपीं हैं ,इसी ने हदीस की मशहूर किताब बुख़ारी शरीफ़ का बहुत उम्दा ऐडीशन ऑडिट कर के १९०८ ईः -ए-में लाईडन के इसी छापा ख़ाने से शाय किया था ।
(३)लाओसट । १९०४ ईः-ए-ईसाई है उसे मशहूर इस्लामी मुफ़क्किर इबन तीमीहके अफ़्क़ार और उनकी तसानीफ़ से बड़ी दिलचस्पी है चार्ल्स पीला सोरोबोनमें अरबी का उस्ताज़ रहा है ,उसने पैरिस से अरबी ज़बान में उलूम इस्लामी-ओ-शरीयत की सैकड़ों किताबें शाय की और बहुत सी अरबी किताबों का फ़्रांसीसी में तर्जुमा किया
उनके इलावा ,डोज़ी ।१८२० ईः-ए-। १८८३ ईः-ए-चार जिल्दों में तकमिलৃु मअअजिअअजिम-ए-अलअरबी उस की तसनीफ़ है , एक दूसरा शख़्स है सिखाओ जिसने तबक़ात इबन-ए-साद की तदवीन की,कुछ और नाम ये हैं। डख़वीह,१८३६ ईः-ए-। १९०९ ईः-ए-जिसने फ़तूओहु अलबुलदान (अलबलाज़री) और इमाम तबरी की तअरीख़ अलरुसुल व अलमुलोक शाय की ,मू नीसीवर कोली अलबहसु एन-ए-अलुद्दीन-ए-उलहक़ उस की मशहूर तसनीफ़ है , डी जो जय १८३६ ईः -ए-। १९०९ ईः-ए-हॉलैंड के रहने वाले हैं उनकी बहुत सी तसनीफ़ात हैं उस के इलावा उन्होंने वफ़यातु अलअअयान अज़ इब्न ख़ुलक़ान पर काम किया और एक दीगर आलिम डी जोंग के साथ मिलकर सीरत इबन हिशाम के मतन और तर्जुमे की इशाअत की ,वसटनफ़ीलड Wusten feld १८०८ ईः-ए-। ९ १८९ ईः-ए-जर्मन आलम हैं उन्होंने सीरत इबन हिशाम मा तालीक़ात वहवाशी की तीन जिल्दों में तदवीन की, इस के इलावा तारीख़ मकৃ उल-मुकर्रमा ,अराज़ी मदीना मुनव्वरा और अशराफ़ मक्का उस की यादगार तसानीफ़ हैं ,डाक्टर गलोवर तक़दमु अलतबशीर-ए-अलाली का मुसन्निफ़ है, डाक्टर सफ़ारी जिसने १७५२ ईः -ए-में क़ुरआन-ए-मजीद का तर्जुमा किया ,लियो पोलडवीस ( बाद को इस्लाम क़बूल कर के मुहम्मद असअद हो गए थे)ुपरोफ़ीसरासीन पलासियोसAsinpalacios उन्होंने इमाम ग़ज़ाली पर एक जामा किताब तसनीफ़ की ,सेव कियु,लौरंस ब्राउन ,डाक्टर बेकर ,मानटगमरी वाट काण्ट वेल असमथ ,अतिन डीनीह ( उन्होंने भी बाद को इस्लाम क़बूल कर लिया था) उनकी मशहूर तसनीफ़ अलशरक़ु कमअ यरा-ए-अलग़रबु है ,डाक्टर असनोक मीर गोज लामा नस बरोकलमान ,इसराईल वलफ़न सून ,मारगोलीथ(उसने मस्नद इमाम हनबल को ऑडिट कर के शाय किया और याक़ूत हमवे की किताब माजमु अलादबण को सात जिल्दों में शाय किया)फॉन क्रेमर आस्ट्रेलिया तक़रीबन बीस अरबी किताबों (मख़तूतात) को तलाश कर के शाय किया जिसमें मावर दी की अलाहकामु अलसुलतानीह और नशवान की क़सीदৃ अलहमीरৃ जैसी किताबें शामिल हैं ,नौ लद युकी डाक्टर इसपर नगर,डोज़ी ,जरजी ज़ैदान ,मारसीन ,गोलीम ,गोलडरीहर ,गार्ड फ़िरौ ,वाल्टर असकाट ,अलीकझ़नडर डीमास फ़लहावज़न ,सर टॉमस आरनल्ड ,ये वो चनदनाम हैं जो मज़हब इस्लाम के मशहूर-ए-ज़माना ईसाई और यहूदी उलमाए देन तालीम इस्लामी हैं जो महिज़ नमूने के तौर पर पेश किए गए हैं वर्ना उनकी तादाद दाइरा-ए-शुमार से परे है । तफ़सील के लिए देखें ।
इस्लाम और मुस्तश्रिक़ीन जलद दोयम ,मुरत्तिब सय्यद सबाह उद्दीन
मतबूआ ,दारालमसनफ़ीन ,शिबली अकैडमी ,आज़म गढ ,
ये एक झलक है ये बताने के लिए कि जिस तरह इस्लामी दुनिया में बड़े बड़े माहिर उलमाए देन पैदा हुए ,इसी तरह यहूदीयों और ईसाईयों में भी दीन इस्लाम के बड़े बड़े माहिरीन पैदा किए गए जिस तरह मुस्लिम उलमाए देन का मक़सद इस्लाम की तशहीर-ओ-तब्लीग़ था इसी तरह ,यहूदी और ईसाई उलमाए दीन की कोशिश इस्लाम का रास्ता रोकना था ,उन्होंने इस काम में किस क़दर मेहनतें कीं और किस-किस तरह की ज़िंदगीयां खपाएं ये देखकर एक आम आदमी हैरत-ज़दा रह जाता है ,बाक़ौल एक तहक़ीक़ कार कि।
शायद ही कोई इस्लामी मुसद्दिर बचा हो जो मुस्तश्रिक़ीन की तहरीफ़ से मावरा हो
इबन-ए-साद की तबक़ातु अलकुबरा को लीजिए मुस्तश्रिक़ीन की तहक़ीक़ात के साथ जो नुस्ख़ा शाय
हुआ है इस की ग़लतीयों (तहरीफ़ात) का अहाता मुश्किल है ।
इस्लाम और मुस्तश्रिक़ीन जलद सोम स८२ (मतबूआ ,दारालमसनफ़ीन ,शिबली अकैडमी ,आज़म गढ )
मज़ीद तफ़सील के लिए मुताला करें।
१। इस्लाम और मुस्तश्रिक़ीन ,सात जिल्दें ।
२। आलम-ए-इस्लाम पर मग़रिब का तसल्लुत ,अज़ मुहम्मद वसीक़ नदवी ,मतबूआ दार अलरशीद लखनऊ। ये मादूद-ए-चंद नाम हैं वर्ना ये तादाद हज़ारों में है ,जिन्हों ने यूरोप के ममालिक में बड़े बड़े इस्लामी मदरसे क़ायम किए, किताबें तसनीफ़ कीं , इस्लामी किताबों के छापेखाने क़ायम किए इस तरह का एक मुदर्रिसा ,यूपी के अंग्रेज़ी दौर के गवर्नर नवाब सईद अहमद छतारी ने लंदन में देखा था जिसका उन्होंने अपनी तहरीरों में ज़िक्र किया है ,इस तरह के मदरसों से पढ़ कर निकलने वाले ईसाई और यहूदी अलिमन को मुस्लिम दुनिया में दो रकात का इमाम बना कर भेजा जा ताथा,इसी तरह का एक शख़्स हमफ़रे था ,जिसको तुर्की की मुहिम सौंपी गई थी,बाद को उसने अपने तजुर्बात पर मुश्तमिल किताब लिखी जो हमफ़रे के ख़्यालात के नाम से उर्दू में भी दस्तयाब है ।
सोशल मीडीया पर एक वीडीयो क्लिप दस्तयाब है जिसमें एक पाकिस्तानी सिफ़ारतकार बता रहा है कि दुबई में इस की मुलाक़ात एक ऐसे शख़्स से हुई जिसके बारे में बताया गया कि वो अठारह साल मस्जिद में इमामत कर के अब रिटायरमैंट लेकर आए हैं ,वो कहते हैं कि देखने में वो शख़्स इंतिहाई मुत्तक़ी और परहेज़गार साहिब वज़ा क़त-ए-नज़र आरहा था ,अरबी ,उर्दू ,पंजाबी और पुश्तो जैसी ज़बानों का माहिर था ,लेकिन नमाज़ पढ़ने नहीं जाता था वजह पूछी गई तो उसने बताया कि वो मुस्लमान नहीं है ,फिर उन्होंने इस से पूछा कि तुमने तो अठारह साल इमामत कराई है ? तो कहने लगा कि वो तो मेरी जॉब थी ,इस पर सिफ़ारतकार ख़ुद कहते हैं कि उसने दौरान इमामत कैसे इस्लाम का परचार क्या होगा ये हम ख़ुद समझ सकते हैं ,जो आदमी मुस्लमानों को असल दीन से हटाने और करानी तालीम से दूर करने आया है उसने जो इस्लाम बेचा होगा ,और इस के जो ख़रीदार बने होंगे जो हमारे ही बीच के अफ़राद होंगे उनसे निपटना बहुत मुश्किल काम है

जैसा कि ऊपर ज़िक्र हुआ कि यूरोप के ईसाई ममालिक ने मुस्लमानों के मुक़ाबले हज़ीमत उठाने के बाद एक जंगी प्लैनिंग के तहत उन्हें असल मज़हब से दूर करने ,उनके अंदर से इस्लामी रूह और क़ुरआन-ए-करीम की तालीम को निकालने के लिए जंगी पैमाने पर ही ये मुहिम शुरू की थी ,वो इस में कितने कामयाब रहे अगर हम ये देखना चाहते हैं तो आज के दौर के मुस्लमानों के अमल का क़ुरआन-ए-करीम की तालीमात से मुवाज़ना कर के देख लें कि आज के दौर में आम मुस्लमान को क़ुरआन से किस तरह काट दिया गया है चुनांचे आज के दौर में हम देखते हैं कि मुस्लमानों में क़ुरआन-ए-करीम सिर्फ़ तिलावत की चीज़ है ,समझने की चीज़ नहीं ,इस से तबर्रुक हासिल किया जा सकता है ,मर्दों को ईसाल-ए-सवाब किया जा सकता है ,उसे घोल कृपया जा सकता है ,तावीज़ में लिख कर गले में लटकाया जा सकता है ,इस का तिगरा बनाकर मकान की देवा रं पर आवेज़ां किया जा सकता है ,यानी सब कुछ हो सकता है बस उसे समझा नहीं जा सकता, ना ही वो (हाशा कल्ला )आम आदमी के समझने की चीज़ है ,लिहाज़ा अगर कुछ अफ़राद किसी मस्जिद में उसे समझ कर पढ़ने का सिलसिला शुरू करना चाहें तो उन्हें इस बात की इजाज़त नहीं दी जा सकती ,जब उस की तालीम आम मुस्लमान तक नहीं पहुँचेगी तो अमल का मतलब ही किया है ,तो चलिए ये भी देख लेते हैं कि मुस्लिम अवाम में जो वैसे तो क़ुरआन के सच्चे आशिक़ हैं ,इस पर कोई उंगली अठादे तो इस की उंगली काटने पर तैयार हो जाएं ,कोई उस के ख़िलाफ़ बोल दे तो इस की ज़बान खींच लें ,लेकिन क़ुरआन की तालीम उनकी ज़िंदगी में कितनी है ?
क़ुरआन कहता है कि ये किताब अवामुन्नास की हिदायत के लिए है (सूरा बक़्र १८५)जबकि लोग कहते हैं कि उसे आम आदमी समझने की कोशिश ना करे वर्ना गुमरही का ख़तरा है ,क़ुरआन कहता है कि मुस्लमान सब के सब मिलकर एक जान हो कर रहें और आपस में फ़िरक़े ना बनाएँ लेकिन आज का मुस्लमान कहता है कि फ़िरक़े तो हो कर रहेंगे अल्लाह के रसूल ने कहा है कि क़ुर्ब-ए-क़यामत में ऐसा होगा तो क्या हमें क़ियामत नहीं लानी ? अगर क़ियामत लानी है और जल्द से जल्द जन्नत में जाना है तो एक दूसरे को काफ़िर तो कहना ही है ,लाख रसूल अल्लाह ने ये कहा हो कि काफ़िर को भी काफ़िर ना कहो ,क्यों कि उन्होंने ये थोड़ी कहा था कि मुस्लमान को भी काफ़िर ना कहो।
क़ुरआन के मुताले से मालूम होता है कि क़ुरआन ने दो चीज़ों को इस्लाम की ख़ास बुनियाद बनाया है ,एक नमाज़ और दूसरा ज़कात चुनांचे साठ सत्तर मुक़ामात पर नमाज़ के हुक्म के साथ ही ज़कात का हुक्म भी (अकीमवा अलसलोৃ-ओ-आतो अलज़कोৃ ) के लफ़्ज़ों से वाज़िह अहकाम की सूरत में है, इस के इलावा दर्जनों मुक़ामात पर ग़रीबों ,मिस्कीनों ज़रूरतमंदों के लिए जो भी अल्लाह ने दिया है इस में से ख़र्च करने का हुक्म है ,ये दो बुनियादें इस लिए हैं कि नमाज़ से इन्सान में अल्लाह के सामने जवाबदेही का एहसास जागे और रात-दिन के पाँच वक़्तों में अल्लाह के सामने हुज़ूरी से ये एहसास पैदा हो कि अल्लाह हरवक़त इन्सान के साथ है और इस का हर अमल उस की निगरानी में है ,जब किसी इन्सान में ये एहसास जाग जाएगा तो ज़ाहिर है कि वो हरवक़त मुहतात रहेगा और हर अमल इन्साफ़ और ज़िम्मेदारी से अदा करेगा ,क़ुरआन पढ़े और समझेगा तो जगह जगह उसे इस बात का एहसास किराया जाता रहेगा कि तुम जो भी अमल करते हो उसे अल्लाह के कारिंदे लिख रहे हैं ( सूरा क आयत ६ ) दूसरे नंबर पर ज़कात वसदक़ात को दीन की असास इस लिए बनाया गया था कि समाज में दबे कुचले,ग़रीबों,मिस्कीनों की ख़बर-गीरी होती रहे और किसी हद तक समाज में इक़तिसादी मुसावात क़ायम रहे , दुनिया के समाजयात के बहुत से मुफ़क्किरीन ने ये माना है कि इस दुनिया में जिस क़दर भी ,झगड़े-ओ-फ़साद ,चोरी ,डॉ निका और क़तल वग़ैरा हैं इन सब का बुनियादी सबब इन्सानी समाज में अमीरी और ग़रीबी का फ़र्क़ है ,आधी दुनिया को अपनी लपेट में जकड़ने वाला मारकसज़म जिसने बहुत से मुस्लिम ममालिक को भी दहरियत की दहलीज़ तक पहुंचाया है इस की बुनियाद यही नज़रिया था ,इसी लिए क़ुरआन में ज़कात वसदक़ात के आठ मसारिफ़ बताए गए थे जिनकी वज़ाहत क़ुरआन-ए-करीम की सूरा तौबा आयत नंबर६० में की गई है ,मारकसज़म ने तो अठारवीं सदी में इस को समझा लेकिन इस्लाम ने चौदह सदीयों क़बल इस नुक़्ता को समझ कर उस का हल पेश करते हुए कहदया था कि अमीरों के माल में ग़रीबों का भी हिस्सा है ताकि दौलत चंद हाथों में ही सिमट कर ना रह जाये ( सूरा हश्र आयत७ )लेकिन दो रकात के इमामों के पास उस का भी तोड़ मौजूद था ,क़ुरआन को तो उन्होंने लोगों के हाथों से छीन ही लिया था और अब अवाम महिज़ इन दो रकात के इमामों के ही सहारे रह गए थे लिहाज़ा उन्होंने अल्लाह के बताए हुए आठ मुसर्रिफ़ों की जगह सिर्फ एक मुसर्रिफ़ ही सामने आने दिया और वो था महिज़ इन दो रकात के इमामों की जेब ,लिहाज़ा आज के दौर में जो सूरत-ए-हाल है वो ये है कि क़ुरआन-ए-करीम ने इस्लाम की जो दो मुतवाज़ी बुनियादों(नमाज़ और ज़कात ) को साठ से ज़्यादा मुक़ामात पर दोनों का एक साथ हुक्म अक़ीमो अलिफ़ लसलोৃ-ओ-आ तो अलज़कोৃ जैसे कलिमात से दिया था ,इस में बड़ी होशयारी से तबदीली की गई यानी ज़कात-ओ-सदक़ात को साईड करते हुए ज़कात की जगह रोज़े को लाया गया ,चुनांचे आज हर एक मज़हबी किस्म के मुस्लमान के दिमाग़ में ,दीन वमज़हब के बुनियादी अनासिर के बतौर नमाज़ रोज़ा ,नमाज़ रोज़ा तो रहता है ,नमाज़ और ज़कात नहीं रहता ,रोज़ा हर मुस्लमान पर फ़र्ज़ है इस की एहमीयत किसी तरह ज़कात से कम नहीं है लेकिन इस का हुक्म वाज़िह लफ़्ज़ों में सिर्फ एक मुक़ाम पर है ,ऐसी ही बात हज की भी है दूसरी बात ये कि हज पूरी ज़िंदगी में सिर्फ एक-बार वो भी माल की मख़सूस कंडीशन में फ़र्ज़ है जबकि उमरा तो एक-बार भी फ़र्ज़ नहीं और रोज़े साल में सिर्फ एक मर्तबा आते हैं ,ऐसे ही उन का हुक्म भी पूरी वज़ाहत के साथ क़ुरआन-ए-करीम में एक एक मुक़ाम पर ही है,लेकिन ज़कात ,सदक़ात ,ग़रीबों की मदद ओरकमज़रों यतीमों, भोको ं को खाना खिलाना,तंगहाल मुफ़लिस ,मिस्कीन की माली मदद करना ,जैसे अहकामात सौ से भी ज़्यादा मुक़ामात पर हैं लेकिन सूरत-ए-हाल ये है मुस्लमानों में उमूर हज और उमरा तो मुनज़्ज़म है और मालदार मुस्लमान उम्र में कई कई हज और उमरा करते हैं लेकिन ज़कात को मुस्तहक़्क़ीन तक पहुंचाने के लिए कोई मुनज़्ज़म तहरीक नहीं है।
जिस समाज में एक कसीर तादाद ज़िंदगी की बुनियादी ज़रूरीयात से महरूम हो और इस में के अहल सर्वत कई कई नफ़ली हज और नफ़ली उमरे करें तो क्या उसे क़ुरआन का मतलूब समाज कहा जा सकता है ?

ख़ुदा से देख, कितना डर, रहा हूँ
तिजोरी जेब दोनों भर रहा हूँ
पड़ोसी भूका है, तीसरा दिन है
मैं चौथी बार, उमरा ,कर रहा हूँ

क़ुरआन-ए-करीम के मुताले से ज़ाहिर होता है कि तंगहाल, मुफ़लिसों,मिस्कीनों ,ग़रीबों यतीमों की माली मदद, दीगर मुस्लमानों पर इसी तरह फ़र्ज़ है जिस तरह उन पर नमाज़ फ़र्ज़ है, ये तसव्वुर क़ायम कर लेना कि माल की एक मख़सूस मिक़दार जिसे निसाब कहते हैं वही हमारे पास होगा तो हम तभी पैसा जेब से निकालेंगे सरासर ग़लत है अगर कोई साहिब निसाब हो तो इस पर माल का चालीसवां हिस्सा नकालकरग़ीरीबों तक पहुंचाने की फ़र्ज़ी नौईयत तो ऐसी है कि अगर इस में कोई हीला हवाला करे तो मुक़तदिर आज़म को हक़ है कि इस से बुज़ूर ताक़त वसूल कर ले जिस तरह हुकूमतें टैक्स वसूल करती हैं ,लेकिन वो मुस्लमान जो साहिब निसाब नहीं हैं मगर साहिब माल और साहिब हैसियत है उनसे क्या तक़ाज़ा है उसे मुंदरजा ज़ैल आयात में देखें ।
क़ुरआन-ए-करीम की पहली ही सूरा की पहली चंद आयतें पढ़िए ।
अलम ज़ालिक अलकितबु ला रेबा फ़ीहा अलख ,ये वो किताब है जिसमें कोई शक नहीं ये मुत्तक़ियों के लिए हिदायत है जो ग़ैब पर ईमान रखते हैं और नमाज़ पढ़ते हैं और जो कुछ हमने उन्हें रिज़्क़ दिया है इस में से ख़र्च करते हैं ।
इस में आख़िरी टुकड़े की जानिब इशारा मक़सूद है जिसमें कहा गया है कि जो कुछ भी हमने दिया है इस में से ख़र्च करते हैं गोया यहां पर जो हुक्म है वो इस मख़सूस ज़कात का नहीं जो साहिब निसाब पर फ़र्ज़ है क्यों कि इस के लिए क़ुरआन-ए-करीम ने ज़कात का मख़सूस लफ़्ज़ इस्तिमाल किया है ।
एक दूसरे मुक़ाम पर इरशाद हुआ है ।
वो जो नमाज़ पढ़ते हैं और जो कुछ हमने दिया है इस में से ख़र्च करते हैं वही दर-हक़ीक़त मोमिन हैं अल्लाह के नज़दीक उन्हीं के दर्जात बुलंद हैं (सूरा इन्फ़ाल आयत नंबर ३)सूरा हश्र की आयत नंबर ७ में इस अनवान को मज़ीद वाज़िह करते हुए इरशाद हो है कि जो कुछ भी अल्लाह ने अता किया है यानी इन्सान ने अपनी मेहनत से कमाया है इस में इन लोगों का भी हिस्सा है जो नादार हैं यतीम हैं ,मिस्कीन हैं यानी ज़िंदगी की बुनियादी ज़रूरीयात से महरूम हैं ।
इस आयत में मज़ीद एक अहम बात कही गई है वो ये कि ऐसा अल्लाह ने इस लिए ज़रूरी क़रार दिया है ताकि दौलत सिर्फ़ मालदारों के हाथों में ही गर्दिश ना करती रहे के लिऐ यकूओन दौलৃबयन अलाग़नीआइ मिनकुम ये किस क़दर अहम बात है, दुनिया में वाइरस की तरह फैलने वाले कम्यूनिज़म और मारकसज़म की तारीख़ का मुताला कीजिएकार्ल मार्क्स ने यही तो कहा था कि दौलत चंद हाथों में सिमट कर रह गई है और ये दौलत वाले ग़रीबों का इस्तिहसाल कर रहे हैं जो दौलत जमा कर के इस पर साँप की मानिंद कुंडली मार कर बैठ गए हैं मेहनत तो ग़रीब करता है और इस ग़रीब की मेहनत से कमाई गई दौलत का कल इस्तिहक़ाक़ अमीरों के हाथों में चला जाता है ,उसी नुक़्ते पर मार्क़्सिस़्टों ने ग़रीबों ,मज़दूरों और महरूमों को जमा कर के दुनिया में ऐसा इन्क़िलाब परपा किया कि दुनिया हैरत-ज़दा रह गई ,कई मुस्लिम मलिक और बहुत से मुस्लिम दानिश्वर अन्न भी इस की लपेट में आए ,अगर मुस्लमानों में क़ुरआन की तालीम आम होती और क़ुरआन ने जिस ख़तरे को भाँप कर पहले ही इस का सद्द-ए-बाब कर दिया था मुस्लमानों का इस पर अमल होता तो कम-अज़-कम उम्मत मुस्लिमा, दुनिया के इस अज़ीम फ़ित्ने से महफ़ूज़ रहती जिसने ना जाने मिल्लत के कितने ही अफ़राद को जहन्नुम का ईंधन बना दिया है ।
क़ुरआन में ग़रीबों ,कमज़ोरों ,मिस्कीनों, मुहताजों ,ज़रूरतमंदों की मदद ,यतीमों ,मिस्कीनों को खाना खिलाना ख़स्ता-हाल और ज़िंदगी की बुनियादी ज़रूरीयात से महरूम लोगों के तआवुन में सदक़ात-ओ-ज़कात की अदायगी के अहकामात नमाज़ के अहकाम से कम नहीं हैं फिर भी नमाज़ियों की मिक़दार के मुक़ाबले अज़ ख़ुद ग़रीबों की मदद के लिए आगे आने वालों की मिक़दार यक फ़ीसद भी नहीं, और ये काम मुस्लमानों में इस क़दर अजनबी है कि कोई भोला बिसरा थोड़ा बहुत करता भी है तो इस में लोगों को यहूद वनसारी की बू आने लगती है और वो ये पूछने से भी नहीं चूकते कि पैसा अमरीका से मिला था या इसराईल से। (हमने इस मज़मून के शुरू में एक इमाम साहिब का ज़िक्र किया था वो आपको याद होगा )।क्यों कि ज़ाहिर है उन्हें ये तशवीश होना लाज़िमी है कि हमने जिस करानी रुजहान का क़िला क़ुमा कर दिया था वो फिर से क्यों उभर ने लगा है और अगर कहीं ऐसा होता है तो उन अफ़राद का मुतहर्रिक होजाना ज़रूरी है जिन्हों ने बड़ी मेहनत करके मुस्लमानों को क़ुरआन की तालीम से दूर किया था लिहाज़ा वो ये बात ठान लेते हैं कि वो मस्जिद मस्जिद जा कर मुस्लमानों को ऐसा करने वालों से होशयार रहने को कहेंगे।
एक ऐसे मुआशरे का तसव्वुर कीजिए कि जिसमें नमाज़ी इसलिए नमाज़ पढ़ता है कि रात और दिन में पाँच वक़्त की इस रेहृ सिल से इस के दिमाग़ में ख़ुद के ख़ालिक़-ओ-मालिक की निगरानी में होने का ये एहसास क़ायम हो जाये कि इस दुनिया वजहां का बनाने वाला हरवक़त हर घड़ी चाहे दिन का उजाला हो या रात का अंधेरा बंदे को देख रहा है और इस की तमाम हरकात-ओ-सकनात को रिकार्ड कर रहा है और फिर एक दिन एक एक बात का गहराई से हिसाब भी देना होगा ,रसूल अल्लाह ने फ़रमाया कि नमाज़ ऐसे पढ़ो कि तुम अल्लाह को देख रहे हो और अगर ऐसा तसव्वुर क़ायम ना कर सको तो वो तो तुम्हें देख ही रहा है , क़ुरआन-ए-करीम की सूरा क आयत नंबर ८ में कहा गया है कि इन्सान जो कुछ बोलता है उसे ( अल्लाह की जानिब से मुक़र्रर करदा फ़रिश्ते ) फोरा लिख लेते हैं ,सूरा कहफ़ की आयत ४९ में है कि जब (रोज़-ए-क़यामत ) इन्सान के सामने उस का ये दफ़्तर खोला जाएगा तो मुजरिमीन घबरा जाएंगे और कहेंगे कि हाय ख़राबी ये कैसा रिकार्ड है जिसने ना कोई छोटी बात छोड़ी ना बड़ी ।
जब इन्सान अल्लाह की किताब में इंतिहाई अक़ीदत और यक़ीन के साथ ये सब पढ़ता है तो एक सही अलद माग़ इन्सान का बुराईयों से रुक जाना ज़रूरी महसूस होता है,बुराईयों से बच कर ज़िंदगी गुज़ारने वाले ये लोग जब अपने में के कमज़ोरों ग़रीबों और मुफ़लिसों की माली मदद कर के उन्हें ऊपर उठाने की बराबर कोशिश भी करते रहें तो यक़ीनन एक बेहतर समाज की तशकील होगी मगर ये तभी मुम्किन है जब उनमें का हर एक क़ुरआन की तालीमात को तिलावत करने के साथ समझता भी हो लेकिन अगर क़ुरआन को समझने से ही लोगों को रोक दिया जाये और नमाज़ और इस के सज्दों के बारे में ये बात ज़हन नशीन करली जाये कि अल्लाह को ये सज्दे इसी तरह उस को राज़ी करने के लिए हैं जैसे एक बुतपरस्त अपने माबूद को अपनी पूजा से ख़ुश करता है,और इस की किताब (क़ुरआन ) के पढ़ने से भी वो ऐसे ही ख़ुश होता है और एक एक हर्फ़ के पढ़ने पर नेकियों के अंबार लगा देता है तो इस फ़िक्र से कोई नाम निहाद मुस्लमान अपनी दानिस्त में चाहे जन्नत में अपने लिए महलात तामीर कर रहा होवह इस दुनिया जहान में क़ुरआन का मतलूब इन्सान नहीं बन सकता ।
जब किसी समाज में अवामी सतह पर क़ुरआन की तालीम के बर-ख़िलाफ़ इस बात की तशहीर कर दी गई हो कि मुस्लमान की ज़िंदगी का मक़सद सिर्फ और सिर्फ आख़िरत बनाना है और जो इस दुनिया की बात करे वो महिज़ दुनियादार है बेहतर है कि लोग इस से बच कर रहीं तो इस मुआशरे में ऐसे ही अफ़राद की तशकील होगी जो इस दुनिया पर बोझ होंगे जिन्हें दुनिया वाले हक़ारत की नज़र से देखेंगे जो बदनाम समाज का हिस्सा होंगे ।
हमने इस नज़रिए को क़ुरआन की तालीम के बरख़िलाफ़ इस लिए कहा है क्यों कि क़िरान की तालीम है ही ये कि एक अच्छा मुस्लमान वो है जिसकी दुनिया भी बेहतर हो और इस की आख़िरत भी बेहतर हो ,यही मतलब है इस दुआ का जो क़ुरआन की सूरा बक़्र आयत नंबर२०१में है( रुबिना अआतिना फ़ी अलदुना हसनৃौ्वफ़ी अलाआख़िरৃ हसनৃ) या अल्लाह हमें दुनिया भी अच्छी दे और आख़िरत भी अच्छी दे ।
बहर-ए-हाल दीन की जड़ क़ुरआन में है लेकिन जब आम मुस्लमान को क़ुरआन से ही काट कर रख दिया जाये तो वैसा ही मुआशरा वजूद में आएगा जिसके हाथ में मज़हब के नाम पर महिज़ चंद मज़हबी रसूम होंगी।
क़ुरआन कहता है कि इन अलसलोৃतनहा एन-ए-अलफ़हशअ-ए-वालमुनकर यानी नमाज़ गुनाह के कामों से (मुनकिरात और फ़ाहिशात) से रोकती है और ये उसी वक़्त मुम्किन है जब क़ुरआन की मज़कूरा किस्म की तनबीहात वाली आयात भी नमाज़ी के सामने इसी तरह तकरार के साथ आती रहीं जिस तकरार के साथ नमाज़ी नमाज़ पढ़ता है और इसी तकरार के साथ उस के सामने क़ुरआन काया मुतालिबा दुहराया जाता रहे कि वो जो कुछ भी कमाता है इस में ग़रीबों मुहताजों,ज़रूरतमंदों का हिस्सा भी शामिल है जो मुस्तहक़्क़ीन तक पहुंचाना उसी की ज़िम्मेदारी है,जुहरी नमाज़ों में इसी लिए तो क़ुरआन ब-आवाज़-ए-बुलंद पढ़ा जाता है कि सुनकर इस पर अमल हवागर मुक़तदी नहीं समझ रहे हैं तो इमाम की ज़िम्मेदारी है कि उन्हें नमाज़ में पढ़ा गया क़ुरआन समझाए, ज़ाहिर है कि जब एक जानिब इन्सान पूरे इख़लास के साथ ये समझ कर नमाज़ में खड़ा होगा कि मेरा ख़ालिक़-ओ-मालिक मुझे देख रहा है साथ ही साथ नमाज़ में इमाम की ज़बानी वो करानी आयात जिनमें मारूफ़ का हुक्म है और मुनकिर से रोका गया है उन्हें ये समझ कर सुनेगा कि इन आयात में मेरा ख़ालिक़-ओ-मालिक मुझसे मुख़ातब है तो वो एक जानिब फ़ाहिशात से ,मुनकिरात से ,बुराईयों से ख़ुद को रोकेगा और दूसरे वो समाज के दबे कुचले ,ग़रीबों ,मिस्कीनों और मुहताजों की दामे दिरमे मदद करेगा तो एक ऐसा समाज उभर कर ऊपर आएगा जिसमें कमज़ोर भी किसी हद तक ख़ुशहाल होंगे और ग़रबण की बुनियादी ज़रूरीयात भी पूरी होती रहेंगी और उमूमी ज़िंदगी में लोग गुनाहों से दूर होंगे जिसका नतीजा ये होगा कि काफ़ी हद तक मुआशरती जराइम,आपसी झगड़े, चोरी और लौट मार के हादिसों में कमी आएगी और कितने ही झगड़ों टांटों पर क़दग़न लगेगा , और एक ऐसे समाज की तशकील होगी जिसको हम दूर अव्वलीन के मुस्लमानों की तारीख़ में पढ़ते हैं।
अपने मसलययन में नमाज़ की ये रूह पैदा करना मस्जिद के इमाम की ज़िम्मेदारी है इस लिए इमाम कम अज़ कम इतनी अहलीयत का होना ज़रूरी है जो क़ुरआन को समझ कर उस का मफ़हूम नमाज़ियों पर वाज़िह कर सके ,लेकिन जिस मुस्लिम समाज के इमाम ख़ुद भी ये ना समझते हूँ कि उन्होंने नमाज़ में क्या पढ़ा है उनका हाल जो होगा उसे एक वाक़िया से समझा जा सकता है जो जे़ल में दर्ज है।
वाक़िया ये है कि एक मर्तबा राक़िम उल-हरूफ़ ने एक गांव की मस्जिद में नमाज़-ए-फ़ज्र अदा की ,नमाज़ में इमाम साहिब ने क़नूत नाज़िला पढ़ी ,क़नूत नाज़िला में इबतिदाई चंद कलिमात दुआइया हैं जिसमें एक ये है अललाहुम्म अलिफ़ बेन क़ुलूओभम ए अल्लाह मुस्लमानों के दिलों को आपस में जोड़ दे ,नमाज़ से फ़राग़त के बाद इमाम साहिब से मुलाक़ात हुई तो उन्हों दौरान गुफ़्तगु एक सवाल किया जिसमें मुस्लमानों के एक ख़ास मसलकी ग्रुप के बारे में ये पूछा गया था कि क्या वो मुस्लमान हैं ?उनकी नज़र में वो ख़ास मसलकी ग्रुप मुस्लमान नहीं था ,राक़िम ने उनसे बस ये कहा कि नमाज़ में आप ने क़नूत नाज़िला में मुस्लमानों के दिलों को जोड़ने की जो दान की है वो मस्जिद की छत से ऊपर नहीं गई ।
आज पूरे मुस्लिम समाज में यही हो रहा है ,क़ुरआन-ए-करीम अल्लाह की किताब है जो मुस्लमान के लिए ज़िंदगी का आईन है , इस को ज़िंदगी से निकाल दिया जाये तो पूरी इमारत ही मुनहदिम हो जाती है इस को मुस्लमानों की ज़िंदगी से निकालने के लिए ये एक कारगर शैतानी हर्बा है कि इस को समझने की कोशिश ना हो जिसे आज के दौर में दोरकात के इमाम पूरी तनदही से अंजाम दे रहे हैं

जहां तक मुनकिरात ,फ़ाहिशात ( बुराईयों) से बचने की बात है तो ये किसे मालूम नहीं कि बुराई किया है उमूमी तौर पर इस बारे में कि बुरा किया है और अच्छा किया है जिस क़दर एक मुस्लमान जानता है उसी क़दर एक काफ़िर भी जानता है ,मसला ये बात कि नाप तौल में देते हुए कमी कर देना और जब लेने की बात हो तो पूरा पूरा लेना गुनाह है और ऐसा करना बुरी बात है उसे हर आम इन्सान समझता है चाहे वो मुस्लमान हो या ग़ैर मुस्लमान हो लेकिन ज़रा तसव्वुर कीजिए एक ऐसे इन्सान का जिसे ये यक़ीन है कि उसे एक दिन अपने हर अमल का हिसाब देना ही देना है जो हर तीन चार घंटे के बाद अपने पैदा करने वाले के आगे सज्दा-रेज़ हो कर इस बात की अमली मश्क़ करता है कि मेरा ख़ालिक़-ओ-मालिक हरवक़त मुझे देख रहा है क्यों कि वो क़ुरआन जैसी बाअज़मत किताब में बार-बार ये भी पढ़ता है कि इन्सान जो कुछ बोलता है उसे( अल्लाह की जानिब से मुक़र्रर करदा फ़रिश्तों के ज़रीया) फोरा लिख लिया जाता है (सूरा क आयत नंबर ८)और जब (रोज़-ए-क़यामत ) इन्सान के सामने उस का ये दफ़्तर खोला जाएगा तो मुजरिमीन घबरा जाएंगे और कहेंगे कि हाय ख़राबी ये कैसा रिकार्ड है जिसने ना कोई छोटी बात को छोड़ा ना बड़ी बात को (सूरा कहफ़ आयत ४९) और फ़राँ आयात पर यक़ीन रखने वाला और उन्हें बार-बार दोहराने वाला जब सूरा मतफ़फ़ीन की मुंदरजा ज़ैल की आयात पढ़ कर घर से निकले।
वयलु लिलतफ़फ़ीन……….. अलख
हलाकत है नाप तौल में कमी करने वालों के लिए ,जो लोगों से नाप कर लें तो पूरा
पूरा लें और जब देने के लिए नाप तौल करें तो घटा दें ,क्या ये नहीं समझते कि ये लोग एक दिन
उठा लिए जाएंगे एक बड़े दिन (रोज़-ए-क़यामत ) के लिए ,जिस दिन ये ख़ुदा के सामने खड़े हुए
होंगे ,ख़बरदार गुनाहगारों का आमाल-नामा सुजैन में होगा और तुम्हें पता है कि सुजैन किया है ?वो एक रिकार्ड
बक है ,हलाकत है इस दिन झटलाने वालों की ,जो इन्साफ़ के दिन को झटलाते हैं ,और इस को वही
झुटलाता है जो हद से गुज़र जाने वाला हो ,गुनाहगार हो जब उस को हमारी आयात सुनाई जाएं
तो कहदे कि ये तो गुज़रे दौर की बातें हैं ख़बरदार ? बल्कि उनके दिलों पर उनके(बुरे)
आमाल (जैसे कम तौलना वग़ैरा का ज़ंग चढ़ गया है ,ख़बरदार उन्हें उस दिन ख़ुदा से दूर रखा जाएगा
फिरवा दोज़ख़ में दाख़िल कर दिए जाऐंगे और कहा जाएगा कि ये है वो चीज़ जिसे तुम झटलाते थे।
अल्लाह की मुंदरजा बाला आयात पढ़ कर घर से निकलने वाला अल्लाह का वो बंदा जिसका अल्लाह पर ईमान-ए-कामिल हो वो नाप तौल में बढ़ा कर तो दे सकता है लेकिन देने में घट तौली नहीं कर सकता ,लेकिन वो शख़्स जो मज़कूरा आयात का मतलब ना समझे और महिज़ ये जान कर सुबह सुबह क़ुरआन की तिलावत करे कि इस के पढ़ने से घर में बरकत होगी और इस के लिए नेकियों के अंबार लग जाएंगे वो चाहे घर से पूरा क़ुरआन पढ़ कर निकला हो नाप तौल के मुआमले में वो और एक ग़ैर मुस्लिम दोनों का रवैय्या एक जैसा होगा ,बईद नहीं कि वो भी दूध में पानी मिला कर बेचे या दिन-भर दुकान पर बैठ कर डंडी मारता रहे ,नक़ली माल की तिजारत करे और असली माल की क़ीमत वसूले ।
एक दूसरी मिसाल लीजिए ।
* माँ बाप का अदब-ओ-एहतिराम और उनकी ख़िदमत करना औलाद की ज़िम्मेदारी है और वही अच्छी औलाद कहलाने के मुस्तहिक़ हैं जो माँ बाप का पूरा पूरा एहतिराम करती हो,उमूमी तौर पर इस बात को जानने और समझने में एक मुस्लमान और ग़ैर मुस्लमान दोनों बराबर हैं लेकिन एक अल्लाह पर ईमान यक़ीन रखने वाला इन्सान जब क़ुरआन में सूरा असरण की ये आयात पढ़ता है।
वक़ज़ा रब्बुक ।।।।।।।।।अलख
और तेरे रब ने फ़ैसला कर दिया है कि इस के सिवा किसी की इबादत ना करना और माँ बाप के साथ अच्छा सुलूक करना ,अगर वो दोनों या उनमें से कोई एक तेरे सामने बुढ़ापे को पहुंच जाएं तो उन्हें उफ़ तक ना कहना और ना उनसे झल्लाकर बात करना और उनके साथ नरमी से बात करना और उनके सामने निगाह-ए-अज्ज़ झुकाए रखना और उनके लिए दुआ करना कि ए मेरे रब-ए-करीम) उनके साथ रहम का मुआमला फ़र्मा जैसा कि उन्होंने मुझे बचपन में पाला है। (सूरा असरण २३)
एक बंदा-ए-ममन जब पूरे एतिक़ाद-ओ-एहतिराम के साथ मज़कूरा आयत के मफ़हूम-ओ-मुतालिब को समझ कर पड़ेगा तो ला-मुहाला उस का अपने माँ बाप के तईं सुलूक-ओ-रोया इस ग़ैर मुस्लमान से मुख़्तलिफ़ और कहीं बेहतर होगा जो क़ुरआन जैसी मुक़द्दस किताब से महरूम है ,लेकिन जो मुस्लमान मज़कूरा किस्म की आयात की लफ़्ज़ी तिलावत महिज़ इस लिए कर रहा है कि इस तिलावत से इस के ऊपर नेकियों की बारिश हो रही है और एक एक हर्फ़ के बदले दस दस नेकियां उस के आमाल-नामे में दर्ज हो रही हैं ,बस उस के सिवा उसे ये भी इलम नहीं कि जिन आयात की तिलावत कर के उसने अपनी दानिस्त में अपने लिए जन्नत-उल-फ़िरदौस में महलात तामीर कर लिए हैं इन आयात में इस को इस के मालिक और ख़ालिक़ ने कुछ ज़रूरी नसीहतें उस के माँ बाप के मुताल्लिक़ की थीं ,ज़ाहिर है कि माँ बाप के हक़ में इस मुस्लमान का रोया और इस ग़ैर मुस्लमान का रोया जो क़ुरआन की नेअमत से महरूम है ,एक जैसा होगा और वक़्त पड़ा तो ये दोनों अपने अपने माँ बाप को ओलडाएज होम में भेजने से गुरेज़ नहीं करेंगे ।
ज़रा तसव्वुर कीजिए उस शख़्स के बारे में जिसने मस्जिद में बैठ कर मज़कूरा किस्म के मफ़हूम-ओ-मुतालिब की आयात क़ुरआन की तलात कीं और घर आकर माँ या बाप के सर चढ़ दौड़ा ,क्या उसे भी एक एक हर्फ़ के बदले दस दस नेकियां मिलनी चाहिऐं?इसी पर पूरे क़ुरआन को क़ियास किया जा सकता है ।
इस्लाम का बुनियादी और फ़रस्ट आईन क़ुरआन है,अल्लाह के रसूल पर नबुव्वत के तेईस सालों में क़ुरआन नाज़िल हुआ था कुछ और नहीं इस लिए क़ुरआन पहले है बाक़ी सब बाद में हैं लेकिन जब आम मुस्लमान को उसे समझने से ही रोक दिया गया हो और इबादत के नाम से महिज़ चंद रसूम सामने कर दी गई हूँ जहां एक मुस्लमान का मयार ईमान महिज़ हुल्या उस के कपड़े और मख़सूस वज़ा क़ता को ही समझा जाये ऐसे समाज के अफ़राद में आपको दूर अव्वल के मुस्लमानों की ख़सुसीआत ढ़ूंढ़े से भी नहीं मिलेंगी।
यूं तो क़ुरआन में बहुत से अहकामात हैं जिनका मुतालिबा अल्लाह ने बंदों से किया है इन अहकामात को फ़र्ज़ीयत का दर्जा हासिल है जिनको सरअंजाम देना मुस्लमान के लिए ज़रूरी है उनका मुनकिर काफ़िर और अंजाम ना देने वाला फ़ासिक़ है ,ये अहकामात ज़्यादा-तर एक एक दो दो जुमलों में कहे गए हैं नमाज़ विरो ज़े का हुक्म ,माँ बाप की इज़्ज़त वतकरीम ,तकब्बुर ना करना ,पीठ पीछे बुराई ना करना ,बिलाइजाज़त किसी के घर में दाख़िल ना होना किसी को बुरे नाम से ना पुकारना ,लिख कर लेना लिख कर देना ,लोगों को अच्छे कामों की तलक़ीन करना ओ रबरे कामों से रोकना ,बुराई का बदला भलाई से देना ,ग़रीबों ,कमज़ोरों ,मज़लूमों की मदद करना ,पड़ोसी के हुक़ूक़ और इस से अच्छा सुलूक वग़ैरा वग़ैरा बहुत से अहकामात हैं जो एक एक दो दो जुमलों में इरशाद हुए हैं ,लेकिन उनके इलावा एक हुक्म और है जिसका ताल्लुक़ हुक़ूक़ उल-ईबाद से है यानी वो तौबा से भी माफ़ नहीं होता जब तक कि बंदा साहिब हक़ को इस की अदायगी ना कर दे ये हुक्म है विरासत का यानी जायदाद में बटवारे का ब-तौर-ए-ख़ास बेटों के मुक़ाबले बेटीयों को जायदाद में हिस्सा देने का ,क़ुरआन का ये हुक्म कई तौर से दीगर अहकामात से मुमताज़ है सबसे बड़ी बात तो ये कि उसे एक दो जुमले में नहीं कई सफ़हात में तफ़सील से बयान किया गया ,ब-तौर-ए-ख़ास जहां औलाद के हिसस की बात है तो इस को बयान करने के लिए कि औलाद के दरमयान लड़के को दो और लड़की को एक हिस्सा मिलेगा ,उस को बहुत ही अहम लफ़्ज़ से बयान किया है और वो है वसीयत का लफ़्ज़ ,यूओसीकुमु अललहु(सूरा न्सन आयत-ए-अल्लाह तुम्हें वसीयत करता है,अगर कोई बड़ा वसीयत कर जाये तो इस का ख़ुसूसी ख़्याल रखा जाता है लेकिन अल्लाह की वसीयत का जब उन्हें को ख़्याल नहीं जो क़ुरआन के अलमबरदार ,उस के मुहाफ़िज़-ओ-निगरां और मबलग़ समझे जाते हैं तो आम मुस्लमानों की तो बात ही किया की जाये ,जब के इस हुक्म की एहमीयत जताने के लिए सिर्फ लफ़्ज़ वसीयत पर ही इकतिफ़ा-ए-नहीं बल्कि क़रीब दो सफ़्हों पर मुहीत इस मौज़ू की वज़ाहत करने के बाद इन अहकामात के मुताल्लिक़ कहा गया कि ये अल्लाह की हदें हैं तिलक हदु वदुअलला(सूरा नसणायत १३)जब कोई बड़ा अपने मातहत को कोई सख़्त और ताकीदी हुक्म देता है तो इस तरह के अलफ़ाज़ इस्तिमाल होते हैं कि अपनी हद में रहना ,हद से बाहर ना जाना,वग़ैरा वग़ैरा,जब के यहां पर तो अल्लाह ने हद क़ातईन करके अगली ही आयत में इस से बढ़कर सख़्त बात कहदी चुनांचे इरशाद हुआ कि जो अल्लाह की हदों को लॉंग जाएगा अल्लाह उस को हमेशा हिमेश की आग में दाख़िल करेगा और इस के लिए ज़िल्लत वाला अज़ाब होगा (सूरा नसणायत १४)।
विरासत का ये मसला जो क़ुरआन-ए-करीम में इस क़दर तफ़सील से और सख़्त लफ़्ज़ों में बयान किया गया है इस को अगरचे अल्लाह के कुछ नेक बंदे अदा करते हैं लेकिन हमारे यहां उनकी मिक़दार आटे में नमक की मानिंद भी नहीं ,तनासुब निकाला जाये तो एक फ़ीसद भी नहीं आएगा ,वजह किया है ?वजह सिर्फ ये है कि इस मसले को देनी जलसों में ,इजतिमाआत और तक़रीरों में ,रोज़मर्रा की तालीम मेंदो रकात के इमाम उठाते ही नहीं ,अवाम बेचारे तो अल्लाह की सीधी-सादी मख़लूक़ होते हैं उन्हें उनके रहनुमा जिस रास्ते पर चाहें लगा दें वो उधर ही चल पड़ते हैं लिहाज़ा इस मसले के बिलमुक़ाबिल कुछ दीगर एशियन के जिन पर देनी इजतिमाआत और जलसों में और रोज़मर्रा की तालीम और तक़रीरों में ज़्यादा ज़ोर दिया जाता है मसला तवील डाढ़ी,ढीला कुरता ऊंचा पाएजामा और सर के बाल वग़ैरा यानी ज़ाहिरी हुल्या जिस पर हम कसरत सेदो रकात के इमामों के ख़ुतबात सुनते हैं उन पर अवाम का इतना अमल तो है कि इस दौर के मुस्लमान की पहचान इन ही अशीणसे हो कर रह गई है ।
मुस्लमान की इस पहचान से एतराज़ नहीं लेकिन ये अशिन तो इन्सानी इक़दार में किसी तरह की तबदीली नहीं लातें इस लिए शरीयत में उनकी एहमीयत का अंदाज़ा बमुक़ाबला मसला-ए-विरासत और उन चंद अहकामात के जिनका ज़िक्र आया ही चाहता है इस बात से कीजिए कि क़ुरआन-ए-करीम जो दीन-ओ-शरीयत का बुनियादी मणख़ज़ है इस में इन अशीणकी एहमीयत काकोई मामूली सा भी ज़िक्र नहीं है ,ये माना कि अहादीस में है लेकिन वहां भी उनमें से किसी पर ना तो मसला-ए-विरासत की मानिंद जन्नत का वाअदा है और ना हमेशा हिमेश की आग में डाले जाने की वईदें ,वहां जिन कामों पर वाअदे और वईद हैं वो हैं इन्फ़ाक़ फ़ी सबील अल्लाह, अल्लाह के रास्ते में माल ख़र्च करना, ग़रीबों कमज़ोरों ,ज़रोतमनदों की मदद करना ,यतीमों ,मिस्कीनों की दाद रस्सी करना ,हर मुआमले में अदल करना बल्कि अदल से भी बढ़कर एहसान करना एन-ए-उल़्ला यणमुरुकुम बिअलअदल व अलाहसअन(सूरा नहल आयत९०),पड़ोसी के हुक़ूक़ रिश्तेदारों ,क़राबत दारों की मदद और उनके साथ सिला रहमी का मुआमला करना ,वाअदा कर लेना तो उसे पूरा करना वाइफवा बालअहद-ए-एन अलाहद कान मसलाव (सूरा असरण३४) वाअदा पूरा करो,बे-शक वाअदे के बारे में सवाल किया जाएगा एक दूसरे मुक़ाम पर नेक लोगों की निशानी बताते हुए कहा गया कि वो जब वाअदा कर लेते हैं तो उसे पूरा करते हैं वालमुफ़ूओन बिअहधम अज़ा आहदवा(सूरा बक़्र१७७)झूट ना बोलना झूटी गवाही ना देना, अल्लाह की मुतय्यन करदा हदों से तजावुज़ ना करना ,ग़ीबत ,ऐब-जोई और तजस्सुस से इजतिनाब करना उठते बैठते और लेटते अल्लाह को याद रखना और ये तसव्वुर क़ायम रखना कि मैं बहर-सूरत अल्लाह की निगरानी में हूँ और मेरा हर अमल और ज़बान से निकली हर बात का अल्लाह की निगरानी में रिकॉर्ड तैयार हो रहा है जिसका मुझे एक दिन हिसाब भी देना होगा, वग़ैरा वग़ैरा ।यानी क़ुरआन की तालीमात पर अमल पैरा एक कामिल मुस्लमान बन कर रहना।
अगर एक मुस्लमान की पहचान क़ुरआन-ए-करीम की इन तालीमात से होतो ज़ाहिर है कि एक ऐसा इन्सानी मुआशरा तशकील पाए गाजो मुनफ़रद मुआशरा कहलाने का हक़दार होगा ,इसी इन्सानी मुआशरे के साथ अल्लाह की मदद का वाअदा है और ऐसा मुआशरा ही हामिल क़ुरआन कहलाने का मुस्तहिक़ है ।

एक मुस्लिम बुज़ुर्ग का वाक़िया

अंग्रेज़ी दौर-ए-हकूमत का एक वाक़िया यूं बयान किया जाता है कि किसी जगह एक क़ता अर्ज़ी को लेकर मुस्लमानों और हिन्दुओं के माबैन तनाज़ा था दोनों फ़रीक़ उस की मिल्कियत के दावेदार थे मुक़द्दमा अदालत में अंग्रेज़ अफ़्सर के रूबरू पहुंच गया बात गवाही की आई तो उसी शहर में कोई ऐसे बुज़ुर्ग भी थे जिन पर दोनों फ़रीक़ मुकम्मल एतिमाद करते थे उनके बारे में मशहूर था कि वो कभी झूट नहीं बोलते,यक़ीनन वो क़ुरआन पढ़ते होंगे और उन्हें मालूम होगा कि सिद्दीक़ीन का दर्जा अनबीण वशहद एके साथ है और वो ये भी जानते होंगे कि रसूल अल्लाह की दो बड़ी सिफ़ात जिनको दुश्मन भी तस्लीम करते थे वो आपका सादिक़ और अमीन होना था, लिहाज़ा दोनों इस पर मुत्तफ़िक़ हो गए कि वो बुज़ुर्ग जिसके हक़ में गवाही दे दें ज़मीन उसी की तस्लीम कर ली जाएगी, बालाआख़र उन्होंने हिन्दुओं के हक़ में गवाही दी लिहाज़ा फ़ैसला हिंदूओं के हक़ में हुआ वर ज़मीन उनको दे दी गई, इस क़िस्सा का मुवाज़ना एक दीगर हक़ीक़ीत-ए-वाक़िया से कीजिए ,हमने इस मज़मून के शुरू में एक मस्जिद के इमाम का ज़िक्र किया था जिन्हों ने चंद लोगों को ग़रीबों का तआवुन करते देखा तो उनको लगा कि ये कोई यहूद वनसारी की साज़िश है भला मुस्लमान ऐसा काम क्यूँ-कर अंजाम दे सकते हैं लिहाज़ा वो हरकत में आगए और उन्होंने फ़ोन से मैसेज कर के ऊला ये सवाल किया कि आप लोगों के पास पैसा अमरीका से आरहा है या लंदन से आरहा है और ये भी सवाल किया कि ये काम आप लोग अमरीका के लिए कर रहे हो या इसराईल के लिए।
इस वाक़िया से ये तो समझा जा सकता है कि रिफ़ाह-ए-आम और ख़िदमत-ए-ख़लक़ का काम इस दौर के मुस्लमानों में इस क़दर अजनबी है कि अगर कोई मामूली दर्जे पर भी ये काम करे तो अपने ही लोगों को यक़ीन नहीं आता कि मुस्लमान भी ऐसा कर सकता है और उन्हें ये लगने लगता है कि ये काम तो यहूद वनसारा का या ग़ैर मुस्लिम हिंदूओं का है अगर कुछ मुस्लमान ऐसा कर रहे हैं तो ज़रूर इस में कोई साज़िश है और ऐसा करने वाले दुश्मनों के आला-ए-कार हैं जो मुस्लमानों को नुक़्सान पहुंचाना चाहते हैं ।
यही वजह हुई कि जब मज़कूरा दिल-आज़ार दो पैग़ामात मसूल होने के बाद इन्ही साहिब के फ़ोन से तीसरा पैग़ाम ये मौसूल हुआ कि हम जल्द ही मस्जिद मस्जिद जा कर मुस्लमानों को तुम लोगों से होशयार रहने के लिए अवाम में बेदारी पैदा करने का काम करेंगे तो चंद साथीयों ने उनके फ़ोन नंबर पर जिससे मज़कूरा पैग़ामात मौसूल हुए थे राबिता कर के मालूम करना चाहा कि मौसूफ़ कौन हैं तो आँजनाब ने बताया कि वो एक मस्जिद में इमामत के फ़राइज़ अंजाम देते हैं और जब साथीयों ने उनसे ये पूछा कि उनको ग़रीबों की मदद करना यहूद-ओ-निसारी की साज़िश कैसे नज़र आई तो जनाब को कोई जवाब ना बन पड़ा लिहाज़ा झूट का एटम-बम फेंकते हुए ये फ़रमाया कि मैंने जिन साहिब को ये मैसेज किया है वो मेरे बे-तकल्लुफ़ दोस्त हैं और मैंने ये सब मज़ाक़ में लिखा है, बंदे ने साथीयों से ये बात सुनी तो मुझे भी लगा कि हो सकता है असाही हो लिहाज़ा मैंने तसदीक़ के लिए अजनबी बन कर उसी नंबर पर बात की तो जनाब मुझसे भी मेरा नाम लेकर यही फ़र्मा रहे थे कि वो तो मेरे बे-तकल्लुफ़ दोस्त हैं औरमैं ने तो ये बातें मज़ाक़ में लिखी हैं ,उन्हों ने इन बातों को संजीदगी से ले लिया मैंने उनसे नाम पूछा तो उन्होंने मज़ाहिर उल-हक़ बताया मैंने सोशल मीडीया के वास्ते से जनाब का फ़ोटो मुलाहिज़ा किया तो मालूम हुआ मेरी उनसे दोस्ती क्या कोई दौर की भी दीद शनीद नहीं है ।
ये तफ़सील पेश करने का मतलब ये है कि सच्च बोलना झूट ना बोलना सिदक़-ओ-अमानत जिसके बारे में रसूल अल्लाह ने फ़रमाया कि मोमिन सब कुछ हो सकता है लेकिन झूटा नहीं हो सकता ,झूट का शुमार कबीरा गुनाहों में किया गया है ,क़ुरआन में सिद्दीक़ीन का शुमार शहदन के साथ है लेकिन इस की एहमीयत वो समझे जो क़ुरआन को समझ कर पढ़े मगर जो क़ुरआन को समझने पर ही पाबंदी लगाए ख़ुद समझे ना दूसरों को समझने दे उस के यहां सच्च बोलने की एहमीयत बस ऐसी ही होगी जैसी एक ग़ैर मुस्लिम के यहां है, झूट बोलना जिस क़दर एक ग़ैर मुस्लिम बुरा समझेगा बस ऐसा ही एक आम मुस्लमान या एक मस्जिद का इमाम भी समझेगा ।
एक दूसरी मिसाल देखिए ,जैसा कि ज़िक्र हुआ कि मज़कूरा इमाम साहिब ने लिखा था कि हम जल्द ही आम मुस्लमानों को तुम लोगों से होशयार करने का काम करेंगे लिहाज़ा वही साहिब जिन्हों ने ये कह कर साथीयों को मुतमइन कर दिया था कि जिनको मैंने ये मैसेज भेजा है वो मेरे बे-तकल्लुफ़ दोस्त हैं उन्हें के बारे में बराबर ये ख़बरें मिलती रहती हैं कि आज यहां बैठे ग़ीबत का बाज़ार गर्म किए हुए थे और कल वहां बैठे ।
क़ुरआन में ग़ीबत करने से किस क़दर सख़्त लहजे में रोका गया है इस का अंदाज़ा उसे हो सकता है जो क़ुरआन में दर्ज उस के मफ़हूम को समझे, क़ुरआन-ए-करीम में ऐसे शख़्स को अपने मुर्दार भाई का गोश्त खाने जैसा कहा गहा है (सूरा हजरात आयत १२)जो क़ुरआन-ए-करीम को हुक्म रब-ए-करीम जान कर पूरे एतिक़ाद के साथ उसे समझ बूझ कर पड़ेगा उस के तो रौंगटे खड़े हो जाएंगे और वो इस बुराई से रुकने की कोशिश करेगा वर्ना उमूमी तौर पर तो एक काफ़िर भी ये समझता है कि किसी की पीठ पीछे बुराई करना बुरी बात है ,लिहाज़ा जैसा एक काफ़िर इस से रुकता है ऐसा ही एक मुस्लमान रुकेगा चाहे वो इमामों का इमाम ही क्यों ना हो।
एक हदीस का मफ़हूम है कि एक दफ़ा रसूल अल्लाह ग़ीबत (किसी की पीठ पीछे बुराई )पर वईद बयान कर रहे थे तो सहाबा ने पूछा कि या रसूल अल्लाह अगर वो बुराईयां उस शख़्स में हूँ तो ? आपने फ़रमाया कि तभी तो ग़ीबत है और अगर वो बुराई इस में मौजूद ना हो तो फिर वो बोहतान है ,जिसकी सज़ा आख़िरत में जो मिलेगी वो तो वहां मिलेगी ,दुनिया में भी ऐसे शख़्स के लिए इसी कोड़े लगाने की सज़ा है ।
बहर-ए-हाल इन दो रकात के इमामों ने कुछ सानवी दर्जे की ज़ाहिरी एशियन (लिबास और हुल्या वग़ैरा)को देन का पहला पाएदान बनालिया है जब कि नसोस माक़ूली-ओ-मनक़ोली से वो इन सब चीज़ों की हैसियत इस्तिहबाब से ज़्यादा साबित करने से क़ासिर हैं ,सानवी दर्जे की इन एशियन को अपनाने पर क़ुरआन-ओ-हदीस में जन्नत का वाअदा नहीं है और छोड़ने पर वईद नहीं है,उन्हें अंजाम देने में किसी तरह की मुआशरती ,अख़लाक़ी ,या किसी दीगर किस्म की तबदीली भी वाक़्य नहीं होती, मज़हब इस्लाम की जिस क़दर भी तालीमात हैं जिनका बुनियादी मणख़ज़ क़ुरआन-ए-करीम है वो सबकी सब ऐसी हैं जिनको इख़तियार करने में मुआशरती तबदीली वाक़्य होती है ,कलिमा का इक़रार कर के इन्सान ख़ुद को अपने ख़ालिक़ की सुपुर्दगी में देकर दीगर हैवानों से मुमताज़ हूजाता है, नमाज़ से नमाज़ी के अंदर हमावक़त अपने ख़ालिक़ वमालक की निगरानी में रहने का एहसास जागता है जो गुनाहों से रुकने का सबब बनता है ,ज़कात से इक़तिसादी नाहमवारी का अज़ाला होता है ,रोज़े से ग़रीबों के दर्द को समझने का एहसास पैदा होता है ,इस के बाद दीगर करानी तालीमात को लीजिए ,समाज-ओ-तमद्दुन और मुआशरे की तरक़्क़ी के नकात क़दम क़दम नज़र आएंगे ,ग़रीबों की मदद पड़ोसीयों के हुक़ूक़ ,वालदैन की ख़िदमत और उनका एहतिराम ,आपसी लेन-देन और तिजारत के उसूल ,बुरे कामों के इर्तिकाब पर ताज़ीरात और नेक कामों पर जन्नत का वाअदा ,वग़ैरा वग़ैरा, एक बेहतर मुआशरे की तशकील करते नज़र आते हैं ,लेकिन बुनियादी चीज़ों को छोड़कर अगर डाढ़ी टोपी कुर्ता पाएजामा जैसी ख़ारिजी एशियन को अस्लुलउसूल बना लिया जाये जो किसी भी तरह मुआशरे में तबदीली का सबब ना बनें तो फिर एक मुस्लिम मुआशरे और ग़ैर मुस्लिम मुआशरे में कोई फ़र्क़ नहीं होगा ,और अगर कुछ फ़र्क़ होगा तो ये कि मुस्लमान हामिल क़ुरआन हो कर भी इस के अहकामात को नज़रअंदाज करने के जुर्म में अल्लाह के इताब के मुस्तहिक़ ज़रूर ठहरेंगे।
मुस्लमानों की तारीख़ में ऐसा दौर पहले भी गुज़र चुका है ये दौर वो था जिसके बाद दुनिया के ज़ालिम तरीन हुक्मराँ हलाकू की सरकर्दगी में वहशी तातारियों ने मुस्लिम दुनिया पर क़हर बरपा कर के उसे तह-ओ-बाला कर दिया था और उनके दार-उल-ख़लाफ़ा बग़दाद की गलीयों को ख़ून से भर दिया था उसने इन्सानी खोपड़ियों से बग़दाद में गनबद तामीर किराया था मज़हबी किताबों के कुतुब ख़ानों में आग लगवा कर दरयाए फुरात और दजला की नज़र कर दिया था ,लिखा है कि किताबों की स्याही से महीनों तक दरयाए दजला और फुरात का पानी स्याह नज़र आता रहा ,तारीख़ की किताबों में दर्ज है कि वो मुस्लिम क़ौम जो कभी पूरी दुनिया से ख़राज वसूल करती थी इस दौर में इस के ख़ौफ़ का आलम ये था कि एक तातारी औरत एक मुस्लमान को देखती और उसे कहती कि रुक जा ,में घर से तलवार उठा कर लाती हूँ तुझे क़तल करना है ,तो मुस्लमान की हिम्मत नहीं थी कि भाग जाये बल्कि वो उस के ख़ौफ़ से वहीं ठहरा रहता था और क़तल होजाता।
हमने इस मज़मून के शुरू में इस्लामी तारीख़ के मशहूर नावल निगार मुर्ख़ नसीम हिजाज़ी के हवाले से लिखा था कि जिस वक़्त तातारी मुस्लमानों कोक़त्ल करने के लिए अपनी तलवार और नेज़े दरुस्त कर रहे थे उस वक़्त मुस्लिम अलिमन इन बातों की बेहस-ओ-तकरार में मुलव्वस थे कि कौनसा फ़िर्क़ा हक़ पर है ।
हम जिस दौर में जी रहे हैं ये इस दौर से काफ़ी मुमासिल नज़र आता है, अल्लाह ख़ैर का मुआमला फ़रमाए
एक और तजज़िया निगार ने इस दौर के मुस्लमानों के हालात पर तबसरा करते हुए लिखा है कि।
अब्बासी दौर में मुस्लमानों के अंदर दीनी ज़वाल आया ,उस ज़माने में मुस्लमानों का हाल ये हुआ कि कुछ रस्मी आमाल और मख़सूस वज़ा क़ता देनदारी की अलामत बन गए ।
माहनामा । अलरसाला ,नवंबर २००९ ईः-ए-
अब्बासी दौर का ख़ातमा तातारियों की यलग़ार के बाद ही हुआ ,इस यलग़ार से ना सिर्फ ख़िलाफ़त अब्बासिया का ख़ातमा हुआ बल्कि मुस्लमानों का गढ़ समझा जाने वाला पूरा जज़ीरৃ अलारब तह वबाला हो कर रह गया और कोई बईद नहीं था कि इस्लाम के मुक़ामात मुक़द्दसा भी वहशी तातारियों के हाथों पामाल हो जाएं कि अल्लाह ने उन्हें वहशी तातारियों के लिए हिदायत का सामान कर दिया और रफ़्ता-रफ़्ता वो पूरी क़ौम ही मुस्लमान हो गई ।
इसी को अल्लामा इक़बाल ने अपने एक शेअर में इस तरह कहा है कि ।

है अयाँ फ़ितनए- तातार के अफ़साने से

पासबाँ मिल गए काबे को सनम-ख़ाने से

मुअर्रिख़ीन ने लिखा है कि जहां (तातारियों के मुक़ाबले पर )मुस्लमानों की तलवारें कुंद हो गईं वहां इस्लाम की हक़्क़ानियत ने तातारियों को ज़ेर कर दिया और वो सब दाइरा-ए-इस्लाम में दाख़िल हो गए फिर उन्हें में से उसमानी तुर्कों की वो जमात ब-रू-ए-कार आई जिसके जिलौ में मिल्लत की निशात सानिया के दौर की इबतिदा हुई और उन्होंने इस अज़ीम ख़िलाफ़त उस्मानिया की दाग़ बैल डाली जिसने एक-बार फिर सदीयों तक इस्लाम का पर्चम पूरी दुनिया पर उस वक़्त तक लहराए रखा ,जब तक उस की ना-काबिल तसख़ीर ताक़त के क़िले को दुश्मनों ने घर का भेदी बन कर ढा ना दिया ,जिसमें दो रकात के इमामों का पूरा पूरा हाथ है।
इन्सानी तारीख़ काया अहम वाक़िया मुस्लमानों के लिए ताज़ियाना-ए-इबरत है लेकिन दो रकात के इमामों ने इस हादिसए- क़ियामत सुग़रा को भी अपनी ख़ुराफ़ात के लिए ख़ूब इस्तिमाल किया चुनांचे दो रकात के इमामों के ज़रीया लिखी गई किताबों में तातारियों के क़बूलीयत इस्लाम के वाक़े की तशरीह ,ब-तौर-ए-ख़ास ये कि इजतिमाई तौर पर पूरी क़ौम के इस्लाम क़बूल करने की वजह क्या थी?इस के मुताल्लिक़ कम-अज़-कम तीन तरह की कहानियां तो बज़ात-ए-ख़ुद राक़िम नाम निहाद मज़हबी किताबों में पढ़ चुका है ,आपने भी यक़ीनन मज़हबी महफ़िलों में ये मन घड़त क़िस्से मुख़्तलिफ़ ज़ावियों से ज़रूर सुने होंगे ,जो कुछ यूं हैं ।
एक साहिब ने बयान किया कि दर असल मुस्लमान तातारियों पर ज़ुलम किया करते थे तो एक बार तातारी क़ौम ने इकट्ठे हो कर मश्वरा किया कि चलो मुस्लमानों के ख़ुदा से ही मदद मांगते हैं लिहाज़ा उन्हों ने एक पहाड़ी पर जमा हो कर ये दुआ की कि ए मुस्लमानों के ख़ुदा ये तेरे नाम-लेवा हमारे ऊपर बड़ा ज़ुलम करते हैं तो अगर सच्चा ख़ुदा है तो हमें उनके ज़ुलम से नजात दे ,ये दुआ करने पर ग़ैब से आवाज़ आई कि तुम उनके ऊपर हमला कर दो हम तुम्हारा साथ देंगे ,ग़ैब से ये आवाज़ सुनी तो उन्होंने ऐसा ही किया और मुस्लमानों को काबिल-ए-इबरत सज़ा दी हत्ता कि पूरी मुस्लिम क़ौम को तह वबाला कर डाला,उस के बाद वो फिर एक जगह जमा हुए और इस बार ये चर्चा हुई कि हमने मुस्लमानों के ख़ुदा ही से तो मदद मांगी थी जो उसने की ,तो अब हमें उस का शुक्रगुज़ार होते हुए उस की माबूदियत का इक़रार कर लेना चाहीए और इस तरह वो सब के सब मुस्लमान हो गए ।
जब कि तारीख़ में ऐसा कोई सबूत नहीं मिलता कि तातारी भी किसी दौर में मज़लूम क़ौम रही हो ,इस लिए ये महिज़ बे सफ़े की बात है इस के सिवा कुछ नहीं ।
दूसरा क़िस्सा यूं बयान किया जाता है कि एक तातारी हुक्मराँ ने मुस्लमानों की एक बस्ती को ख़ाली करने का हुक्म दिया तो बस्ती ख़ाली कर दी गई लेकिन एक मस्जिद में दो अफ़राद क़ुरआन की तिलावत में मशग़ूल रहे और बस्ती छोड़कर ना गए लिहाज़ा तातारियों के हुक्मराँ ने उन्हें गिरफ़्तार कर के अपने रूबरू हाज़िर किराया और उनसे वजह पूछी तो उन्हों ने कहा कि हम लोग क़ुरआन की तिलावत कर रहे थे ,उसने कहा कि क़ुरआन क्या होता है मुझे भी इस की तिलावत कर के सुनाओ लिहाज़ा उसने क़ुरआन की तिलावत सुनी और ऐसा मतणसर हुआ कि मुस्लमान हो गया और इस के मुस्लमान होने से इस की पूरी क़ौम मुस्लमान हो गई ।
और तीसरा क़िस्सा यूं बयान किया जाता है कि एक-बार एक तातारी अपने कुत्ते को घुमाने लिए जा रहाथा रास्ते में उसे एक मुस्लमान मिला उसने मुस्लमान को क़तल करने का बहाना तलाशते हुए मुस्लमान से पूछा कि बता तो अच्छा है या मेरा ये कुत्ता तुच्छ से अच्छा है उसने सोचा कि अगर मैंने ख़ुद को अच्छा कहा तो ये शख़्स मुझे क़तल कर डालेगा लिहाज़ा इस ने ये जवाब दिया कि मेरे पास ईमान की दौलत है अगर में इस से महरूम हो जाऊं तो फिर ये तेरा कुत्ता ही मुझसे बेहतर है तातारी ने पूछा कि ईमान क्या होता है ,मुस्लमान ने उसे ईमान की तफ़सील समझाई और बात उस की समझ में आगई लिहाज़ातातारी ने मुस्लमान से कहा कि मैं शाह-ए-वक़्त का वलीअहद हूँ जब मैं हुक्मराँ बन जाऊँगा तो तुम मुझसे मिलना और मुझे भी इस्लाम में दाख़िल कर लेना लिहाज़ा जब वो बादशाह बन गया तो ये मुस्लमान बड़ी मशक़्क़त से किसी तरह इस से मिला और वो तातारी बादशाह मुस्लमान हो गया और फिर उस के मुस्लमान होने से तमाम तातारी मुस्लमान हो गए ।
क्या आप समझते हैं कि किसी वहशी और बरबर क़ौम का मुस्लमान होजाना इतना आसान है जिस काम के लिए अल्लाह के महबूब नबी ने पत्थर खाए उस को इस क़दर आसान बना कर पेश कर देना इन दो रकात के इमामों का ही कारनामा है ये क़िस्से कहानियां इन किताबों में दर्ज हैं जिनको यहदो रकात इमाम क़ुरआन को नज़रअंदाज करते हुए आमৃालमसलमीन को पढ़वाते हैं और उन्हें तक़रीरों में सुनाते हैं।
ज़ाहिर है कि ये तीनों एक साथ सच्च नहीं हो सकते उनमें से यातो कोई एक सच्चा होगा तो दूसरे दो लाज़िमी झूट होंगे, और सच्च तो ये है कि ये तीनों झूट हैं ,हक़ीक़त ये है कि तातारियों ने लाखों मुस्लमानों को तो तह तेग़ कर दिया था जो बच रहे थे उनमें से बहुत से ग़ुलाम और बांदियां बना लिए गए और जो किसी तरह बच गए उनमें से कुछ ज़ी-शुऊर अफ़राद ने मिशन के तौर पर तातारियों में दावत देन का काम किया और उनको इस्लाम की क़दर-ओ-क़ीमत समझाई एक जानिब उन अफ़राद की मेहनत थी तो दूसरी जानिब तातारी अपने मुस्लमान ग़ुलाम और बांदियों का इस्लामी तर्ज़-ए-अमल देखते थे जो उनको बेहद मतणसर करता था इस दुहरे तणसर से रफ़्ता-रफ़्ता पूरी क़ौम इस्लाम के आग़ोश में आगई और फिर वही दुनिया के सामने इस्लाम के लिए ढाल बन कर खड़े हो गए ।
आज इस मुल्क में मुस्लमानों के जो हालात हैं वो बईना ऐसे ही नज़र आरहे हैं जैसे मुस्लमानों के इस वक़्त के दार-उल-ख़लाफ़ा बग़दाद की तारीख़ में तातारियों के हमले से पहले के पढ़ने को मिलते हैं वही आपसी फ़िर्काबंदी ,वही अपने हक़ में जन्नत के जुमलाहुक़ूक़ महफ़ूज़ कर लेना और दूसरे को काफ़िर और जहन्नुमी कहना और समझना वही मज़हब के नाम पर सिर्फ ज़ाहिरी वज़ा क़ता को एहमीयत देना और मज़हब की हक़ीक़ी तालीमात से रुगिरदानी करना (अल्लाह-तआला अपने अमान में रखे )आज भी हल सिर्फ और सिर्फ दावत का अमल है, इस वक़्त मलिक के फ़िकऱ्ापरस्त मख़सूस टोले ने मुल्क में बसने वाली दो बड़ी आबादीयों मुस्लिम अक़ल्लीयत और हिंदू अक्सरीयत के माबैन नफ़रत की गहिरी ख़लीज पैदा कर दी है जिसने सूरत-ए-हाल को धमाका ख़ेज़ बना कर रख दिया ,नफ़रत की ये ख़लीज इस्लाम ओ रमसलमानों के बारे में झूटे परोपीगनडों और ग़लत-फ़हमियों पर क़ायम की गई है ऐसे में जब हम एक ग़ैर मुस्लिम के सामने इस्लाम की हक़ीक़ी सूरत-ए-हाल रखते हैं तो दो में से एक फ़ायदा ज़रूर होता है या तो अल्लाह उसे हिदायत से नवाज़ देता है नहीं तो इस की ग़लतफ़हमी दूर होती है और नफ़रतें आपसी मेल मिलाप में तबदील होजाती हैं ,लेकिन क्या आपने इस बात पर ग़ौर किया कि दावत का ये अमल जिसको अल्लाह के रसूल ने अपनी आख़िरी सांस तक किया और फिर ये ज़िम्मेदारी उम्मत के कंधों पर डाली और दौर-ए-हाज़िर का भी यही आख़िरी हल है उसे अगर इस दौर में कोई करने खड़ा हो जाये तो सबसे ज़्यादा मुख़ालिफ़त उन्हें दो रकात के इमामों की जानिब से सामने आती है और ऐसा करने वाला उन्हें यहूदीयों और ईसाईयों का एजैंट नज़र आने लगता है ,इस दौर में जिन अफ़राद ने ये काम शुरू किया है उनमें से एक भी इन दो रकात के इमामों में से नहीं है जब कि ये काम उन्हीं का था उस के बिलमुक़ाबिल जिस दाई ने जिस क़दर बड़े पैमाने पर काम किया उस की इसी पैमाने पर इन दो रकात के इमामों ने मुख़ालिफ़त की ,इस मुल्क में सबसे ऊंचे पैमाने का काम डाक्टर ज़ाकिर नाविक का था लहाज़ाउनहीं क्या क्या ना कहा गया ये सब के सामने है सबसे बड़ा इल्ज़ाम तो यही था कि वो यहूद वनसारा के एजैंट हैं,जो इन्सान कुफ़्र के सामने दीवार बन कर खड़ा हो गया हो जिसके सामने कोई बड़े से बड़ा मुनाज़िर ना ठहरता हूजो तमाम बातिल मज़ाहिब को खुला चैलेंज देता हो और हमेशा जीता हो कभी हार कर उसने इस्लाम या मुस्लमानों को रुस्वा ना क्या हो, जिसने मुस्लमानों की नई नसल को नया हौसला दिया हो और इस की तक़ारीर सन सुनकर वो अपने अंदर नई तवानाई महसूस करने लगे हूँ जिस शख़्स ने दुनिया को लात मार कर इस्लाम के दिफ़ा के लिए अपनी ज़िंदगी वक़्फ़ कर दी हो ,वो भी यहूदीयों का एजैंट हुआ तो फिर मुस्लमानों का एजैंट क्या सिर्फ वही हैं जो उसे बस रुस्वा ही करना जानते हैं ,इस दौर का मशहूर अमरीकी मुस्तश्रिक़ डॉक्टर-ए-विलियम गैंबल जिसने दो दर्जन से ज़्यादा किताबें इस्लाम के ख़िलाफ़ तसनीफ़ की लेकिन दुनिया में मौजूद इस्लाम के नाम लेवाओं में से कोई जवाब देने के लिए सामने ना आसका हती कि ज़ाकिर नाविक ने ख़ुद अमरीका जाकर उसे मुनाज़रा के लिए ललकारा ,नतीजे के बतौर दोनों के माबैन अमरीका की ही सरज़मीन में खुले स्टेज पर मुनाज़रा हुआ जिसमें डाक्टर विलियम की कर्रारी हार हुई, इधर इंडिया में मिस्टर अरुन शौरी ने फुतूओं की दुनिया नामी किताब लिख कर इस्लाम पर कीचड़ उछाला था जिसमें उसने (नॉइज़ अल्लाह ) क़ुरआन को दुनिया की बदतरीन किताब कहा और इसी नाम का एक बाब अपनी तसनीफ़ में क़ायम क्या, उस का जवाब देने के लिए भी कोई सामने नहीं आया सिवाए ज़ाकिर नाविक के जिसने खुले स्टेज से इस की बातों का जवाब देते हुए उसे बारहा मुनाज़रे की दावत दी ,डाक्टर ज़ाकिर के चैलेंज के बाद से ना तो विलियम गैंबल की कोई तसनीफ़ इस्लाम के ख़िलाफ़ आई ना हिन्दोस्तान में अरुन शौरी का क़लम इस मौज़ू पर उठ सका, एक ऐसा शख़्स जो दुनिया भर में कुफ़्र की हड्डियां पिसलियाँ उस के घर में घुस कर तोड़ रहा हो और कभी भी हार का मुँह देखकर इस्लाम की रुस्वाई का सबब ना बना हो बल्कि उसने हमेशा इस्लाम को सुर्ख़-रू ही क्या हो, अगर ऐसा शख़्स भी इन दो रकात के इमामों की नज़र में यहूद-ओ-नसारा का एजैंट है तो फिर इस्लाम का एजैंट क्या वो होता है जो इस्लाम और मुस्लमानों को रुस्वा होता देखे और ख़ामोश रहे ,इन दो रकात के इमामों के अमल से तो ऐसा ही लगता है ,और उनका जाल कितना वसीअ है इस को भी देखें कि इस मुल्क में एक तवील मुद्दत तक ये चलता रहा कि हिंदू दहश्तगर्द जगह जगह बम धमाके करते और इल्ज़ाम मुस्लमानों के सर जाता था कि दो हज़ार सात में एक ईमानदार जांच अफ़्सर हेमंत कर करे ऐसा सामने आया जिसने हिंदू दहश्तगरदों की क़लई खोलनी शुरू की और उन केसों के हक़ीक़ी कारिंदों को उसने जेल में पहुंचाना शुरू कर दिया जिन के झूटे इल्ज़ाम में मुस्लिम नौजवान जेलों में बंद थे ,एक ऐसा पुलिस अफ़्सर जो मलिक के मुस्लमानों के सर से नागहां उनके सर थोपा हुआ दहश्त गर्दी का इल्ज़ाम धो रहा था और इस की जद्द-ओ-जहद से हिन्दोस्तान के मुस्लमान थोड़ा इतमीनान की साँसें लेने लगे थे कि मुबय्यना ख़बरों के मुताबिक़ पाकिस्तान में बैठे एक दो रकात के इमाम ने दस दहश्तगरदों को हिन्दोस्तान भेज कर२६/११ के मशहूर हादिसे में हेमंत कर करे और इस के साथी विजय सालसकर के साथ उस की मुकम्मल टीम का ही क़तल करा दिया ,२६/११ के मुंबई हादिसे को देखने से ऐसा लगता है कि पाकिस्तान से दस दहश्तगर्द बस एक यही काम अंजाम देने आए थे ।
दो रकात के इमामों के इस आलमी नैटवर्क में एक बात क़दरे मुश्तर्क और भी है जो ज़ाकिर नाविक के ताल्लुक़ से नज़र आती है वो ये कि एक दूसरे को काफ़िर कहने वाले शीया ,सुनी और देवबंदी ,बरेलवी यानी बड़े बड़े मुख़्तलिफ़ अलिफ़ लख़याल ग्रुप ज़ाकिर नाविक जैसे दाओं की मुख़ालिफ़त में एक साथ नज़र आते हैं ।
अल्लामा इक़बाल ने अपनी मशहूर नज़म इबलीस की मजलिस-ए-शूरा में शैतान की ज़बान से जो अशआर कहलवाए हैं उनको पढ़ कर ऐसा लगता है इक़बाल की नज़म के तसव्वुराती इबलीस के मश्वरों पर ये दो रकात के इमाम पूरा पूरा अमल कर रहे हैं ।
जानता हूँ में, ये उम्मत हामिलॱएॱ क़ुरआँ नहीं है वही सरमाया-दारी बंदा-ए-ममन का दें
अस्र-ए-हाज़िर के तक़ाज़ों से है लेकिन ये ख़ौफ़ हो ना जाये आश्कारा शरअ पैग़ंबर कहीं
चश्मॱएॱ आलम से रहे पोशीदा तो, ख़ूब ये ग़नीमत है कि ख़ुद मोमिन है महरूम यक़ीन
है यही बेहतर अलाहीअत में उलझा रहे ये किताब-उल-ल्लाह की तावीलात में उलझा रहे
तोड़ डालीं जिसकी तक्बीरें तिलसम शश-जहात हो नहर विशन उस ख़ुदा अंदेश की तारीक रात
तुम उसे बेगाना रखू आलिम किरदार से ताबसात ज़िंदगी में इस के सब मुहरे हूँ मात
ख़ैर इसी में है क़ियामत तक रहे ममन ग़ुलाम छोड़कर औरों की ख़ातिर ये जहान बे-सबात
है वही शेअर-ओ-तसव्वुफ़ उस के हक़ में ख़ूब-तर जो छुपा दे उस की आँखों से तमाशाए हयात
हर-नफ़स डरता हूँ उस की बेदारी से में है हक़ीक़त जिसके दें की एहतिसाब कायनात
मस्त रखू ज़िक्र-ओ-फ़िक्र-ओ-सह्र गाही में उसे पुख़्ता तर कर दो मिज़ाज ख़ानक़ाही में उसे
ये है वो ख़ौफ़ जो दो कात के इमामों को लाहक़ है कि बड़ी मुश्किल से तो उन्होंने शरापैग़ंबर को छुपाया था फिर ये कौन हैं जो इस को आश्कारा करने पर लगे हुए हैं ?ऐसे लोगों का रास्ता रोकने का आसान तरीक़ा उनके नज़दीक ये है कि जो कोई ऐसा काम करे जिसमें शरा पैग़ंबर आश्कारा हो उसे बेदीन कह कर उस की मिट्टी पलीद कर दी जाये उनके पास यही एक हथियार है जिसके ख़ौफ़ से कोई उनके ख़िलाफ़ ज़बान खोलने को तैयार नहीं होता ।
मैंने एक साहिब से पूछा जो ख़ैर से आलम दीन भी हैं कि हमारे साथी सर्दीयों में ग़रीबों को सैकड़ों की तादाद में लिहाफ़ तक़सीम करते हैं ,कम अज़ कम रमज़ान में ही सही उन घरों में जिनके यहां बज़ाहिर कोई कमाने वाला नहीं है जिनमें ज़्यादा-तर बेवाऐं या मुस्तक़िल बीमार होते हैं कम-अज़-कम एक महीने का राशन पहुंचाने का काम करते हैं ,साल में दो-चार ऐसे तलबा की फ़ीस जमा करा देते हैं जो फ़ीस ना होने के सबब तालीम से महरूम रह जाते, आख़िर इन कामों में बुराई किया है जो आप लोगों को हम नागवार गुज़रते हैं तो आँजनाब ने फ़रमाया कि तुम्हारी जमात में दो लोग तो जमात-ए-इस्लामी के हैं और दो बरेलवी हैं और तुम्हारा यही मालूम नहीं कि तुम किस जमात के हो ।
फ़िर्काबंदी है कहीं और कहीं ज़ातें हैं
क्या ज़माने में पनपने की यही बातें हैं (अल्लामा इक़बाल)
हम लोग हर हफ़्ते मिल बैठते हैं ऊला मुताला क़ुरआन से महफ़िल की अबतदण करते हैं फिर गुज़शता हफ़्ते की कारकर्दगी और अगले हफ़्ते का लाइह-ए-अमल तै करते हैं ,दरअसल मिल्लत इस क़दर गहिरी नींद सोई हुई है कि हम लोगों ने अबतदण में ही ये तै किया था कि अगर अपने अंदर बेदारी लानी है तो हमें कम-अज़-कम हर हफ़्ते किसी एक दिन मिल बैठना होगा और क़ुरआन से जुड़ ने के लिए इस को समझ कर पढ़ना होगा लेकिन करम फ़रमां दो रकात के इमामों को ये काम दीन से दूरी ,इस्लाम दुश्मनी ,यहोदीत और ईसाईयत नज़र आने लगी , एक दो रकात के इमाम ने सोशल मीडीया पर ये सब अलफ़ाज़ हमारे साथीयों के लिए इस्तिमाल किए हैं और उनके इलावा भी कुछ उन जैसों के मज़कूरा किस्म के तबसरे सुनने को मिलते रहते हैं ।
रक़ीबों ने रपट लिखवाई है जा-जा कर के थाने में
कि अकबर नाम लेता है ख़ुदा का इस ज़माने में
बीसवी सदी के नसफ़ अव्वल में इस्लामी नशाৃसानीह बरपा करने के लिए कई तहरीकें खड़ी हुईं बर्र-ए-सग़ीर में बरपा होने वाली दो तहरीकें काबिल-ए-ज़िक्र हैं एक मौलाना इलयास ऒ की क़ायम करदा तब्लीग़ी जमात और दूसरी मौलाना मौदूदी ऒ की क़ायम करदा जमात-ए-इस्लामी ,तब्लीग़ी जमात का एक नकाती प्रोग्राम था ,लोगों को नमाज़ी बनाना जिसमें वो काफ़ी तक कामयाब रही और इस की मेहनतों से वो मस्जिदें जो मुस्लमानों से ख़ाली हो चुकी थीं दुबारा से आबाद हो गईं हती की आज ये देखा जा सकता है कि जिन इलाक़ों में जमात का काम नहीं है वहां की मस्जिदें नमाज़ियों को तरस रही हैं,यक़ीनन ये एक अहम काम था जिसको सराहा जाना चाहीए ।
दूसरी जमात थी जमात-ए-इस्लामीउस का नक़तए- नज़र ये था कि जिस तरह क़ुरआन-ए-करीम में नमाज़ का ज़िक्र है इसी तरह और इसी पैमाना का ज़िक्र और हुक्म दोनों ,सदक़ात और ज़कात का भी है इस लिए जिस तरह मस्जिद मस्जिद नमाज़ का बंदो बस्त है इसी तरह ज़कात के लिए बैत-उल-माल भी क़ायम होजस में मुहल्ले के मुस्लमानों की ज़कात जमा हो और इस से ग़रीबों की मदद की जाये ,इसी तरह उस की ये भी पेशकश थी कि क़ुरआन-ए-करीम में दीन और दुनिया ,दीन और सियासत, दीन और समाज अलग अलग नहीं हैं इस लिए ऐसी कोशिश हो कि मुस्लमान किसी भी मैदान में पीछे ना रहें यही वजह है कि जमात-ए-इस्लामी नफ़स इन्सान के तज़किया कल की बात करती है वो माडर्न स्कूल-ओ-कॉलेज खोलने की बात करती है जहां मुस्लिम बच्चे और बच्चीयां इस्लामी माहौल में असरी तालीम हासिल कर सकें ,और ग़ैरों के स्कूलों-ओ-कॉलिजों में जाकर उनके कुफ़रीया कल्चर से महफ़ूज़ रह सकें,वो मुस्लिम अस्पताल खोलने की बात करती है जहां मुस्लमानों को इस्लामी माहौल में ईलाज विम्मा लज्जा और नर्सिंग की सहूलत मयस्सर हो , वो मुस्लमानों को सियासत में मज़बूत करने की बात करती है यानी वो ज़मीन से जड़े मुद्दों को उठाती है , मगरिया मसला तो शैतान पर बहुत गिरां गुज़रता है बड़ी मुश्किल से तो उसने थप् थपी देकर इस क़ौम को सुलाया था फ़िर्या कौन लोग हैं जो दुबारा से उसे जगाने की कोशिश कर रहे हैं लिहाज़ा वो अल्लामा इक़बाल की शेअरी तख़य्युल परवाज़ में यूं सोचने लगता है कि
। हो ना जाये आश्कारा शरा पैग़ंबर कहीं
ख़ाब से बेदार होता है जब ज़रा मह्कूम गर्
फिर सुला देती है इस को ,हुक्मराँ की साहिरी
लिहाज़ा मौलाना मौदूदी की तहरीक जमात-ए-इस्लामी के सामने दोरकात के इमामों का ख़ून गर्मा गया और उन्होंने इस तहरीक के पैर उखाड़ ने की कोशिश शुरू कर दी और उनकी मुख़ालिफ़त में एक दौर की कोड़ी ये लेकर आए कि मौदूदी साहिब सहाबा-ए-किराम पर तन्क़ीद करते हैं ,अगर मोदोदवी साहिब ने सहाबए- किराम पर किसी तरह की तन्क़ीद कर के कोई गुनाह किया है तो अल्लाह के हुज़ूर उस के जवाबदेह वो ख़ुद होंगे ना कि जमात-ए-इस्लामी के वो अफ़राद जो क़ौम को अपने पैरों पर खड़ा करने की कोशिश करते हैं जो मुस्लमानों में असरी तालीम के इदारे और अस्पताल खोलने की बात करते हैं।
ये दो रकात के इमाम जो हमारे ज़ेर तबसरा हैं वो मुस्लिम तहरीकों ,मुस्लिम जमातों और फ़िक्री-ओ-नज़रियाती ग्रुपों के बारे में कितना इलम रखते हैं इस का अंदाज़ा आप जे़ल के-ओ-इक्का से लगा सकते हैं ।
बात इस दौर की है जब आगरा में कुछ हिंदूत्व वादीयों के ज़रीया कुछ इंतिहाई ग़रीब मज़दूर मुस्लमानों को मकान वग़ैरा बना कर देने का लालच देकर उन को हिंदू बना ने की तस्वीरें सामने आई थीं,ये हादिसा यक़ीनन किसी भी साहिब-ए-ईमान को मुतफ़क्किर करने वाला था लिहाज़ा ये तशवीश लाहक़ हुई कि कहीं हमारे आस-पास तो ऐसे ग़रीब मज़दूर अफ़राद नहीं हैं जो उनका आसान लुक़मा बन सकें ,घूम फिर कर देखा गया तो हमें शहर से बाहर कई ऐसे कैंप मिले जिनमें इंतिहाई ख़स्ता-हाली में टाट और गत्तों की झोपड़ियों में एक ऐसा तबक़ा रिहायश पज़ीर है जिसका रोज़गार गंदगियों के ढेर से पुनी या कबाड़ी की एशियन तलाश कर के इस के सहारे दो जून की रोटी मुहय्या कर ना है ये लोग ज़्यादा-तर आसामी हैं और सब के सब मुस्लमान हैं जो अपनी ग़ुर्बत के सबब आम मुआशरती ज़िंदगी से दूर रह कर ज़िंदगी बसर कर रहे हैं, उनसे बात कर के पता चला कि मुस्लमान तो कोई उनकी सुध नहीं लेता ,मगर कुछ ईसाई तंज़ीमें ज़रूर उनके पास आती हैं, उनमें से कुछ नौजवानों को उन्होंने अपने यहां मुलाज़िम भी रख लिया है वो उनके बच्चों को काम सुखाकर रोज़गार पर खड़ा करने की बात करते हैं और उनसे कहते हैं कि इतवार को उनकी सभा में आया करें ,वो ये भी कहते हैं कि आपका जो भी नाम है इस के साथ आप मसीह लफ़्ज़ का इज़ाफ़ा कर लें तो आप लोग हमारे साथी बन जाओगे और तुम्हारे मसाइल हम अपने मसाइल की तरह हल कर आईनगे ,उन लोगों में जो बुज़ुर्ग अफ़राद हैं उनके नाम-ए-नौ र उल-इस्लाम ,नज़र उल-इस्लाम ,रफ़ीक़ उल-इस्लाम जैसे हैं लेकिन नई नसल के नाम ऐसे हैं कि मुस्लिम वग़ैर मुस्लिम में इमतियाज़ मुश्किल हो जाता है

बहर-ए-हाल हम तीन अफ़राद थे ,दो वही जमात-ए-इस्लामी वाले और तीसरा ये ख़ाकसार ,हम तीनों ने अलग अलग तीन कैंप पकड़ लिए और रोज़ाना बाद नमाज़-ए-अस्र हम लोग एक घंटे के लिए उनके बच्चों को क़ुरआन और उर्दू पढ़ाने जाने लगे ,उनके लोगों में इस बात की तशहीर हुई तो एक कैंप और निकल आया और इस कैंप के लोगों ने आकर फ़र्माइश की कि उनके बच्चों को भी पढ़ाया जाये ,लिहाज़ा एक चौथे रज़ाकार की तलाश में राक़िम अपने एक मुआविन मुहम्मद नौशाद फ़ोन नंबर 8868018436 के साथ बराबर के एक मदरसे में चला गया और वहां के मौलाना से कोई ऐसा आदमी देने की फ़र्माइश की जो ख़ारिजी-ओ-कत् में एक घंटा उनके बच्चों को देनी तालीम दे सके और उन्हें ये भी बताया कि तीन कैम्पों में हम तीन लोग ये ख़िदमत अंजाम दे रहे हैं तो मौसूफ़ कहने लगे कि हमें पता है कि जमात-ए-इस्लामी वाले ये शर फैला रहे हैं और तुम लोग भी उनका शिकार हो गए हो ,ख़ैर से ना तो नौशाद भाई जमात-ए-इस्लामी के थे और ना ये ख़ाकसार ही जमात-ए-इस्लामी का था ,लिहाज़ा इस हक़ीर ने अपनी मालूमात में इज़ाफ़ा चाहते हुए मौलाना मौसूफ़ से पूछा कि हज़रत ये जमात-ए-इस्लामी वाले कौन लोग होते हैं ,कहने लगे कि का दयानी ,मैंने कहा कि मैं कुछ समझा नहीं कि का दयानी से किया मुराद होता है ,कहने लगी कि ग़ैर मुक़ल्लिद ,मैंने कहा कि मेरी समझ में अभी भी बात नहीं आई कि ये कौन लोग हैं जिनका आप ज़िक्र कर रहे हैं ,बोले ये वो लोग हैं जो मज़ारों पे चढ़ावा चढ़ाते हैं ,ये सुनकर मैंने तो अपना सर पीट लिया फिर भी मैंने मौसूफ़ से उनकी क़ाबिलीयत ज़रूर पूछ ली तो जनाब ने ख़ुद कुमलक की एक बड़ी इस्लामी दरसगाह का फ़ारिग़-उत-तहसील आलम दीन बताया ।
ये दो रकात के इमाम जिनके सहारे आज पूरी उम्मत चल रही है और उन्होंने मदरसों मकतबों और मस्जिदों में अगली नसल की एक बड़ी तादाद का मसक़बल अपने हाथों में ले रखा है उनकी क़ाबिलीयत का मयार बस यही है ,मुल्क भर में फैले वो हज़ारों बड़े तालीमी इदारे जिनसे हर साल पंद्रह पंद्रह साल का बेशकीमती वक़्त सिर्फ़ कर के पाँच पाँच सौ की तादाद में अफ़राद फ़ारिग़ होते हैं उनमें दस फ़ीसद भी ऐसे नहीं होते जो अरबी में एक ख़त ही लिख सकें या किसी से अरबी ज़बान में बात कर सकें जब कि उन्होंने आठ आठ और दस दस सालों तक अरबी मीडियम से ही तालीम हासिल की होती है ,उनमें से दस बीस फ़ीसद ही ऐसे होते हैं जो इस निसाब तालीम के कुछ हिस्से को पढ़ा सकते हैं जिसे उन्होंने उम्र-ए-अज़ीज़ के पंद्रह क़ीमती साल सिर्फ कर के पढ़ा है लिहाज़ा वो दर्सी किताबों की तदरीस में लग जाते हैं जहां दर्सी किताबों की शुरू हात छानने की मशक़्क़त से उन्हें इतनी फ़ुर्सत ही नहीं मिल पाती कि वो बाहर की दुनिया का मुताला कर सकें ,बाक़ी उसी फ़ीसद जोब्स इस क़दर इलम रखते हैं कि उर्दू ज़बान का अमलन लिख पढ़ सकते हैं रही ज़बान-ओ-अदब की बारीकियां तो उनसे वो इस हद तक ना-आश्ना होते हैं कि उर्दू में एक दरख़ास्त भी अदबी नकात को मल्हूज़-ए-ख़ातिर रखकर लिखने की सलाहीयत नहीं रखते ये लोग क़ुरआन-ए-करीम के या तो हाफ़िज़ होते हैं जिन्हों ने क़ुरआन को बस तोते की तरह रट लिया है और या क़ुरआन-ए-करीम की देखकर तिलावत कर सकते हैं ये बड़ी तादाद इलम से क़रीब क़रीब ना-आश्ना होती है लेकिन मिल्लत का हाल और मुस्तक़बिल इसी के हाथों में चला जाता है यही मैंबर महिराब पर बैठते हैं मकतबों मदरसों में उन्हें के हाथों में मिल्लत की नई नसल का मुस्तक़बिल दे दिया जाता है ,कितने ही मकतब ,मदरसे आपको ऐसे मिल जाएंगे जिनमें तलबा और तालिबात की तादाद पाँच सौ ,सात सौ और हज़ार डेढ़ हज़ार तक है लेकिन मिल्लत की नई नसल की इस बड़ी तादाद का इलमी मुस्तक़बिल जिसके हाथों में है वो ख़ुद इलम से ना-आश्ना है ,इस का तो तक़र्रुर ही बस ये देखकर किया गया है कि इस के माथे पर बड़ा सा नमाज़ का निशान है सर पर बारोब पगड़ी और हाथ में तस्बीह है साथ साथ उस की शख़्सियत मरऊब कण है औरवह ईरानी तोरानी क़िस्सों पर मुश्तमिल लच्छेदार तक़रीर कर लेता है बाक़ी तालीम क्या होती है ,दरस-ओ-तदरीस के उसूल क्या हैं ,दर्सी इदारे की तंज़ीम साज़ी कैसे की जाती है इस से वो क़तई ना-बलद है इस तरह के इलम से ना-आश्ना अफ़राद के अंदर एक चीज़ बख़ूबी पाई जाती है वो है हद से ज़्यादा ख़ुद-एधतिमादी, ख़ुद के आलम-ओ-फ़ाज़िल होने का एहसास और ये एहसास-ओ-रऊनत कि जब क़ुरआन मुझमें है तो हमचुनीं दीगरे नीस्त वो इलम और आलम की तारीफ़ नहीं समझता मगर ख़ुद को साहिब-ए-इल्म और आलिम वक़्त समझता है वो दरस-ओ-तदरीस के उसूल-ओ-ज़वाबत से नाआशना होता है लेकिन मुदर्रिसी और मुअल्लिमी का दावे दार होता है ।
एक साहिब पढ़ कर फ़ारिग़ हुए तो एक मस्जिद में इमाम हो गए और दस सालों तक इमामत कराते रहे फिर एक मकतब में जहां सात सौ मुस्लिम बच्चे और बच्चीयां ज़ेर-ए-ताअलीम हैं वहां निज़ामत तालीम के फ़राइज़ की अंजाम दही के लिए जगह ख़ाली हुई तो उन्हें इस ख़िदमत पर ला बिठाया गया।
गर्वनमैंट पहली क्लास के बच्चों को पढ़ाने के लिए भी ,किसी का तक़र्रुर उस वक़्त तक नहीं करती जब तक वो ग्रैजूएशन करने के बाद दो साला ट्रेनिंग कोर्स ना कर ले जिसमें उसे बच्चों की नफ़सियात से वाक़िफ़ किराया जाता है,दस-ओ-तदरीस के उसूल पढ़ाए जाते हैं ,सीखने और सुखाने के गुर सुखाय जाते हैं और बताया जाता है कि उम्र के किस मरहले में सीखने का अमल किस तरह अंजाम पा सकता है ,तालीमी इदारे की तंज़ीम साज़ी के उसूलों से वाक़िफ़ किराया जाता है वग़ैरा वग़ैरा ,मगर जिस क़ौम का इलमी मुस्तक़बिल ना आश्नाओं के हाथों में दे दिया जाये वहां पर इक़बाल जैसा शायर इन लफ़्ज़ों में नोहा ही कर सकता है कि।

उठा मैं मुदर्रिसा और ख़ानक़ाह से नमनाक
ना ज़िंदगी, ना मुहब्बत, ना मार्फ़त, ना निगाह
और
शिकायत है मुझे या रब ख़ुदा वनदान मकतब से
सबक़ शाहीन बच्चों को दे रहे हैं ख़ाकबाज़ी का

इन दो रकात के इमामों की ज़्यादा से ज़्यादा क़ाबिलीयत बस ये होती है कि ये उर्दू ज़बान को लिख पढ़ लेते हैं, उर्दू इस दौर की एक अहम तरीन ज़बानों में से है इस के दामन में भी इलम का ज़ख़ीरा कम नहीं है अगर कोई साहिब ज़ौक़ इसी के सहारे अपनी इलमी प्यास बुझाना चाहे तो वो उर्दू के दामन से भी इलम के मोती चुन सकता है लेकिन ज़ौक़ मुताला कहाँ से लाया जाये जिनकी तिपाइयों पर सिर्फ ख़ुतबात नामी किताब ही होती होजस के सहारे मैंबर के मुतबर्रिक मुक़ाम पर बैठ कर ईरानी-ओ-तोरानी क़िस्सों की गर्दान करना आसान हो जाएगी और वो लोग कि जो ख़ुतबात को भी ना छूते हूँ उर्दू के अख़बार में तफ़सीली फ़िक्री मज़ामीन को हाथ भी ना लगाते हूँ जिनके इदारों में आज के अख़बार को दोपहर के खाने का दुस्तर ख़वान बना लिया जाये क्या उनसे ये उम्मीद की जा सकती है कि वो मिल्लत के सफ़ीने को पार लगा देंगे ?
राक़िम का एक मुख़्तसर मज़मून, मशहूर तहत्तर फ़िर्क़ों के नज़रिए की तरदीद में शाय हुआ जो दरमयानी साइज़ के सिर्फ सोला सफ़हात पर मुश्तमिल है ये मौज़ू आज के दौर में उम्मत के लिए एक सुलगते मसले की तरह है हर एक की ज़बान पर ये बात है कि जब तक उम्मत में इत्तिहाद नहीं होगा उस वक़्त तक उम्मत के मसाइल हल नहीं होंगे लेकिन इत्तिहाद का तरीक़ा-ए-कार क्या हो उस की वज़ाहत कोई नहीं करता ,दूसरे ये कि उम्मत में तहत्तर फ़िरक़े बनाने को सबने ईमान का हिस्सा बनाया हुआ है ,ख़ाकसार ने अपने मज़मून में इसी नज़रिए पर ज़रब लगाने की कोशिश की है ,इस हक़ीर ने ये किताबचा सैकड़ों की तादाद में इन दो रकात के इमामों तक पहुंचाया ताकि उसे पढ़ कर ये मिल्लत में इत्तिहाद की कोशिश करें लेकिन मुझे उन इमामों में से एक फ़ीसद भी ऐसे लोग नहीं मिले जिन्हों ने उसे पढ़ा हो ,जिससे भी इस पर किसी का रद्द-ए-अमल जानना चाहा तो बस यही जवाब मिला कि अभी पढ़ा नहीं किसी किसी ने ये भी कहा कि थोड़ा सा पढ़ा है ,ऐसे रहनुमा मिल्लत का सफ़ीना डबोईनगे नहीं तो और क्या करेंगे ।?
इन दो रकात के इमामों को पहचानें
इस वक़्त मुल्तानदो रकात के इमामों के सकनजे में है वो उनको पहचान कर जिस क़दर जल्द उनसे छुटकारा हासिल कर ले इतना बेहतर है वर्ना उन्होंने तो रोज़-ए-अव्वल से तहय्या किया हुआ है कि वो उम्मत मुस्लिमा को ऐसे मुक़ाम पर ले जा के मारेंगे जहां पानी नसीब ना हो ।
हाशा कला मेरा ये मतलब बिलकुल नहीं कि मुख़लिस अलिमन किराम और हमदरद इन क़ौम वमलत बिलकुल ही उनका हो गए ऐसा नहीं है मुख़लिस माहिरीन और ख़क़ीक़ी उल्मा देन मौजूद हैं लेकिन उनकी तादाद इन दो रकात के इमामों के मुक़ाबले इतनी कम है कि मख़लसीन चाह कर भी कुछ करने की पोज़ीशन में नहीं हैं ।
ये किसी दीवाने की बड़ नहीं है बल्कि वो हक़ीक़त है जिसकी जानिब बहुत से मुफ़क्किरीनक़ौम तवज्जा दिला रहे हैं मगर उन की कमज़ोर आवाज़ उन के शोर ना हंजार में गुम होके रह जाती है ,इस की ताईद में यहां पर मैं उर्दू रोज़नामा अख़बार रासटरीह सहारामौरर्ख़ा २फरवरी २०१८ ईः-ए-को अदारती सफ़े पर शाय एक तफ़कीरी मज़मून का हवाला देना चाहूँगा ,ये मज़मून मशहूर-ए-ज़माना मसला-ए-तीन तलाक़ पर है जिस पर भारत की सरकार क़ानून बनाकर उसे कुलअदम करना चाहती है मलिक की अदालत अज़मी से ऐवान-ए-ज़ेरीं तक में उसने इस मसले पर मुस्लमानों को नीचा दिखाते हुए क़ानून पास भी करा लिया है ।
इस में शक नहीं कि इस मसले पर मुस्लमानों की डिप्लोमैटिक हार हुई है जिससे मुसलमानान हिंद के एक बहुत बावक़ार इदारे मुस्लिम पर्सनल लिनका वक़ार ख़ाक में मिल गया है ।
मुझे हक़ नहीं कि मैं ये ऐलान करूँ कि इस मुतनाज़े मसले में सही किया है और ग़लत किया है ,अयाअएक मजलिस की तीन तलाक़ तीन होंगें या एक होगी या एक भी नहीं होगी इस मसले को इस के माहिरीन तै करें ,लेकिन मुझे ये राय ज़ाहिर करने का पूरा हक़ है कि इस मसले पर दुश्मन ने मिल्लत को इसी के घर में घुस कर मात दे दी ।
अख़बार में छपे जिस मज़मून का अभी ज़िक्र हुआ उस के दो इक़तिबासात यहां दर्ज किए जाते हैं, आप भी मुलाहिज़ा फ़रमाएं और ख़ुद अपनी राय क़ायम फ़रमाएं ,चुनांचे लिखा है ।
अभी मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड को तीन तलाक़ के मसले में जो नाकामी हासिल हुई
इस की बुनियादी वजह ये है कि मलिक की अक्सरीयत की राय मुस्लमानों की हमनवा नहीं
है ,बोर्ड इस अदलिया को भी मुतमइन नहीं कर सका जिस पर अभी फ़िकऱ्ापरस्त होने का
इल्ज़ाम नहीं लगा है,ये मुस्लिम क़ियादत की नाकामी है जो अदालत के फ़ैसले और फिर लोक सभा के
मुजव्वज़ा बल की शक्ल में सामने आया है ,बोर्ड की क़ियादत मलिक के बाशिंदों को ये समझाने
मैं नाकाम रही कि तीन तलाक़ के बाद मुतल्लक़ा के मसले का हल किया है ?हिन्दोस्तान की मुस्लिम
क़ियादत ग़ैर मुस्लिम दुनिया को ये समझा ने में नाकाम रही कि इस्लाम ने औरतों को बराबरी के
हुक़ूक़ दिए हैं तो तीन तलाक़ के बाद उसे बेसहारा छोड़ देना क्यों ज़ुलम नहीं कहिलाय
गा ,मुस्लिम क़ियादत ग़ैर मुस्लिम दानिशवरों को ये समझाने में नाकाम रही कि दुनिया के दूसरे
मुस्लिम मुल्कों में और मक्का-ओ-मदीना की सरज़मीन में एक मजलिस की तीन तलाक़ को एक तलाक़ क्यों
माना जाता है (यानी जो वहां जायज़ है वो यहां क्यों नाजायज़ है)अगर अइमा-ए-अरबाअ एस
दौर में मौजूद होते तो हालात की की तबदीली की वजह से किया उनका मौक़िफ़ बदल नहीं
जाता और क्या इबन तीमीह और इबन क़ियम के मौक़िफ़ के क़रीब कोई मौक़िफ़ ना होता ।
सऊदी अरब का सरकारी मसलक हनबली है लेकिन अभी दो महीने पहले हर्म
मक्की में हरमैन के डायरैक्टर शेख़ सुदेस ने जुमा के ख़ुत्बे में एक मजलिस की तीन तलाक़
को एक क़रार दिया था ,हर्म की सरज़मीन में भी तीन तलाक़ को एक माना जाता है ,हिन्दोस्तान के
जलील-उल-क़दर हनफ़ी आलम दीन अल्लामा सय्यद सुलेमान नदवी जब भोपाल में क़ाज़ी थे तो उनके
पास एक नौ मुस्लिम शख़्स का केस आया जिसने अपनी बीवी को तीन तलाक़ दे दी थी ,सय्यद साहिब
ने कहा कि ये तो नव मुस्लिम है अभी वो ना हनफ़ी है ना शाफ़ई ना मालकी ना हनबली ,उन्होंने तीन को एक
क़रार देकर रुजू करने का इख़तियार दे दिया ,शेख़ मुहम्मद अबदा ,शेख़ वहबा ज़हीली ,शेख़ यूसुफ़ अलक़रज़ावी
की राय भी यही है कि एक मजलिस की तीन तलाक़ एक तलाक़ है ,मालूम हुआ कि तीन तलाक़
को एक मान लेना कोई ऐसा मौक़िफ़ नहीं है जिसे गुमराही और बेदीनी क़रार दिया जाये ।
काश कि बोर्ड ने हालात की संगीनी को सामने रखकर हिक्मत-ए-अमली इख़तियार की होती और पर्सनल ला
मैं मुदाख़िलत का मौक़ा फ़राहम ना क्या होता ।
इस इक़तिबास के बाद फ़ाज़िल मज़मून निगार की इसी तहरीर का उगला इक़तिबास भी मुलाहिज़ा फ़रमाएं जो जे़ल में दर्ज किया जाता है जिसे पढ़ कर आपके ऊपर हक़ीक़त-ए-हाल काफ़ी हद तक वाज़िह हो जाएगी ,चुनांचे लिखा है कि।
बोर्ड में साहिब फ़हम वफ़रासत और दूर-अँदेश अलिमन मौजूद हैं,उनमें से बहुत
से लोगों की राय वही है जो राक़िम उलसतूर ने पेश की है ,लेकिन राक़िम उलसतूर को इस
बात का इलम है कि बोर्ड मुख़्तलिफ़ अलख़याल और मुख़्तलिफ़ अलमसलक लोगों का मलग़ूबा है
…………..बोर्ड की क़ियादत ने अगर अक़्ल-ए-सलीम और फ़िक्र मुस्तक़ीम पर चलने की कोशिश
की तो बोर्ड टूट जाएगा और बग़ावत की आवाज़ बुलंद होगी ,बोर्ड में ऐसे अरकान
भी हैं जो किसी हाल में फ़िक़ही मसलक में शमा बराबर भी तनाज़ुल नहीं इख़तियार
करेंगे , वो ख़ुद मक़्तूल होजाना और पूरी उम्मत को मक़्तूल बना लेना गवारा कर लेंगे
लेकिन तीन तलाक़ को एक तलाक़ मान लेना बर्दाश्त नहीं करेंगे क्यों कि इस
से ईमान ख़तरे में पड़ जाएगा ,…………………बोर्ड ने ग़लती ज़रूर
की है लेकिन बोर्ड करे भी तो क्या करे साक़ी की बेगाना रविष पर किया इल्ज़ाम
लगाया जाये हमें बोर्ड की मजबूरीयों का भी अंदाज़ा है ………….बेबसी
के इन हालात का नतीजा है कि इस वक़्त मुस्लिम क़ियादत ताइर ज़ेर-ए-दाम की तरह
नाला-ए-ओ- शेवन और फराद-ओ-मातम और एहतिजाज में मशग़ूल है ।
मज़मून निगार ।प्रोफ़ैसर मुहसिन उसमानी नदवी
अब आप समझ गए होंगे इनदो रकात के इमामों की हक़ीक़त को,और उनकी ताक़त का भी आपको अंदाज़ा हो गया हो गया और ये भी आप पर वाज़िह हो गया होगा कि मज़हबी मैदान-ए-सलतनत में असल बादशाहत तो उन दो रकात के इमामों के ही हाथ में है ।
इस तफ़सील के बाद मौजूदा वक़्त में आप मुस्लिम मज़हबी तालीमी इदारों और तन्ज़ीमों में ओहदों के हुसूल में मज़हबी क़ाइदीन के माबैन जूतीयों में बटती दाल का जायज़ा लीजिए और ये देखिए कि क़ाल अल्लाह और क़ाल अलरसोल की तस्बीह पढ़ने वाले इस बिन्नी के वारिस जिसने कहा है कि जो ओहदे का तलबगार हो उसे ओहदा ना दिया जाये ,लेकिन उन्होंने तो ओहदों के हुसूल की ख़ातिर मुस्लमानों की मिली तन्ज़ीमों और तालीमी इदारों को भी लड़ कर टुकड़े टुकड़े कर डाला है हती कि अब ये देखने में आरहा है कि जो ख़ालिस अल्लाह-वालों की जमात कहलाती थी इस में भी जूतम पुत्री का दौर दौरा है ।
जमहूरी इक़दार का बानी इस्लाम है रसूल अल्लाह ने सहाबा-ए-किराम की फ़र्माइश-ओ-कोशिश के बाद भी अपना वलीअहद तै नहीं किया था ,हाँ अपनी ज़िंदगी में ख़ुद हज़रत अबूबकर की इमामत में नमाज़ पढ़ कर अपनी राय ज़रूर ज़ाहिर कर दी थी बाक़ी मुआमला ग़ैर ऐलानीया तौर से अवामुन्नास पर छोड़ दिया था कि वो अपनी मर्ज़ी से अपना अमीर तै करलीं लिहाज़ा ख़िलाफ़त-ए-राशिदा तक तमाम खल़िफ़ा-ए-राशिदीन क़ाबिलीयत की बुनियाद पर मुंतख़ब होते रहे ना कि विरासत की बुनियाद पर ,और जहां से इमारत में विरासत को दख़ल हुआ वहां पर ख़िलाफ़त-ए-राशिदा का ख़ातमा तस्लीम कर लिया गया ,इस से साबित होता है कि इस्लाम जमहूरीयत को तस्लीम करता है इमारत में विरासत को तस्लीम नहीं करता ,अब आप इस रोशनी में अपनी तन्ज़ीमों और इदारों का जायज़ा ले लीजिए और मक्का बलता ग़ैर मुस्लिमों की तन्ज़ीमों और इदारों का जायज़ा ले लीजिए हमारी अक्सर तंज़ीमें और इदारे ओहदे की रस्सा-कशी में दो लख़्त और सहि लख़्त हैं और उनकी …..?
ऐसा महसूस होता है कि करानी तालीमात उनके पास है और मनु अस्मरती की हमारे पास ।
इस वक़्त ग़ैर मुस्लिम बिरादरान वतन की सबसे बड़ी तंज़ीम मलिक के अक्सर हिस्से में इक़तिदार पर क़ाबिज़ बी जे पी है उसी की दहाई तक उसे कोई पूछता नहीं था मलिक की पार्लीमैंट में इस के दो मैंबर हुआ करते थे ,सब जानते हैं कि उसे मुल्क भर में हर दिलअज़ीज़ बनाने का सहरा ईल के अडवानी के सर है जो रथ पर सवार हो कर मलिक के कोने कोने में गए और शहर शहर और गांव गांव पार्टी का परचार किया फिर जब पार्टी बड़ी हो गई और मलिक का इक़तिदार उस के हाथों में आने लगा तो दूसरी सफ़ का एक लीडर निकल कर सामने आगया और वज़ारत अज़मी तक की कुर्सी तक जा पहुंचा ,ख़ास बात ये हीका पार्टी का टूटना तो दूर ,ना कोई रस्सा-कशी और ना कोई हलचल जब कि वो लोग कोई मज़हबी लोग नहीं थे बल्कि आम दुनियादार थे दूसरी जानिब अपनी इन तन्ज़ीमों और इदारों का हाल मुलाहिज़ा फ़र्मा लें जो हमारे मज़हबी पेशवां के हाथों में हैं ।
दिल्ली की शाही जामा मस्जिद हिंदू सानी मुस्लमानों का एक बहुत बावक़ार इदारा है वहां से निकलने वाली आवाज़ दूर तक जाती है और ख़ुद में असर रखती है,ये मस्जिद मुत्तहदा हिन्दोस्तान पर अपने आहनी पंजों से हुकूमत करने वाले मग़्लूं की यादगार है ,उनमें भी इस की तामीर का सहरा इस बादशाह के सर है जिसने दुनिया को उअजोब-ए-आलम ताज-महल जैसा शाहकार दिया इस लिए इस मस्जिद को क़ुदरती तौर पर रोब और दबदबा हासिल है इसी के साथ साथ ये मुस्लमानों का दीनी और मज़हबी असासा भी है ,मस्जिद का मुक़तदिर आला उस का इमाम होता है ,इमामत का फ़रीज़ा कोई मामूली शए नहीं बल्कि ये गदरसूल है इस के लिए इस्लाम में एक मुकम्मल कोड आफ़ कंडक्ट मौजूद है कि इमाम का इंतिख़ाब कैसे हो हती कि अगर पाँच अफ़राद भी जमात करना चाहते हैं तो भी इमाम के इंतिख़ाब के लिए रहनुमा उसूल मौजूद हैं कि उनमें अशरअ ,अअलम ,अक़रणकी बुनियाद पर इमाम मुंतख़ब होगा ,लेकिन हमारी जामा मस्जिद में इमाम का इंतिख़ाब जमहूरीयत के इस दौर में भी विरासत की बुनियाद पर होता है ,और यही हाल मिल्लत के तमाम इदारों का है, हमारी तन्ज़ीमों में सुदूओर ता-हयात होते हैं और फिर बेटे का नंबर आता ,कोई बेटे को चैलेंज करे तो तंज़ीमें टूट जाती हैं और ये सब जिनके हाथों अंजाम पाता है वो मज़हबी लीडरान भी हैं,ऐसे मज़हबी लीडरों के पीछे चलने वाली मिल्लत क्या ये समझती है कि ये क़ियादत उनका बेड़ा पार लगा देगी?
एक वज़ाहत
अपनी बात ख़त्म करने से पहले में ये वाज़िह कर देना भी बेहतर समझता हूँ कि इस मज़मून में दो रकात के इमामों के मुताल्लिक़ राक़िम ने जो कुछ भी लिखा है इस में मेरा कुछ भी नहीं है ये सब वही बातें हैं जिनको बहुत से मुफ़क्किरीन कहते रहे हैं मैंने सिर्फ उनकी बातों का तजज़िया किया है कोई तफ़सील जानना चाहे तो कुल्लियात इक़बाल में अल्लामा इक़बाल की मशहूर नज़म इबलीस की मजलिस-ए-शूरा का मुताला कर ले ,मालूम हो जाएगा कि शैतान आज़म अपने चीलों को मिल्लत-ए-इस्लामीया को ख़ाबीदा रखने के जो गुरबताताहे, इस दौर में दो रकात के इमाम इस काम को बख़ूबी अंजाम दे रहे हैं ।
इन दो रकात के इमामों ने अवाम को ख़ुदा से काटा है और ख़ुद से जोड़ा है इस काम के लिए देन में कुछ नई चीज़ें शामिल करने की ज़रूरत हुई तो इस से भी गुरेज़ नहीं किया गया चुनांचे ये बात फैलाई गई कि कुछ ऐसे अमलीयात भी हैं जिनसे मावराई ताक़तें जिन्न वग़ैरा को दो रकात के इमाम अपने बस में कर लेते हैं और इस से जो काम चाहते हैं लेते हैं, उस के लिए मुकुल की मन घड़त इस्तिलाह का इस्तिमाल है ,ये भी मशहूर किया गया कि दो रकात के इमाम इबादत-ओ-रियाज़त और मुजाहिदात के ज़रीये आरिफ़ बिल्लाह और फ़ना फ़ी अल्लाह के मरहलों से गुज़रते हुए अबदाल ,क़ुतुब और क़ुतुब अलाक़ताब के मर्तबे तक पहुंच जाते हैं ,ख़ुद ख़ुदा बनने के लिए ये झूट फैलाया गया कि इस कायनात में चालीस अबदाल चार क़ुतुब और एक क़ुतुब अलाक़ताब होता है और निज़ाम-ए-काएनात को यही झूटे ख़ुदा कंट्रोल करते हैं ,इन सब चीज़ों की देन में कोई असल नहीं है ये महिज़ फ़र्ज़ी वाहमे हैं जिनके लिए इन दो रकात के इमामों के ज़रख़ेज़ दिमाग़ ने मुकुल ,अबदाल और क़ुतुब जैसी ऊंची ऊंची बारोब इस्तिलाहात वज़ा की हैं
हमने इस्लामी तारीख़ में पढ़ा है कि जब मुस्लिम फ़ौजें सहाबई रसूल साद बिन क़ास की सरबराही में ईरान में दाख़िल हुईं तो वहां के हुक्मराँ ने साद बिन विक़ास के सफ़ीर हज़रत मुग़ीरह बिन शोबा से पूछा कि हमारे मुल्क में क्यों आए हो? इस पर मुस्लमानों के सफ़ीर ने जवाब दिया कि हम अवाम को लोगों की गु़लामी से निकाल कर उन्हें अल्लाह की हुक्मरानी में देना चाहते हैं ,मतलब ये कि इस्लाम तो आया ही इस लिए था कि अवामुन्नास को लोगों की गु़लामी से निकाल कर अल्लाह से जोड़े ,मगर इन दो रकात के इमामों ने फिर से अवाम को अपनी गु़लामी में ले लिया है उन्होंने अवाम को डराने के लिए मज़कूरा किस्म की फ़र्ज़ी चीज़ें घड़ ली हैं ,महिज़ क़ुरआन-ए-करीम उनकी ख़िरद बुरद से महफ़ूज़ है क्यों कि इस की हिफ़ाज़त का ज़िम्मा अल्लाह ने लिया है ,क़ुरआन कातोड़ उन्होंने ये निकाला कि अवाम को उसे समझने पर पाबंदी लगा कर उस के जुमला हुक़ूक़ अपने लिए महफ़ूज़ कर लिए ,आपको अगर इन दोरकात के इमामों के शर से बचना है तो क़ुरआन-ए-करीम और अहादीस सहीहा की पनाह में आ जाईए और उनके भरोसे ना रह कर क़ुरआन-ओ-हदीस की तफ़हीम मैं ख़ुद कफ़ील होने की कोशिश कीजिए।
बात मौलवी की
ये लफ़्ज़ मौलवी या मौलाना जो इस दौर में मज़हबी तालीम के आलम के लिए ब-तौर-ए-ख़ास बर्र-ए-सग़ीर में मुस्तामल है इस में सरासर यहोदीत की बू आती है ,में इस के मुताल्लिक़ जो कुछ सोचता हूँ वो क़ारईन की ख़िदमत में पेश है इस एतराफ़ के साथ कि मैं ख़ुद भी वही हूँ, मैंने भी वो तमाम किताबें पढ़ी हैं जिन्हें पढ़ कर कोई मौलवी बनता है और मुझे भी उन्हें दरसगाहों का शरफ़-ए-तलम्मुज़ हासिल है जहां मौलवी पैदा होता है ,और मुझे भी इसी लफ़्ज़ के साथ पहचाना जाता है जिसकी ज़िम्मेदारी मुझ पर नहीं है ,मुझे इस पर भी इसरार नहीं कि इस लफ़्ज़ का जो पस-ए-मंज़र में बयान कर रहां हूँ वही सही है अगर कोई इस से बेहतर तशरीह पेश करसके तो उसे क़बूल करने और अपनी राय से रुजू करने में भी मुझे आर नहीं ।
आईए अब इस लफ़्ज़ का तारीख़ी पस-ए-मंज़र देखें और पता लगाऐं कि ये लफ़्ज़ मौलवी कहाँ से आया, कब आया और कैसे आया जिससे उस का पस-ए-मंज़र जानने में मदद मिलेगी ।
इस लफ़्ज़ के इस्तिमाल को जब हम तारीख़ के सफ़हात में तलाश करते हैं तो इब्तदाए इस्लाम से एक हज़ार साल के अर्से तक उस का कहीं भी इस्तिमाल नहीं मिलता ,उस का इस्तिमाल पहले-पहल नंबर एक तो ये कि सरज़मीन बर्र-ए-सग़ीर हिंद विपाक में होता है नंबर दो उस के इस्तिख़राज का ज़माना वो है जो मुस्तश्रिक़ीन (यहूदी-ओ-ईसाई माहिरीन तालीम इस्लामी)के उरूज का दौर है यानी सत्तरवीं सदी ईसवी के आस-पास का दौर,इस पहलू को मद्द-ए-नज़र रखते हुए चंद मुक़द्दमात पर ग़ौर कीजिए जो जे़ल में दर्ज हैं ।
नंबर एक ये कि यहूदी अपने मज़हबी लीडर को रब्बी कहते हैं और हम अपने मज़हबी लीडर को मौलवी कहते हैं नंबर दो ।रब भी अल्लाह का नाम है और मौला भी अल्लाह का नाम है दोनों क़ुरआन-ए-करीम में अल्लाह के सिफ़ाती नाम के तौर पर मुस्तामल हैं और दोनों मेंय ज़मीर वाहिद मुतकल्लिम बमानी मेरा है और जब य को ना से बदलते हैं तो वाहिद मुतकल्लिम जमा मुतकल्लिम हूजाता ,तो क्या रब्बी और मौलवी दोनों में कोई मशाबहाती रिश्ता है ?क्या दोनों की तख़लीक़ के पीछे एक तरह का दिमाग़ कार फ़रमां है? जब हम इस कड़ी को इस लफ़्ज़ की तख़लीक़ के ज़माने से मिलाते हैं तो जवाब हाँ में मिलता है,कुछ लोग य को निसबती मानते हैं जो सरासर ग़लत है क्यों य को तो निसबती माना जा सकता है मगर मौलाना के ना को निसबती नहीं कहा जा सकता,अगर ना ज़मीर है तो य भी ज़मीर है, और इस से तो किसी तरह इनकार मुम्किन ही नहीं कि इस का मूजिद कोई यहूदी हो या मुस्लमान ये लफ़्ज़ यहूदीयों के मज़हबी टाइटल की कापी तो है ,चाहे कापी करने वाले ने ये काम दानिस्ता क्या हो या नादानिस्ता ,क्यों कि किसी के पेटैंट टाइटल की नक़ल करने वाला ये कह कर छूट नहीं सकता कि नक़ल करने वाले को मालूम नहीं था कि इस का ईजाद करदा टाइटल किसी ने पेटैंट किराया हुआ है।
आख़िरी 
बात
मैं इस मज़मून की ज़्यादा तफ़सील में जाना नहीं चाहता इस लिए चंद एक ज़रूरी बातें अर्ज़ कर के बात ख़त्म करता हूँ ,ऊपर मज़कूर मुस्तश्रिक़ीन(उलूम इस्लामी के यहूद-ओ-नसारा माहिरीन फ़न ) की तफ़सील से आपको लगा होगा कि मैंने मिल्लत के ज़वाल को ग़ैर मुस्लिम दुश्मनाँ-ए-इस्लाम के सर मढ़ दिया है और ये दावे किया है कि मिल्लत का सफ़ीना डुबोने में दुश्मनों का हाथ है ।
हाँ ! ज़वाल याफताह क़ौमों का यही-ओ-तेरा होताहै कि वो अपनी कोताही को दुश्मन की साज़िश का नाम देकर ख़ुद को बरी उज़्ज़िम्मा क़रार दिया करती हैं लेकिन सवाल ये है कि चोर घर में घुस कर उस वक़्त चोरी करता है जब साहिब मकान ग़फ़लत की नींद सो जाये,और मैदान-ए-जंग में दुश्मन उस वक़्त आप पर फ़तह पाता है जब वो आपसे ज़्यादा ताक़तवर हो ,बेदार रहने के लिए नींद को क़ुर्बान करना पड़ता है ,और ख़ुद को ताक़तवर बनाने के लिए मेहनत करनी होती है,जब आपकी मिल्लत ताक़तवर थी ,जब उसने बग़दाद-ओ-क़ुर्तुबा में इलमी यूनीवर्सिटीयां क़ायम कीं थीं ,जब उसने तालों में मुक़फ़्फ़ल यूनानी उलूम को रूमी सलतनत से हासिल कर के उनके तर्जुमे अपनी ज़बानों अरबी-ओ-फ़ारसी में किए और उनमें महारत हासिल की और इलमी मिशन को आगे बढ़ाने में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया तो आप आगे रहे ,फिर जब आप ग़फ़लत की नींद सो गए और ग़ैरों ने आप ही के उलूम में दस्तरस हासिल कर ली तो मैदान उनके हाथ आगया जहां तक साज़िशों की बात है दुश्मन का काम तो साज़िश करना ही है आप उस के ख़िलाफ़ करलीं आपको किस ने रोका है लेकिन साज़िश उस की कामयाब होगी जिसके पास दिमाग़ होगा और जो दिमाग़ का सतामाल करना ही छोड़ दे उस का यही हश्र मुक़द्दर है जो मिल्लत का हो चुका है क्यों अक़ल का इस्तिमाल ना करने वालों को क़ुरआन में अल्लाह के नज़दीक दुनिया की बदतरीनमख़लूक़ कहा गया है । (सूरा इन्फ़ाल २२)
क़ुरआन में है कि इन्सान को इसी क़दर मिलता है जिस क़दर उस की कोशिश होती है वाँ लैस लिलइनसअन-ए-इला मुइ सअआ(सूरा नजम ३९ )जब इस मिल्लत में शेख़ बू अली इबन-ए-सीना ,शेख़ फ़ाराबी ,अब्बू रिहान अलबीरोनी ,इबन रुशद,इब्न-ए-बतूता ,इबन ख़ुलद वन ,इसहाक़ इबन हनीन जैसे ज़िंदगी खपाने वाले तख़लीक़कार पैदा हुए तो इलम का मैदान मिल्लत के हाथों में था लेकिन जब उसने ऑलए- इलम किताबों की छुपाई को ही अपने लिए नाजायज़ क़रार दे लिया तो इलम उनके पास चला गया जिन्हों ने इस की क़दर मंजिलत की और इस के पीछे अपनी ज़िंदगीयां घपाईं, इसी तरह जब मिल्लत का सिपाही फ़ातिह हिंद बाबर गोला बारूद ,तोप-ओ-तफ़ंग लेकर निकला तो लाखों की फ़ौज को पीछे धकेलता चला गया और जब मिल्लत ने ख़ुद अपने ऊपर बंदूक़ का इस्तिमाल हराम क़रार दे लिया तो ताक़त का तवाज़ुन मिल्लत के पाले से निकल कर हिज़्ब-ए-मुखालिफ़ के पाले में चला गया ,ख़ुदाई क़ानून यही है और इस के क़वानीन में कोई बदलाओ नहीं होता विलेन तजिद लिसुन्नत-ए-उल़्ला-ए-तहो यल्ला। और तुम अल्लाह के तरीक़े में कोई तबदीली नहीं पाओगे (सूरा फ़ातिर ४३) लिहाज़ा जो उस के क़ानून से चशमपोशी करेगा उस का यही हश्र होना है ।
एक गुज़ारिश
आख़िर में नौ निहाला न-ए-मिल्लत से एक गुज़ारिश के साथ में अपनी बात को ख़त्म करना चाहूँगा वो ये कि ये दो रकात के इमाम जिन्हों ने मिल्लत का सफ़ीना डुबोया है उनसे किसी तरह की उम्मीद रखना अक्लमंदी नहीं है, लिहाज़ा उन्हें अपने हाल पर छोड़कर आगे बढ़िए, अपने अंदर दूर अव्वल के मुस्लमानों की ख़सुसीआत पैदा कीजिए आपकी रहनुमाई के लिए क़ुरआन अपनी असली शक्ल में मौजूद है इस में चाह कर भी कोई रद्दोबदल नहीं कर सकता क्यों कि इस की हिफ़ाज़त का ज़िम्मा ख़ुद उसके मालिक ने लिया है ,इन दो रकात के इमामों को पहचानिए ,उनकी पहचान कोई मुश्किल नहीं है जो आपको अल्लाह से काट कर ख़ुद से जोड़ ने की कोशिश करे ,जो आपको मुताला क़ुरआन से रोके जो क़ुरआन के हुक्म ला तफ़र्रुक़वा(फ़िरक़े ना बनाओ)के ख़िलाफ़ उम्मत को फ़िर्क़ों में तक़सीम करने की ज़िद करे ख़ुद ख़ुदा बन कर अपने को जन्नती और बाक़ी सबको जहन्नुमी कहे ,जो क़ुरआन-ए-करीम में बताए गए सदक़ात के आठ मसारिफ़ से चशमपोशी करते हुए सिर्फ अपनी जेब को ही इस का बेहतर मुसर्रिफ़ क़रार दे ,जो कलिमागो मुस्लिम भाईयों को काफ़िर काफ़िर बके और उम्मत को उम्मत ना रहने दे और क़ुर्ब-ए-क़यामत की निशानी तहत्तर फ़िर्क़ों में बटने बांटने को अपनी ज़िम्मेदारी समझ कर जल्द अज़ जल्द क़ियामत ला ने पर ब-ज़िद हो तो समझ लीजिए कि ये वो ही दो रकात का इमाम है जो क़ियामत से पहले क़ियामत लाना चाहता है ,ये ख़ुद तो मरे गा ही सबको ले के मरेगा।
लिहाज़ा ,आप शीया हूँ या सन्नी ,देवबंदी हूँ या बरेलवी ,सलफ़ी हूँ या ख़लफ़ी या कुछ और ,उन दो रकात के इमामों से आराज़ करते हुए अपनी अपनी मसाजिद में एक कमरा मख़सूस कीजिए जिसमें फ़र्श पर मोटी सी दरी बिछा कर उमूमी मुताला-ओ-मजलिस के लिए ख़ास कीजिए (अलग से कमरा ना हो तो ये काम एक सैफ अलमारी को मस्जिद के किसी कोने में खड़ा कर के किया जा सकता है )इमाम-ओ-मुअज़्ज़न की तनख़्वाह-ओ-मस्जिदो दीगर अख़राजात के लिए हर मस्जिद में एक फ़ंड तो होता ही है जिसमें सदक़ात-ओ-ज़कात नहीं लिए जाते ,उसी की मानिंद एक और फ़ंड क़ायम कीजिए जिसमें ज़कात-ओ-सदक़ात भी लीजिए और इमदाद भी(वर्ना वो सदक़ात जिनके क़ुरआन में आठ मसारिफ़ बताए गए हैं वो सिर्फ एक जगह पहुँचती रहेगी और बहुत से वो अफ़राद जो उस के मुस्तहिक़ थे वो महरूम ही रहेंगे) उसी फ़ंड की इमदादी रक़म से हर मस्जिद में मिली अफ़्क़ार का कम-अज़-कम एक रोज़नामा अख़बार और एक माहनामा नीज़ तारीख़ इस्लाम-ओ-दीगर इस्बात हक़-ओ-इबताल बातिल के मज़ामीन पर मुश्तमिल किताबें और इलाक़ाई ज़बान में क़ुरआन की तफ़सीरें और सीरत-ओ-तारीख़ इस्लाम की किताबें खरीदिए इसी फ़ंड से ये ज़िम्मेदारी उठाइए कि आपकी मस्जिद से मुताल्लिक़ा घरों में कोई ग़ुर्बत का मारा ना रहे ,कोई ग़रीब बीमार ग़ुर्बत के सबब बना ईलाज किराए मौत के मुँह में ना चला जाये ,कोई कारोबार ना होने के सबब भीक मांगने पर मजबूर ना हो ,कोई तालिब-इल्म किताबों या कोर्स या फ़ीस ना होने के सबब पढ़ाई ना छोड़ दे ,सर्दी के मौसम में सब के पास ज़रूरी कपड़े हूँ ,रमज़ान में सब घरों में कम-अज़-कम इफ़तार का सामान मौजूद हो और ईद पर हर एक को नए कपड़े दस्तयाब हो सकें।
मस्जिद महिज़ नमाज़ के लिए नहीं बल्कि उन उमूर के लिए भी उतनी ही ज़रूरी है क़ुरआन में अक्सर नमाज़-ओ-ज़कात का हुक्म एक साथ है और जिस मिक़दार में नमाज़ का हुक्म है उसी मिक़दार में ज़कात वसदक़ात और इन्फ़ाक़ फ़ी सबील-ए-अल्लाह का हुक्म भी है ये इस बात को समझने के लिए काफ़ी है कि मज़कूरा उमूर को मस्जिद से जोड़ना ऐन मक़सूद शरीयत है और जिस तरह मस्जिद नमाज़ का मर्कज़ होता है ऐसे ही ज़कात का मर्कज़ भी मस्जिद को ही होना चाहीए ।
मस्जिद के मख़सूस कमरे में या सेहन-ए-मस्जिद में बैठ कर क़ुरआन-ए-करीम को मा तफ़सीर के पढ़िए और इस बात का जायज़ा लेते रहेए कि हमारी ज़िंदगी क़ुरआन की तालीमात के मुवाफ़िक़ है या मुख़ालिफ़ , अइम्मा हज़रात से मसाजिद में सिर्फ क़ुरआन की तालीम कराईए ,दीगर किताबों का ख़ुद मुताला कीजिए और दूसरों को मुताला की तरग़ीब दलाईए ।
मुताल्लिक़ा मस्जिद के दो-चार बेदार मग़ज़ मिली जज़बात के हामिल अफ़राद की एक ऐसी बॉडी तशकील दीजिए जो मज़कूरा उमूर की निगरानी करने के साथ साथ इस अमर को भी यक़ीनी बनाए कि मुहल्ले का हर बच्चा पढ़ने जाता है ,जिसके पास मस्जिद से मुताल्लिक़ मुस्लमानों की तफ़सीली फ़हरिस्त रजिस्टर में दर्ज हो,जिसका इस बात पर भी ध्यान रहे कि पड़ोस में कोई भूका ना सोए और कोई बेरोज़गार है तो सब मिलकर उसे रोज़गार से जोड़ ने की कोशिश करें,जिसकी ज़िम्मेदारी इस बात को यक़ीनी बनाना भी हो कि बस्ती के हर मुस्लमान का वोट ,राशन कार्ड और शनाख़्त नामा बना हुआ है और इंतिख़ाब के दिन हर एक अपने वोट का सही इस्तिमाल भी करता है ,जो मिल्लत से मसलकी और ज़ात पात पर मबनी इख़तिलाफ़ात के ज़हर को कम से कमतर करने के लिए कोशां हवावर मुस्लमान को एक अच्छा मुस्लमान बनने की तलक़ीन करे और उन तीन नकात को अपना मिशन बना ले जिन का ज़िक्र मज़मून के शुरू में किया गया है यानी ।
इत्तिहाद मिल्लत ख़िदमत-ए-ख़लक़ और दावत अली अल्लाह ।
ये सब वो बातें हैं जिनका तक़ाज़ा क़ुरआन हमसे करता है अगर आपको ऐसा लग रहा है कि आपसे क़ुरआन के बर-ख़िलाफ़ कोई तक़ाज़ा किया जा रहा है तो इस मज़मून को दुबारा पढ़ लीजिए ।
अपना दिमाग़ किसी के पास गिरवी ना रखिए जो शख़्स अरबी में क़ुरआन की बख़ूबी तिलावत कर सकता है वो उर्दू में इस का मतलब भी बाआसानी समझ सकता है ये दोरकात के इमाम भी इसी क़दर क़ाबिलीयत रखते हैं कि उर्दू ज़बान को बाआसानी लिख पढ़ सकते हैं आप भी ये काम उर्दू में या किसी दीगर ज़बान में कर सकते हैं इस लिए सीधा क़ुरआन से जड़ए ,क़ुरआन अल्लाह का मोजज़ाती कलाम है एक फ़लसफ़ी के लिए इस में ऐसे फ़लसफ़ियाना नकात हो सकते हैं जो रहती दुनिया तक खुलते रहीं लेकिन इस से हट कर क़ुरआन की तालीमात बिलकुल वाज़िह है ,ग़रीबों ,कमज़ोरों मज़लूमों की मदद करो ,कम ना तोलू ,माँ बाप का अदब करो ,लेन-देन लिख कर करो,बुराई का बदला भलाई से दो ,हमेशा सच्च बोलो ,तकब्बुर से बचोगे ,हुक़ूक़ उल-ईबाद ,नमाज़ रोज़े की ताकीद ,विरासत ,दराएत ,रज़ाअत-ओ-ख़रीद-ओ-फ़रोख़त के मसाइल वग़ैरा वग़ैरा इस तरह के अहकात वो हैं जो एक आम आदमी भी तर्जुमे से पढ़ कर बाआसानी समझ सकता है।
ये बात नोट कर के रुख लीजिए कि ये दो रकात के इमाम आपको क़ुरआन के इस मतलूबा काम से रोकने की भरपूर कोशिश करेंगे उन्होंने हर उस शख़्स का रास्ता रोका है जिसने क़ौम को बैदा रकरना चाहा है और उनके हाथ में एक ही हथियार है जिसका इस्तिमाल उन्होंने इन तमाम मुजद्दिद यन पर किया है जिन्हों ने क़ौम को बेदार करने की कोशिश की हसन बुना ,सय्यद क़ुतुब, जमाल उद्दीन अफ़्ग़ानी ,सर सय्यद अहमद ख़ां ,और अल्लामा इक़बाल उनके इताब का शिकार हो चुके हैं जिनको उन्होंने यहूद-ओ-नसारा का एजैंट क़ौम का दुश्मन, मुनाफ़िक़ ,मुशरिक और काफ़िर तक क़रार दिया उन्होंने सर सय्यद पर कुफ़्र का फ़तवा लगाया लेकिन वो ना रुके तो नतीजा ये है कि आज उन्हीं की ज़बान पर सर सय्यद के लिए रहमৃ अल्लाह अलैहि के अलफ़ाज़ हैं उन्होंने अल्लामा इक़बाल पर कुफ़्र का फ़तवा लगाया लेकिन आज उनमें से किसी की तक़रीर उस वक़्त तक पूरी नहीं होती जब तक अल्लामा के दो-चार शेअर उस की तक़रीर में ना आजाऐं उन्होंने कभी बिजली के पंखे को और हाथ में घड़ी बाँधने को नाजायज़ क़रार दिया था आज उन चीज़ों के बग़ैर ख़ुद उनका काम नहीं चलता ,उन्होंने कभी माईक को नाजायज़ कहा था फिर वो कब और क्यों जायज़ हो गया मालूम नहीं ,पता नहीं ये कब किस चीज़ को हराम कर दें फिर वो कब और कैसे जायज़ हो जाये ,इस लिए जायज़ किया है और नाजायज़ किया है वो आप सीधे क़ुरआन से देखिए और उन से भी यही तक़ाज़ा कीजिए कि वो क़ुरआन से और उन अहादीस सहीहा से दरस दें जो क़ुरआन से मुताबिक़त रखती हूँ और जो बात क़ुरआन के वाज़िह हुक्म से टकराए फिर भी ये उसे ही सही ठहरा ने की कोशिश करें तो समझ लीजिए कि कुछ है पर्दा-ए-झ़नगारी में ।
डाक्टर मुहम्मद असलम क़ासिमी ,रोड़ की ,उत्तराखंड
फरवरी २०१8

 

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हज़रत शाह वली उल्लाह shah-waliullah-mohaddis-delhvi-hindi

तहरीक आज़ादी और फ़िक्री इन्क़िलाब के दाई हज़रत शाह वली उल्लाह मुहद्दिस देहलवी (रहि.)

حضرت شاہ ولی اللہ محدث دہلویؒ in Urdu here

आज़ादि-ए-वतन के बाद एक मख़सूस तंग नज़र ज़हनीयत ने अक्सरीयती सियासत का मिज़ाज बन कर मुल्क की दूसरी अक्सरीयत हिन्दुस्तानी मुस्लमानों को इन्सानी ज़िंदगी के हर मैदान में पीछे रखने के लिए ना सिर्फ उन्हीं यकसाँ आईनी हुक़ूक़ से महरूम करने की कोशिश की है बल्कि उनकी ज़बान, मज़हबी, सयासी इक़दार तमद्दुनी तशख़्ख़ुस और शिनाख़्त को मिटाने की तय-शुदा साज़िश पर भी अमल किया है। इसी ज़हनीयत ने मुस्लमानों के शानदार माज़ी और दरख़शां तारीख़ को आने वाली नसलों तक ना पहुंचने देने की मुनज़्ज़म कोशिश की है। हिन्दुस्तानी मिल्लत-ए-इस्लामीया पर ये एक ऐसी कारी ज़रब है जिसका दर्द आज हर बा शऊर मुस्लमान महसूस कर रहा है। इस रुहानी अज़ीयत को महसूस करते हुए हज़रत मौलाना सय्यद अली मियां नदवी अलैहि अलरहमा ने एक ख़ुतबा में फ़रमाया था।

हम किस जुर्म में अपनी इन्सानी अज़मत, रुहानी बुलंदी और पेशवाई के इस दरख़शां वर्क़ को हिन्दोस्तान की क़ौमी तारीख़ से ख़ारिज करते हैं और किस क़सूर में अपने नौजवानों को उनके कारनामों से महरूम रखते हैं। आज हिन्दोस्तान में इस दौर को नज़रअंदाज करने का उमूमी रुजहान पाया जाता है, हमारी जदीद तारीख़ों में, हमारे निसाब की किताबों में, इस का शायान-ए-शान तज़किरा और उनकी बुलंद वमनफ़रद शख़्सियतों का तआरुफ़ नहीं मिलता इस से मालूम होताहै कि हमारी हुब्ब-उल-वतनी  हमारे नेशनलिज़्म में अभी बहुत कुछ कमी और ख़ामी है।।

History of Indian Muslim Freedom Fighters

बदकिस्मती से आज़ादी वतन के बाद हमारे मुल्क में ये खेल खुल कर खेला गया। मादर-ए-वतन के लिए लाज़वाल क़ुर्बानियां पेश करने वाले मुस्लिम हीरोज़ को नज़रअंदाज करके तस्वीर के सिर्फ एक रुख को वाज़िह करने की कोशिश की गई, इस कारॱएॱ ज़िश्त में ऐसे ऐसे अफ़राद और तन्ज़ीमों को बालादस्ती हासिल हुई जिन का वतन की आज़ादी और तामीर व तरक़ी से कोई ताल्लुक़ कभी नहीं रहा। ये तंगनज़र सियासत शायद ये भूल गई कि काइनात-ए-इन्सानी में सबसे ताक़तवर शैय है सच्चाई, जिसे जिस क़दर दबाया जाये वो और ज़्यादा शिद्दत के साथ उभरती है। हिन्दोस्तान की तारीख़ आज़ादी का सबसे बड़ा सच्च ये है कि इस का आग़ाज़ इस मुस्लमान  बुज़ुर्ग, आलिम बाअमल, मुफ़क्किर इन्सानियत, मुफ़स्सिर-ए-हक़ वसदाक़त और फ़ख़र क़ौम-ओ-वतन के फ़िक्री जिहाद से होता है जिसका नाम-ए-नामी है हज़रत शाह वली अल्लाह मुहद्दिस देहलवी (रह.) । आपका फ़िक्री जिहाद एक इन्क़िलाबीतहरीक की सूरत में हिंदुस्तानियत  के बे-जान क़ालिब में रूह-ए-हुर्रियत बन कर दुनिया के सामने आया।

हज़रत शाह वली अललहऒ ने इस नाज़ुक दौर में इन्सानी आज़ादी के सबसे बड़े ज़ामिन मज़हब इस्लाम की अल्व्ही तालीमात की लो से शम्मा आज़ादी को रोशन किया जब अज़ीम मुग़्लिया सलतनत का शीराज़ा मुंतशिर हो चुका था, नादिरशाह और अहमद शाह अबदाली के हमले इस सरज़मीन को लहूलुहान कर चुके थे, मरहटे, जाट और सिख  मुस्लमानों के ख़िलाफ़ नबुरद आजमा  थे और इस ख़ाना-जंगी और अफ़रातफ़री का फ़ायदा उठाने में मसरूफ़ था बर्तानवी क़ज़्ज़ाक़ों का गिरोह यानी ईस्ट इंडिया कंपनी। पुर्तगाली और फ़्रांसीसी भी सोने की इस चिड़िया को अपने दाम हवस में जकड़ने के लिए सरगर्दां थे। ये शातिर और साज़िशी ग़ैर मुल्की ताक़तें हिन्दोस्तान को लूटने खसोटने में मसरूफ़ थीं।

मुस्लमान सदीयों से इस मलिक के मालिक रहे थे इसलिए वही उन ताक़तों के निशाने पर थे लेकिन हिन्दुस्तानी समाज का कोई तबक़ा तबाही   से महफ़ूज़ नहीं था। बाक़ौल जनाब फ़ैसल अहमद नदवी मुसन्निफ़ (तहिरीक-ए-आज़ादी में उल्मा का किरदार)

शाह साहिब का दौर हिन्दोस्तान की इस्लामी तारीख़ का बदतरीन और तारीक तरीन ज़माना है। शाह साहिब ने अपनी ज़िंदगी में कई बादशाहों को तख़्त दिल्ली पर देखा, बेहतर से बेहतर और बद से बदतर, और औरंगजेब से शाह आलम तक, इस दौरान अख़लाक़ी बिगाड़ अपनी आख़िरी हद को पहुंच चुका था, वो अमीरों का गुलछर्रे उड़ाना, वो तन-आसानी व आराम तलबी ,ताय्युश कोशी, दौलत परस्ती, ख़ुदग़रज़ी और बे ईमानी कि शैतान भी शर्मा जाये। दूसरी तरफ़ सयासी दाओ पेच और मकरोफ़रीब, इंतिशार और बदनज़मी की कोई इंतिहा नहीं थी।

सादात बारहा का तसल्लुत और आख़िरी दर्जा का ज़ुल्मोसितम, मरहट्टों का ज़ोर,जाटों का असर,सिखों की शोरिश नादिरशाह का हमला और दिल्ली का क़त्ल-ए-आम, आम सियासत-ए-मुल्की में रोहीलों की शिरकत और इक़दार में उनका अमल दख़ल, ईरानी उमरा-ए-की बाग़ियाना कोशिशें और हुकूमत के ख़िलाफ़ साज़िशें, अख़ीर में अंग्रेज़ों की ललचाई हुई नज़रें और तख़्त सलतनत पर क़बज़ा की तदबीरें, इन सब चीज़ों ने शाह साहिब जैसे अल्लाह वाले बुज़ुर्ग को झिंझोड़ कर रख दिया।

मलिक और अवाम की ज़बूँ हाली ने आपको ज़हनी  इज़तिराब में मुबतला कर दिया। इसी हालत में सन1728में आप हिजाज़ मुक़द्दस तशरीफ़ ले गए। आपने दो साल वहां रह कर हज उमरा के लिए यूरोप और एशिया से आने वाले ज़ाइरीन के ज़रीये इन मुल्कों से मुताल्लिक़ पूरी वाक़फ़ीयत हासिल की।तुर्की की इस्लामी हुकूमत को अगरचे समाजी ख़राबियों का घन लग चुका था मगर फिर भी वो इस ज़माना में एशिया की सबसे बड़ी इस्लामी हुकूमत थी। तमाम मशरिक़ वुसता पर उस के इक़तिदार का पर्चम लहरा रहा था,बहर अरब में अदन तक तुर्की का क़बज़ा था, यूरोप और अफ़्रीक़ा के भी बहुत से हिस्से उस के इख़तियार में थे। शाह साहिब ने इस सबसे बड़ी इस्लामी हुकूमत के अंदरूनी हालात का गहिरी नज़र से मुताला किया। नामवर मुअर्रिख़,फ़क़ीह और मुहद्दिस हज़रत मौलाना सय्यद मुहम्मद मियां  अपनी शहरा आफ़ाक़ किताब उल्मा हिंद का शानदार माज़ी में लिखते हैं:

इस्लामी ममालिक का जायज़ा लेने के बाद आपके गहरे ग़ौर-ओ-ख़ौज़ और आला तदब्बुर ने फ़ैसला किया कि जो कुछ समाजी मआशी या इक़तिसादी तबाही उस वक़्त मौजूद है इस का असल सबब मुलूकियात और शहंशाहियत है। अपने सफ़र हिजाज़ में आपके ज़मीर की आवाज़ ने ये फ़ैसला भी सुना दिया कि इन तबाहियों और बर्बादियों का वाहिद ईलाज फ़क कल निज़ाम है यानी ऐसा हमागीर और मुकम्मल इन्क़िलाब जो समाज के मआशी, सयासी, इक़तिसादी ग़रज़ कि हर एक ढाँचे को बदल डाले क्योंकि उस वक़्त का हर एक निज़ाम ख़ाह उस का ताल्लुक़ किसी भी शोबा से हो, शहंशाहियत का  परवरदा है और वो अमराज़ जो शहंशाहियत के साथ लाज़िम होते हैं हर शोबा-ए-हियात में सरायत कर चुके हैं, पस कोई इस्लाह उस के बग़ैर मुम्किन नहीं कि हर निज़ाम कुहना को मुनहदिम करके उस की जगह निज़ाम नौ तामीर किया जाये।

हज़रत शाह वली अल्लाह मुहद्दिस देहलवी रहमৃ अल्लाह अलैहि की ज़ात गिरामी को सिर्फ हिन्दोस्तान ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में अवामी इन्क़िलाब और क़ौमों की आज़ादी का अव्वलीन रहनुमा कहा जा सकता है।क्योंकि हज़रत ने इस ज़माना में इस्लामी जिहाद की हक़ीक़ी रूह के साथ इन्क़िलाब-ए-नौ का अमली और फ़िक्री नमूना दुनिया के सामने पेश किया जब इन्क़िलाब-ए-फ़्रांस (1789)को रौनुमा होने में 50साल बाक़ी थे जिसे तारीख़-ए-आलम में अव्वलीन अवामी इन्क़िलाब की हैसियत हासिल है। शाह साहिब ने हिन्दोस्तान की सरज़मीन में इक़तिसादीयात और सियास्यात के वो उसूल मुरत्तिब फ़रमाए जो आज भी अक़्वाम आलम के लिए निशान-ए-राह हैं। ये वो ज़माना था जब कार्ल मार्क्स और अंजुल को पैदा होने में पूरी एक सदी बाक़ी थी।

हिन्दोस्तान को बजा तौर पर फ़ख़र है कि शाह साहिब ने अपनी मशहूर आलम किताब हुज्जतुल बालग़ा, इस दौर में तसनीफ़ फ़रमाई जब अक़्वाम आलम उन तामीरी नज़रियात से आगाह नहीं थीं। बिलाशुबा ये इन्क़िलाबी नज़रियात इस्लामी और कुरआनी तालीमात की रोशनी में अपने अह्द की इस तारीख़ साज़ शख़्सियत ने मुरत्तिब किए:

(1) दौलत की असल बुनियाद मेहनत है, मज़दूर काश्तकार क़ुव्वत का सुबह हैं, बाहमी तआवुन शहरीयत की रूह-ए-रवाँ है। जब तक कोई शख़्स मलिक और क़ौम के लिए कोई काम ना करे मलिक की दौलत में इस का कोई हिस्सा नहीं।
(2) जुआ, सट्टा और अय्याशी के अड्डे ख़त्म किए जाएं जिनकी मौजूदगी में तक़सीम दौलत का सही निज़ाम क़ायम नहीं हो सकता और बजाय उस के कि क़ौम और मलिक की दौलत में इज़ाफ़ा हो, वो दौलत बहुत सी जेबों से निकल एक तरफ़ सिमट आती है।
(3) मज़दूर और काश्तकार और जो लोग मलिक और क़ौम के लिए दिमाग़ी काम करें दौलत के असल मुस्तहिक़ हैं। उनकी तरक़्क़ी और ख़ुशहाली मलिक और क़ौम की ख़ुशहाली है। जो निज़ाम उन कुव्वतों को दबाए वो मलिक के लिए ख़तरा है,इस को ख़त्म किया जाना चाहीए।
(4) जो समाज मेहनत की सही क़ीमत अदा ना करे, मज़दुरों और किसानों पर भारी टैक्स लगाए क़ौम का दुश्मन है। इस को ख़त्म होना चाहीए।
(5) ज़रूरतमंद मज़दूर की रजामंदी काबिल-ए-एतिबार नहीं, जब तक कि इस की मेहनत की सही क़ीमत अदा ना की जाये जो इमदाद-ए-बाहमी के उसूल पर लाज़िम होती है।
(6) जो पैदा-वार या आमदनी तआवुन बाहमी के उसूल पर ना हो वो ख़िलाफ़-ए-क़ानून है।
(7) काम के औक़ात मुक़र्रर किए जाएं, मज़दुरों को इतना वक़्त ज़रूर मिलना चाहीए कि वो अपनी रुहानी वाख़लाक़ी इस्लाह कर सकें और उनके अंदर मुस्तक़बिल के मुताल्लिक़ ग़ौरवफ़कर की सलाहीयत पैदा हो सके।
(8) तआवुन बाहमी का सबसे बड़ा ज़रीया तिजारत है, लिहाज़ा उस को तआवुन के उसूल पर ही जारी रहना चाहीए। जिस तरह ताजिरों के लिए जायज़ नहीं कि वो ब्लैक मार्कीट या ग़लत किस्म की मुसाबक़त से रूह तआवुन को नुक़्सान पहुंचाएं, ऐसे ही हुकूमत के लिए ये दरुस्त नहीं कि भारी टैक्स लगा कर तिजारत के फ़रोग़ वतरक़ी में रुकावट पैदा करे या रख़्ना डाले।
(9) वो कारोबार जो दौलत की गर्दिश को किसी ख़ास तबक़ा में मुनहसिर कर दे मलिक के लिए तबाहकुन है।
(10) वो शाहाना निज़ाम ज़िंदगी जिसमें चंद अश्ख़ास या चंद ख़ानदानों की ऐश ईशरत के सबब से दौलत की सही तक़सीम में ख़लल वाक़्य हो, उस का मुस्तहिक़ है कि इस को जल्द अज़ जल्द ख़त्म करके अवाम की मुसीबत ख़त्म की जाये और उनकी मुसावियाना निज़ामज़िंदगी का मौक़ा दिया जाये।
(11) ज़मीन का मालिक-ए-हक़ीक़ी अल्लाह (और ज़ाहिरी निज़ाम के लिहाज़ से स्टेट)है। बाशिंदगान मलिक की हैसियत वो है जो किसी मुसाफ़िरखाना में ठहरने वालों की। मिल्कियतका मतलब है कि इस के हक़ इंतिफ़ा में दूसरे की दख़ल अंदाज़ी क़ानूनन ममनू हो।
(12) तमाम इन्सान बराबर हैं, किसी को ये हक़ नहीं कि वो अपने आपको मालिक मुल्क एलिनास,मालिक-ए-क़ौम या इन्सानों की गिरवनों का मालिक तसव्वुर करे, ना किसी के लिए जायज़ है कि वो किसी साहिब इक़तिदार के लिए ऐसे अलफ़ाज़ इस्तिमाल करे।
(13) स्टेट के सरबराह की वो हैसियत है जो किसी वक़्फ़ के मुतवल्ली की है, वक़्त का मुतवल्ली अगर ज़रूरतमंद हो तो इतना वज़ीफ़ा ले सकता है मलिक के आम बाशिंदे की तरह ज़िंदगी गुज़ार सके।
(14) रोटी कपड़ा और मकान और ऐसी इस्तिताअत कि निकाह करसके और बच्चों की तालीम और तरबियत कर सके, बलालहाज़ मज़हब वंसल हर इन्सान का पैदाइशी हक़ है।
(15) इसी तरह मज़हब, रंग-ए-नस्ल के किसी तफ़ावुत के बग़ैर बाशिंदगान मलिक के मुआमलात में यकसानियत के साथ अदल व इनसाफ़, उनके जान वमाल का तहफ़्फ़ुज़, उनकी इज़्ज़त व नामोस की हिफ़ाज़त, हक़ मिल्कियत में आज़ादी, हुकूक़-ए-शहरीयत में यकसानियत हर बाशिंदा-ए-मलिक का बुनियादी हक़ है।
(16) अपनी ज़बान व तहज़ीब को ज़िंदा रखना हर एक फ़िर्क़ा का बुनियादी हक़ है। बैन-उल-अक़वामी निज़ाम के बारे में अज़ीम इन्क़िलाबी मुफ़क्किर हज़रत शाह वली अल्लाह मुहद्दिसदेहलवी (रहि.) ने रहनुमा उसूल वज़ा फ़रमाए हैं ख़ुद-मुख़्तार इलाक़े बनाए जाएं, ये ख़ुद-मुख़्तार अकाईयां अपने मुआमलात में आज़ाद होंगी। हर यूनिट में इतनी ताक़त ज़रूर होनी चाहीए कि अपने जैसे यूनिट के इक़दाम का मुक़ाबला करसके। ये तमाम अकाईयां एक ऐसे बैन-उल-अक़वामी निज़ाम (बलॉक) में मुंसलिक हूँ जो फ़ौजी ताक़त के लिहाज़ से इक़तिदार-ए-आला का मालिक हो, उस को ये हक़ नहीं होगा कि किसी मख़सूस मज़हब या मख़सूसतहज़ीब को किसी दीगर यूनिट पर लादसके अलबत्ता उस का ये फ़र्ज़ ज़रूर होगा कि किसी क़ौम के यूनिट को ये मौक़ा ना दे कि किसी दूसरी क़ौम या तहज़ीब पर हमला करसके।

शाह साहिब ने आज से 3सदी क़बल हिन्दुस्तानी सैकूलरिज़म यानी एहतिराम कुल मज़ाहिब का इन्क़िलाबी नज़रिया पेश किया था:

दीन और सच्चाई की बुनियाद एक है, इस के पेश करने वाले एक सिलसिला की कड़ियाँ हैं, वालियाँ सदाक़त हर मलिक और क़ौम में गुज़रे हैं, इन सब का एहतिराम ज़रूरी है। सच्चाई और दीन के बुनियादी उसूल तमाम फ़िर्क़ों में तक़रीबन तस्लीम शूदा हैं, मसलन अपने परवरदिगार की इबादत, उस के लिए नज़र विनयाज़, सदक़ा वख़ीरात और रोज़ा वग़ैरा, ये सब काम अच्छे हैं, अलबत्ता अमली सूरतों में इख़तिलाफ़ है। सारी मुहज़्ज़ब दुनिया के समाजी उसूल और उनका मंशा वमक़सद एक है मसलन हर एक मज़हब और फ़िर्क़ा जिन्सी अनारकी को नापसंद और अख़लाक़ी जुर्म क़रार देता है। जिस्मानी ताल्लुक़ात के लिए मर्द और औरत में एक मुआहिदा हर फ़िर्क़ा में ज़रूरी है अलबत्ता उस की सूरतों मुख़्तलिफ़ हैं।हर फ़िर्क़ाअपने मर्दों को दुनिया की नज़रों से ग़ायब कर देना ज़रूरी समझता है, इख़तिलाफ़ इस में है कि ज़मीन में दफ़न करके नज़रों से ओझल कर दिया जाये या जला कर।(हुज्जतुल बालग़ा)

शाह ऒ साहिब जिहाद को एक मुक़द्दस फ़रीज़ा क़रार देते हैं, आपने जिहाद के मअनी ये बताए हैं कि मुक़द्दस उसूल के लिए इन्सान अपने अंदर जज़्बा-ए-फ़दाईत पैदा करे यहां तक कि वो अपनी हस्ती मुक़द्दस उसूल के लिए फ़ना कर दे।
अपने दौर के इस अह्द साज़ मुदब्बिर आज़म ने अच्छी तरह समझ लिया था कि शहंशाहियत का ज़माना ख़त्म हुआ उस वक़्त के हिन्दोस्तान की सूरत-ए-हाल उनके सामने थी। अंग्रेज़ों की चीरा दसतियाँ बढ़ रही थीं, वतन की आज़ादी ख़तरे में थी, आपने वक़्त की इस नाज़ुक सूरत-ए-हाल में अपनी इस हमागीर तहरीक का आग़ाज़ किया जो दरहक़ीक़त हिन्दोस्तान की तहिरीक-ए-आज़ादी की तारीख़ का पहला क़दम था।उनके पेश-ए-नज़र पूरा हिन्दोस्तान था। चूँकि मर्कज़ी हिन्दोस्तान की क़ियादत उस वक़्त मुस्लमानों के हाथों में थी, इसलिए ये क़ुदरती अमर है कि शाह साहिब ने मुस्लमानों से ख़िताब किया। लेकिन शाह साहिब की दावत के उसूल आम इन्सानियत के उसूल थे। उनका ज़ोर मज़हब की रसूम पर नहीं बल्कि मज़हब की रूह पर था,उनकी ज़ाहिरी शक्ल पर नहीं बल्कि क़ानून की जान यानी अदल वानसाफ़ पर था। मरहट्टों जाटों सिखों और इस अह्द की छोटी छोटी तहरीकें अपनी अपनी जगह पर ठीक होंगी लेकिन उनमें से किसी तहरीक में इतनी वुसअत और हमागीर य नहीं थी कि वो हिन्दोस्तान की मर्कज़ीयत और वहदत को बहाल कर सकने की तदबीरसोचती। शाह साहिब अपने मुजव्वज़ा निज़ाम में अकबर, जहांगीर, शाहजहाँ और औरंगज़ेब के ज़माने की मर्कज़ीयत और सलतनत हिंद के इक़तिदार-ए-आला को बहाल देखना चाहते थे लेकिन इस तरह से कि मुतलक़ उल-अनान बादशाहों के बजाय इन्साफ़ की हुकूमत हो। (शाह वली अल्लाह और उनकी सयासी तहरीक अज़ मौलाना मुहम्मद सरवर)

हज़रत शाह वली अल्लाह देहलवी  फ़ौजी इन्क़िलाब के हामी थे लेकिन वो फ़ौजी इन्क़िलाब जो जिहाद के उसूल पर हो जिसका नसब उल-ऐन सबसे बेहतर वबरतर हो और जिसका हर मुजाहिद ज़ाती अग़राज़ से यहां तक बुलंद हो कि ख़ुद अपनी शख़्सियत को फ़नाकर चुका हो, उस का हर इक़दाम सिर्फ़ ख़ुदा के लिए हो जिसकी हदूद ये हैं कि सारी मख़्लूक़-ए-ख़ुदा का कुम्बा है, सबसे बेहतर वो है जो ख़ुदा के कुम्बा की भलाई और बेहतरी के लिए क़ुर्बानी दे,इसलिए नहीं कि ख़लक़-उल-ल्लाह उस का एहसान माने या उस की तारीख़ रोशन हो, मुजाहिद नसब उल-ऐन के लिए क़ुर्बान होजाने को अबदी ज़िंदगी तसव्वुर करे। ऐसा इन्क़िलाब पेशा-वर सिपाहीयों के ज़रीया नहीं हो सकता बल्कि उन पर-ख़ुलूस रज़ाकारों के ज़रीया हो सकता है जिन्हें उस की तर्बीयत खासतौर पर दी गई हो जो नसब उल-ऐन को समझें और इस्लाही नज़रियात पर पहले अपने आपको हमवार करें उस के बाद उनको कामयाब बनाने के लिए क़ुर्बान होजाना अपनी ज़िंदगी का मक़सद बना लें। हज़रत शाह वली अल्लाह ने सबसे पहले ही ख़िदमत अंजाम दी, आपने अपनी हमागीर तहरीक का हेडक्वार्टर दिल्ली में क़ायम किया, दिल्ली उस ज़माना में भी ऐसा शहर था जहां बहुत सी क़ौमों के लोग रहते थे।ज़ाहिर है ऐसे शहर से उठने वाली किसी भी तहरीक का असर दूर दूर तक फैल सकताथा। तहरीक के इस असासी मर्कज़ की सरबराही शाह साहबऒ ने अपने लायक़ फ़र्ज़ंद और अज़ीम मुजाहिद आज़ादी हज़रत शाह अबदूल-अज़ीज़ मुहद्दिस देहलवी ऒ को सौंपी।

तहरीक का दूसरा अहम मर्कज़ राय बरेली में वाक़्य तकिया शाह इलमुल्लाह में क़ायम फ़रमाया, ये मुक़द्दस मुक़ाम पहले से ही इस्लाम की तालीम और तर्विज़ का मर्कज़ था। यही वो वली अलल्लाही मर्कज़ तहरीक है जहां से सय्यद अहमद शहीद ने जिहाद आज़ादी और जज़बए- हुर्रियत का तारीख़ साज़ पर्चम बुलंद किया था। नजीबाबाद, लखनऊ और ठट्ठा (सिंध)वग़ैरा मुक़ामात पर भी शाह साहिब ने अपनी इन्क़िलाबी तहरीक के मराकज़ क़ायम किए जहां से ज़हनी, फ़िक्री, और अमली तर्बीयत याफताह मुजाहिदीन की बड़ी तादाद ने पूरे मुल्क में एक पाकीज़ा और सेहत मंद इन्क़िलाब की रूह फूंक दी। वली अलल्लाही तहरीकएक मुकम्मल पैग़ाम इन्क़िलाब था जो सिर्फ बादशाह और बादशाह परस्तों के लिए ही पैग़ाम फ़ना नहीं था बल्कि उन ताक़तों के लिए भी मौत का पैग़ाम था जो सलतनत मुग़्लिया की जांनशीन बनना चाहती थीं या पेशा-वर सिपाहीयों की मदद से मलिक के चुप्पे चुप्पे पर जागीर दाराना निज़ाम के झंडे गाड़े हुए थीं। बद अनवान बादशाह, नवा बैन,अमर ए-ए-और जागीरदारों के इलावा शाह साहब की तहरीक दुनिया पसंद उल्मा, मशाइख़ के ख़िलाफ़ भी एक मोस्सर आवाज़ थी। चूँकि अवाम का बड़ा तबक़ा ऐसे ही अनासिर के ज़ेर-ए-असर था इस लय आपकी इस्लाही वानक़लाबी तहरीक की क़दम क़दम पर मुख़ालिफ़त हुई लेकिन आपने मुख़ालिफ़त की शदीद आंधीयों में हमागीर इन्क़िलाब का चराग़-ए-रौशन किया। दुनिया के मारूफ़ इन्क़िलाबी मार्क्स ऐंजलिस और लेनिन ऐसे दौर में हुए जब प्रैस की ताक़त ने बहुत कम वक़्त में उनका पैग़ाम कुर्रा-ए-अर्ज़ के तमाम इन्सानों तक पहुंचा दिया। लेकिन जिस वक़्त शाह साहब ना सिर्फ हिन्दोस्तान बल्कि पूरे आलम-ए-इंसानियत को मुलूकियात से आज़ादी और हुर्रियत-ए-इन्सानी का पैग़ाम देना चाह रहे थे,उन्हें ऐसी सहूलयात मयस्सर ना थीं। इस वक़्त तरवीज व इशाअत का ज़रीया तक़ारीर,तर्बीयती मराकज़और क़लमी तहरीरें ही थीं।दिल्ली पर मरहट्टों की यलग़ार, नादिरशाह का ख़ौफ़नाक क़त्ल-ए-आम, पानीपत के मैदान में अहमद शाह अबदाली की मरहट्टों के ख़िलाफ़ फ़ैसलाकुन जंग-ए-अज़ीम जैसे तूफ़ानों से गुज़रने वाले शाह साहब ने अपने इन्क़िलाबी नज़रियात को कभी तर्जुमा क़ुरआन-ए-करीम के रंग में पेश किया, कभी तसव्वुफ़ रूहानियत और इस्लामी फ़लसफ़ा को वसीला-ए-इज़हार बनाया  या इस्लामी तारीख़ और सीरत-ए-सहाबा किराम का सहारा लिया। लेकिन इस एहतियात के बावजूद आप और आपके जांनशीन क़ातिलाना हमलों और वहशयाना सज़ाओं से ना बच सके।

शाह साहिब ने क़ुरआन-ए-क्रीम का उस वक़्त मुरव्वज ज़बान फ़ारसी में तर्जुमा किया तो वो दरअसल आपके अख़लाक़ी और मज़हबी इन्क़िलाब का पहला क़दम था क्योंकि शाह साहब के दौर में क़ुरआन-ए-करीम के तर्जुमा व तफ़सीर के ज़रीये कुरआनी उलूम की तरवीज को बेहद ख़तरनाक समझा जाता था। जब शाह साहब ने क़ुरआन-ए-क्रीम का फ़ारसी तर्जुमा किया तो दिल्ली की मस्जिद फ़तह पूरी पर उलमाए सूॱएॱ की तरफ़ से उन पर क़ातिलाना हमला किराया गया और ये प्रोपेगंडा किया गया कि जब दफ़्तरों के मुहर्रिर क़ुरआन को जानने लगेंगे तो उल्मा की क्या ज़रूरत बाक़ी रहेगी और उनका इक़तिदार कैसे क़ायम रहेगा?(तहरीक शेख़ उल-हिंद)

शाह वली उल्लाह  की इन्क़िलाबी तहरीक में हिंदू मुस्लिम की तफ़रीक़ नहीं थी और बाक़ौल हज़रत मौलाना अबैदुल्लाह सिंधी  :
हिंदू नौजवानों में भगवत गीता की तालीमात से ही स्परिट पैदा की जा सकती थी मगर इस ज़माना की सियासत के लिहाज़ से इन्क़िलाब का मुख़्तसर रास्ता यही था कि मुस्लिम नौजवानों में जो शाह साहिब ऒ से ज़्यादा क़रीब थे,सही एहसास और क़ुव्वत अमल पैदा कर दी जाये।एक ख़ास बात ये भी थी कि पूरे शुमाली हिंद और जुनूबी हिंद के बड़े हिस्से में बरसर-ए-इक़तिदार मुस्लमान फ़न सिपहगरी में माहिर और फ़ौजी सलाहीयत वक्वत के मालिक थे और वसती हिंद की राजपूत रियास्तें मुस्लमानों का इक़तिदार-ए-आला तस्लीम किए हुए थीं। उनके राजा सलतनत मुग़्लिया के मंसबदार और दरबार के ईरानी तोरानी ग्रुपों में शामिल थे चुनांचे इस नाज़ुक दौर में किसी हिंदू रियासत ने सलतनत मुग़्लिया के टिमटिमाते चिराग़ को गुल करने की कोशिश नहीं की, इस दौर की मरहट्टी ताक़तों के बारे में भी ये फ़ैसला करना मुश्किल है कि वो मुग़ल बादशाह को ख़त्म करने के दरपे थीं या दरबार में अपना इक़तिदार तस्लीम कराना चाहती थीं। फिर 1857-ए-में तो मरहट्टों की बाक़ीमांदा ताक़त ने ये तस्लीम कर ही  लिया था कि इन्क़िलाब का रास्ता सिर्फ यही है कि सलतनत मुग़्लिया के किसी वारिस को हुक्मराँ तस्लीम किया जाये। लिहाज़ा अख़लाक़ और मज़हब दोनों का तक़ाज़ा था कि इन्क़िलाब के लिए सबसे पहले इस तबक़े की तर्बीयत की जाये जिस पर सारा मुल़्क एतिमाद किए हुए था, चूँकि एशिया में ज़्यादा-तर हिस्सा पर मुस्लमान बरसर-ए-इक़तिदार थे इसलिए मुस्लिम नौजवानों की इस्लाह से पूरे एशिया की इस्लाह हो सकती थी ओर ये  क़ुव्वत यूरोप के उमँडते हुए सेलाब को रोक सकती थी। यही वजह है कि तहरीक वली उल्लाही के साय में जो जमात आज़ादी की जंग में सबसे पहले सामने आई इस में सिर्फ मुस्लमान मुजाहिदीन आज़ादी के नाम नुमायां हुए। (उल्मा हिंद का शानदार माज़ी)

सन 1762में हज़रत शाह वली उल्लाह मुहद्दिस देहलवी (रह.) की वफ़ात हो गई अपने तारीख़ी वसीयत नामे में शाह साहब ने दर्दमंदाना लफ़्ज़ों में फ़रमाया था। हम लोग अजनबी मुसाफ़िर लोग हैं, हमारे बाप दादे इस मुल्क में बहालत मुसाफ़िरत यहां दाख़िल हुए और फिर वही हालत वापिस हो गई।
शाह साहब देख रहे थे कि अगर यही लील वनहार हैं तो इस मुल्क में अब दीन और अहल दीन का ख़ुदा ही हाफ़िज़ है, जो कुछ होने वाला था उनकी दूरबीन नज़र में रोशन था, लेकिन इस वक़्त तक दिल्ली पर अंग्रेज़ों का ग़लबा नहीं हुआ था और हालात इस क़दर संगीन नहीं हुए थे कि शाह साहिब  अपने प्रोग्राम, अज़ाइम और नज़रिया जिहाद के मुताबिक़ अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ अमली जद्द-ओ-जहद का आग़ाज़ करते और बर्तानवी दर अंदाज़ों के ख़िलाफ़ सरीही जिहाद का फ़तवा सादर फ़रमाते। ये शरफ़ उनके साहबज़ादे और वारिसशाह अबदुलअज़ीज़ ऒ के लिए मुक़द्दर था। मौलाना सईद अहमद अकबराबादी रक़म तराज़हैं:

अगरचे हमारी नज़र से कहीं नहीं गुज़रा कि शाह साहिब  ने मुलक  को दार-उल-हरब कहा हो, लेकिन वो मुलक का जो नक़्शा खींचते हैं और जो हालात बयान करते हैं वो हरगिज़ किसी दारुस्सलाम के नहीं हो सकते और इस बिना पर बे-तकल्लुफ़ ये कहा जा सकता है कि उनके नियम शऊरी ज़हन में हिन्दोस्तान के दार-उल-हरब में मुंतक़िल हो जाने का तसव्वुर मौजूद था।

इस इन्क़िलाबी नज़रिया को हज़रत शाह अबदुलअज़ीज़ ऒ ने अमली तौर पर पेश किया, लेकिन जैसा कि जनाब के ऐम अशर्फ़ ने लिखा है कि: शाह वली उल्लाह अठारहवीं सदी के अहया इस्लाम के मुमताज़ मुहर्रिकों में हैं जिन्हों ने बर्तानवी हुकूमत के ख़िलाफ़ पै दरपे शोरिशों की क़ियादत की। इस हक़ीक़त से इनकार नहीं किया जा सकता कि शाह वली उल्लाह की तहरीक हिन्दोस्तान की तहिरीक-ए-आज़ादी की तारीख़ में ही नहीं बल्कि आलमी तहरीकात आज़ादी में संग-ए-मील की हैसियत रखती है। इसी से आम बेदारी पैदा हुई, यहीं से रूह मिली यहीं से ग़िज़ा फ़राहम हुई, उसी वली उल्लाही तहरीक ने जहद आज़ादी की ज़मीन हमवार की।

मुस्लिम मुझाहिदीन आजादी के लाजवाब कारनामों  बारे में  और जानकारी पाने लिए  पढ़ें अमेज़न डॉट पर उपलब्ध पुस्तक फ़खरे वतन ।

History of Indian Muslim Freedom Fighters

 

https://en.wikipedia.org/wiki/Shah_Waliullah_Dehlawi
शाह वलीउल्लाह देहलवी
https://www.rekhta.org/ebooks/hazrat-shah-waliullah-dehlvi-shakhsiyat-wa-hikmat-ka-ek-ta-aruf-mohammad-yaseen-mazhar-siddiqi-ebooks
शाह वलीउल्लाह मोहद्दिस देहलवी : ई-पुस्तकें
https://www.rekhta.org/ebooks?author=shah-waliullah-mohaddis-delhvi&lang=hi

quran hindi unicode कुरआन हिंदी युनिकोड

Translation Quran in Hindi unicode >original to http://www.quranhindi.com, best use in tanzil.net —special thanks: हिन्दीकोष डॉट इन — 1. अल-फ़ातिहा (मक्का में उतरी – आयतें 7) अल्लाह के नाम से जो बड़ा कृपालु और अत्यन्त दयावान हैं। 1:1 प्रशंसा अल्लाह ही के लिए हैं जो सारे संसार का रब हैं 1:2 बड़ा कृपालु, अत्यन्त दयावान हैं 1:3 […]

यूनिकोड हिंदी में कुरआन हिंदी वालों ने किया था

ब्लॉगिंग के शुरू के दिनों में गूगल पर कुछ आर्टिकल ढूंढते समय भारत की हिन्दीकोश डॉट इन पर पवित्र  कुरआन के अनुवाद पर नजर पड़ी, देखा तो हैरत में पड़ गया क्योंकि वहां भारतीय धर्म ग्रंथ की लिस्ट में हिंदी में अनुवाद जो सबसे ज्यादा प्रचलित भी है मौजूद था यह अनुवाद डॉक्टर फारुख खान का किया हुआ है जो हिंदी अनुवाद में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होता रहा है, वेबसाइट चलाने वालों ने इसको भारतीय धर्मग्रंथ समझकर टाइप करवाया प्रूफ करवाया और यूनिकोड में बदला इन सब में काफी खर्च आया होगा जो कि उनकी जेब से से गया , उसमें कुछ छोटी सी गलतियां थी , उनको ईमेल करने से पहले 114 सूरतें पूरी तरह से वहां से फाइल उठा ली, सुरक्षित कर ली  not working link :  http://hindikosh.in/quran और फिर इन छोटी-छोटी बातों की तरफ ध्यान देने को कहा एक-दो दिन बाद देखता हूं कि वहां से कुरआन का अनुवाद ही गायब है जहां तक मेरा अंदाजा है हुआ यह होगा कि मौजूदा अफसरों को समझ में आ गया होगा कि यह तो भारतीय धर्मग्रंथ नहीं है

quran-unicode-hindi-jamat-islami

मैंने पहली बार मौलाना कलीम सिद्दीकी से सुना था कि

अल्लाह का काम रुकता नहीं वह करवा लेता है,

इस बात को इस मामले भी पूरा होता देखा जा सकता है कि इसको भारतीय धर्म ग्रंथ समझकर यूनिकोड में करवा दिया जो कि इंटरनेट में बहुत ही उपयोगी है, यानी इस की बेहद जरूरत थी, यह काम करना तो किसी इदारे का था लेकिन वह तो इस तरफ ध्यान नहीं दे पाए मजबूरी में अधिकतर डॉक्टर फारुख खान का अनुवाद ही एक दूसरे को देते हैं ,खरीदते हैं ,जो यूनिकोड का मैटर मैंने उठा लिया था उस में सूरत और आयतों की नंबरिंग में जो छोटी-छोटी कमियां थी वह दूर कर ली थी वैसे भी वो जो सरसरी देखने पर सामने आई थी अल्लाह ने भरपूर नजर डालने का डालने का बहाना बनाया कि क़ुरआन की तफ़्सीर सॉफ्टवेयर बनाने वाले आरिफ या से मुलाकात नेट पर हुई और उन्होंने दिलचस्पी दिखाई कहा कि मैं अपने सॉफ्टवेयर में कुरआन का हिंदी अनुवाद भी जोड़ लूंगा, मैंने उस समय जो अनुवाद था वह उनको दिखाया उन्होंने अपने किसी भारतीय दोस्त हिंदी जानने वाले को दिखाया उसने कहा यह तो उर्दू जैसी हिंदी है यानी बस उर्दू को हिंदी में लिख दिया गया है जो की पसंद नहीं किया जाएगा मैंने वह भी काफी मेहनत से तैयार किया था अब जब यह अच्छी हिंदी वाला अनुवाद मेरे हाथ लगा तो दोबारा राबता किया कि यह जोड़ लो तब उन्होंने कहा कि हर आयत के साथ उसका सूरत और आयत नंबर भी लिखा होना चाहिए इस तरह कुरआन की हर सूरत पर नंबर डालना यानी लगभग 6666 आए तो पर नंबर डालना काफी समय का काम था लेकिन अल्लाह ने शौक डाला था करने लगा लगभग 7 महीने मैं इस तरह की फाइल तैयार हुई इस बहाने हर आयत पर नजर डालने का मौका मिला जिसमें कोई गलती नजर आई वह दुरुस्त कर दी ऐसी मुश्किल भी आई के कुछ आयतों का इकट्ठा नंबर था जैसे आयत नंबर 5:01 से 05:04 , लेकिन सॉफ्टवेयर की जरूरत में अलग-अलग नंबर डालना था तो उस आयत को कैसे अलग करूं, कहीं उर्दू के और दूसरे हिंदी के अनुवाद देखे उनकी रोशनी में उनको अलग अलग अलग नंबर दिया जब यह तैयार हो गया तो तब तक सॉफ्टवेयर वाले का इरादा बदल गया शायद उर्दू वालों कि हिंदी से नफरत और हिंदी वालों की उर्दू से नफरत का मामला था, उनके दोस्तों ने समझाया होगा के इस से हिंदी को बड़ा फायदा होगा अपनी दुश्मनी में यह ना सोचा कि यह जबान से ज्यादा कुरआन की बात है, मैंने भी यह सोचकर सब्र किया कि अल्लाह ने इनको यह दुरुस्त कराने का इनको बहाना बनाया था फाइल जो 7 महीने में तैयार हुई मैंने दो तीन जगह अपलोड कर दी थी और इेमेल से भी कुरआन चाहने वालों की दरखास्‍त पर भेजता रहा, यह फाइल तैयार हो गई थी जिसे किसी सॉफ्टवेयर में वेबसाइट में इस्तेमाल किया जा सके इसका सबसे अच्छा इस्तेमाल मुझे तंज़ील डॉट नेट में लगा उसके बाद मोबाइल ऐप में भी देखा, जिसके पास भी यह फाइल होगी वह इसमें किसी भी आयत सूरत नंबर को देख सकता है किसी भी विषय पर कुरआन में सारी आयतें एक साथ जमा कर सकता है, यूनिकोड में हुए इस कुरआन के किसी भी हिस्से को सैंकड़ों भाषाओं में अनुवाद कर सकते हें जैसे कि एक सवाल के जवाब में मैंने भी इस्तेमाल किया था एतराज किया गया था कि मां बाप के बारे में कुरआन में कोई खास बात नहीं , मैंने बाप सर्च में लिखकर ढूंढा तो बहुत सारी आयतें सामने आ गई वह उनको भेजी वह लाजवाब हो गए

शेरे मैसूर टीपू सुल्तान शहीद

sher e mesoor (Mysore) tipu sultan shaheed article in urdu here 
Image result for tipu sultanहिन्दुस्तानी तारीख आज़ादी का अज़ीम हीरो हैदर अली रियासत मैसूर के वज़ीर नंद राज का मुलाज़िम था, लेकिन अपनी ग़ैरमामूली शुजाअत, बुलंद हौसलगी और ख़ुदादाद ज़हानत से तरक़्क़ी के मदारिज तै करता हुआ एक दिन रियासत का हुक्मराँ बन गया। हैदर अली तालीमयाफ्ता नहीं था लेकिन वो एक बहतरीन सिपहसालार और ग़ैरमामूली तनज़ीमी सलाहियतों का मालिक था। हैदर अली 1761 में मैसूर पर क़ाबिज़ हुआ। रियासत के राजाओं की नाअहली और ऐश परस्ती ने रियासत को तबाह करके रख दिया था। हैदर अली को इक़तिदार सँभालते ही चारों तरफ़ से दुश्मनों की यलग़ार का सामना करना परा। एक तरफ़ हिन्दोस्तान में बहुत बड़ी ताक़त बन चुके साज़िशी अंग्रेज़ों से मुक़ाबला था तो दूसरी जानिब मरहटे और निज़ाम दक्कन से लड़ना पड़ रहा था। हैदर अली ने बड़ी हौश उसलूबी के साथ रियासत में अपने इक़तिदार को मज़बूत किया। इस के दौर-ए-हकूमत में रियासत के अवाम ख़ुशहाल हुए, वो एक सच्चा सैकूलर हुक्मराँ साबित हुआ, उस की सलतनत में हिंदूओं को भी ख़ूब तरक़्क़ी करने का मौक़ा मिला। इस के वुज़रा और आला ओहदों पर लायक़ हिंदू फ़ाइज़ थे। रियासत में हर तरफ़ क़ानून और इन्साफ़ की बालादस्ती क़ायम थी। हैदर अली अंग्रेज़ों की नियत को पहचान चुका था और उन्हें हिन्दोस्तान की आज़ादी के लिये ज़बरदस्त ख़तरा समझता था। अंग्रेज़ हैदर अली की बढ़ती हुई ताक़त से ख़ाइफ़ थे और उसे ख़त्म करने के दर पै थे लेकिन हैदर अली भी अंग्रेज़ लुटेरों से सरज़मीन-ए-वतन को पाक करने का अज़म कर चुका था।
1767 मैं अंग्रेज़ों के साथ उंगल (रियासत मैसूर) में जो ख़ौफ़नाक जंग शुरू हुई वो 2साल तक जारी रही। इस जंग में मरहटे और निज़ाम हैदर अली के साथ थे। 1769 मैं अंग्रेज़ों ने इस से सुलह कर लेना ही बेहतर समझा, दोनों जानिब से मक़बूज़ा इलाक़े एक दूसरे को वापिस कर दिए गए। लेकिन अंग्रेज़ों ने इस सुलह नामा का एहतिराम नहीं किया।780 मैं अंग्रेज़ों ने हैदर अली के इलाक़े माही पर हमला करके क़बज़ा करलिया। हैदर अली ने पूरी क़ुव्वत से अंग्रेज़ों पर फ़ौजकशी की, लेकिन इस्ट इंडिया कंपनी के चालाक तरीन सरबराह वार्न हसटनगज़ ने मरहट्टों और निज़ाम को वरग़ला कर मुल्क से दग़ा बाज़ी पर राज़ी कर लिया। हैदर अली इस हालत में भी बड़ी बहादुरी से वतन दुश्मनों का मुक़ाबला कर रहा था। अंग्रेज़ अपनी तमाम-तर साज़िशों और अपनी बेपनाह फ़ौजी ताक़त के बावजूद हैदर अली को शिकस्त देने में नाकाम रहे, इस दौरान एक जंग में हैदर अली बुरी तरह ज़ख़मी हुआ और चन्द् रोज़ बाद इंतिक़ाल कर गया।
हैदर अली हर लिहाज़ से एक लायक़ बहादुर और इंसाफ़ पसंद हुक्मराँ था, हिन्दुस्तानी तारीख में जिसका सानी दिखाई नहीं देता।782 मैं हैदर अली के इंतिक़ाल से अंग्रेज़ों के उखड़ते हुए क़दम जमने लगे, उन्हें हर महाज़ पर नीचा दिखाने वाला बहादुर दुनिया से जा चुका था। हैदर अली के इंतिक़ाल के बाद उस के लायक़ फ़र्ज़ंद फ़तह अली टीपू सुलतान ने हुकूमत की ज़िम्मेदारी संभाली।
 tipu sultan birth سلطان فتح علی خان ٹیپو
टीपू सुलतान की विलादत 1750 में हुई, तख़तनशीनी के वक़्त उस की उम्र 32साल की थी। टीपू सुलतान दीनी व दनयावी  उलूम से आरास्ता निहायत नेक किरदार, हक़ गो और बुलंद हौसला नौजवान था। वो अरबी फ़ारसी, उर्दू और कंट्टर ज़बानों के इलावा अंग्रेज़ी और फ़्रैंच में भी ख़ासी दस्तगाह रखता था। इस के साथ ही टीपू बहतरीन फ़ौजी तरबियत से आरास्ता था। दरअसल हिन्दुस्तानी तारीख का ये नामवर सपूत एक आला तरबियत याफ़ता ज़हन दिमाग़ का मालिक था, वो बहुत से अहम उलूम व फ़नोन से वाक़िफ़ था और हर मौज़ू पर माहिराना गुफ़्तगु कर सकता था। टीपू अगरचे उर्दू और कई ज़बानों का माहिर था लेकिन आम तौर पर फ़ारसी में ही बात चीत करता था। टीपू को साईंस, तिब्ब, इंजीनिरिंग, इलम नुजूम, मूसीक़ी और ख़त्ताती से बेहद लगाओ था। इस के अह्दे हुकूमत में सनअत, तिजारत, ज़राअत और दीगर शोबा हाय हयात में नुमायां इन्क़िलाबी तरक़्कीयां हुईं।
टीपू सुलतान ने अपने वालिद की क़ियादत में जिस बहादुरी और दानिशमंदी का सबूत अंग्रेज़ों के साथ होने वाली जंगों में दिया था इस से अंग्रेज़ इस से बुरी तरह ख़ौफ़ज़दा और फ़िक्रमंद थे। ये नौजवान हुक्मराँ अंग्रेज़ों की राह में एक मज़बूत चट्टान की तरह हाइल था। दरहक़ीक़त सुलतान हुब्ब-उल-व्तनी, क़ौमी ग़ैरत और रूह-ए-जिहाद का पीकर था। अंग्रेज़ क़ौम की सामराजी साज़िशों से नफ़रत उसे अपने वालिद से विरासत में मिली थी। टीपू सुलतान ने तख़तनशीनी के वक़्त इस तरह अपने ख़्यालात का इज़हार किया था: में ख़ुदा का एक हक़ीर बंदा हूँ, मेरी ज़िंदगी का भी कोई भरोसा नहीं लेकिन मेरा फ़र्ज़ है कि जब तक ज़िंदा रहूं, वतन की आज़ादी के लिये जिहाद करता रहूं, हज़ारों इन्सान वतन के लिये मौत के घाट उतर सकते हैं लेकिन वतन से मुहब्बत के जज़बात नहीं मिट सकते।

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Tareekh-E-Islam (3 Volumes) (Hindi) Hardcover

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Prophet Muhammad [SAW]`s Spiritual Era to Sahaba-e-Karam[Companion of Prophet Muhammad] [SAW] and their after,the entire Islamic Countries`s truth history ” written by Renownend Author Hazrat Maulana Akbar Shah Najeebabadi and also written its in enlighten and Standard Histories and Ahadith [ The Statements of Prophet Muhammed [SAW] ]. The More than lakhs Copies of this Grand and Sacred Book have been distributed in entire the World in Urdu language. The first time,it has been Published in Hindi Language.
अंग्रेज़ क़ौम ने अपनी साम्राजियत की तारीख में टीपू सुलतान से ज़्यादा और किसी को इतने ख़ौफ़ दहश्त और नफ़रत का मर्कज़ नहीं बनाया। अंग्रेज़ उस नौजवान सरबराह रियासत की लियाकत और शुजाअत को समझ चुके थे, उन्हें यक़ीन हो गया था कि टीपू सुलतान की मौजूदगी में हिन्दोस्तान पर पूरी तरह तसल्लुत जमा लेना उनके लिये नामुमकिन है। अंग्रेज़ टीपू से किस क़दर ख़ौफ़-ज़दा थे,उस का अंदाज़ा गवर्नर जनरल लार्ड कार्नवालिस के इस ख़त से ब-आसानी हो जाता है जो उसने हैदर अली की वफ़ात और टीपू सुलतान के इक़तिदार सँभालने के बाद मद्रास के गवर्नर को तहरीर कियाथा:
इस मुल्क (हिन्दोस्तान) में अपनी इज़्ज़त और साख क़ायम रखने के लिये लाज़िमी है कि हम टीपू सुलतान से फैसला कुन जंग करें। इस मौक़ा से फ़ायदा उठाते हुए हमें ना सिर्फ टीपू सुलतान के ख़िलाफ़ लड़ना चाहिए बल्कि इस ताक़त को हमेशा के लिये मिटा देना चाहिए। मौजूदा वक़्त से बेहतर कोई वक़्त नहीं हो सकता मलिक की दूसरी ताकतें हमारे साथ हैं(निज़ाम और मरहटे वगैरह)अगर टीपू को आज़ाद छोड़ दिया जाये और फ़्रांस इस हालत में आजाए कि टीपू की मदद करसके तो इस सूरत में हमें हमेशा के लिये हिन्दोस्तान को ख़ैर बाद कहना होगा।
ड्यूक आफ़ वलज़ली जोसना 1796में हिन्दोस्तान आया था, अपनी याददाश्त में लिखता है:
जब से में आया हूँ, देख रहा हूँ कि टीपू अंग्रेज़ों के लिये मुस्तक़िल हवा बना हुआहै अंग्रेज़ जब किसी को ख़ौफ़ज़दा करना चाहते हैं तो कहते हैं टीपू सुलतान की फ़ौज चल पड़ी है।
इस दौर में टीपू सुलतान की बहादुरी, दूर अंदेशी और हिक्मत-ए-अमली से अंग्रेज़ हिन्दोस्तान में ही नहीं, इंग्लैंड में भी इस के नाम से हिरासाँ थे। अंग्रेज़ों की औरतें अपने बच्चों को टीपू का नाम लेकर डराया करती थीं। सन 1792में अंग्रेज़ों ने मरहट्टों और निज़ाम को मिला कर टीपू पर ज़बरदस्त हमला किया ओ रास की सलतनत के तकरीबन आधे इलाक़े पर क़बज़ा करके आपस में बांट लिया। ये शिकस्त सुलतान के लिये ज़बरदस्त अज़िय्यत और ज़िल्लत का बाइस थी जब उसे हर तरफ़ से दुश्मनों ने घेर कर इस पर तीन करोड़ तावान जंग लगाया जिस में से एक करोड़ फ़ील-फ़ौर वसूल कर लिया गया और बाक़ी रक़म की अदाएगी के लिये दो साल की मीआद मुक़र्रर की गई। इस के साथ ही ज़मानत के तो रपर सुलतान के दो कम-सिन शहज़ादों को अंग्रेज़ों के पास यरग़माल रखने की शर्मनाक शर्त रखी गई। ये ज़िल्लत आमेज़ मुआहिदा 23फरवरी 1792को लिखा गया।कंपनी के गवर्नर जनरल लार्ड कार्नवालिस का ख़्याल था कि इसी सूरत में जब कि टीपू की बच्ची-कुची रियासत को बुरी तरह नुक़्सान पहुंचा है वो मुक़र्ररा वक़्त में ये रक़म नहीं अदा करसकेगा, इस तरह आसानी से वो उस के इलाक़ा पर क़ाबिज़ हो जाएगीगा लेकिन मग़रिबी मौरर्ख़ीन भी ये तस्लीम करते हैं कि अपनी इस नाकामी से शेर दिल सुलतान मायूस नहीं हुआ इस ने पूरी हिम्मत और हौसले के साथ ना सिर्फ अपनी रियासत के हालत सुधार य बल्कि मुक़र्ररा वक़्त पर ज़र तावान भी अदा करके अपने बच्चों को वापिस ले लिया। उसने ज़राअत, कारोबार, सनअत और दूसरे शोबों की तरक़्क़ी के लिये इस तरह के अमली इक़दामात किये कि सलतनत की हालत सुधर गई।
दुश्मन ताक़तों से जो अमन का मुआहिदा हो चुका था टीपू सुलतान ने इस का पूरी तरह एहतिराम किया, लेकिन अंग्रेज़ देख रहे थे कि टीपू सुलतान तेज़ी से अपनी हालत सुधारता जा रहा है। लार्ड वेल्ज़ ली ने इस ज़माने में जो ख़ुतूत लिखे थे उन में सुलतान की तरफ़ से ज़बरदस्त ख़तरे का एहसास ज़ाहिर किया है।
निज़ाम और मरहट्टा सरबराह पेशवा को अपनी साज़िश के जाल में जकड़ने के बाद अंग्रेज़ों ने टीपू सुलतान को कुचल डालने की तय्यारी शुरू कर दी। सुलतान पर हमला करने के लिये इस पर ये झूटा इल्ज़ाम आइद कियागया कि वो फ्रांसिसियों से साज़-बाज़ कर रहा है और उनसे मिलकर अंग्रेज़ों पर हमला करने वाला है।इल्ज़ाम में कहा गया कि मारे शश में फ्रांसीसों ने एक ऐलान शाय किया है कि जिसके मुताबिक़ टीपू सुलतान ने वहां अपनी सिफ़ारत भेज कर फ्रांसीसों की मदद हासिल करने की कोशिश की है। अंग्रेज़ों ने इस इल्ज़ाम के बारे में सुलतान से बात चीत करने के बजाय इस पर फैसला कुन हमले की तय्यारी शुरू कर दी। टीपू सुलतान ने कई बार निज़ाम और मरहट्टों की ग़ैरत को जगाने की कोशिश की यहां तक कि निज़ाम के साथ रिश्तेदारी क़ायम करने तक की पेशकश की लेकिन उनके ज़मीर सो चुके थे उन्होंने अंग्रेज़ की गु़लामी का तौक़ मुआहिदों की सूरत में पहले ही पहन लिया था। सुलतान ने दिल्ली के बादशाह शाह-आलम सानी को भी एक ख़त इरसाल किया थाजिस में वतन की आज़ादी और दीन-ए-इस्लाम की सर-बुलंदी के लिये उस की जंग में तआवुन की अपील की गई थी, लेकिन शाह-आलम तो इस्ट इंडिया कंपनी के हाथों बिक चुका था,वो क्या मदद कर सकता था। तारीख शाहिद है कि सुलतान ने अंग्रेज़ों की लानत से इस मुल्क को हमेशा के लिये आज़ाद कराने के लिये अफ़्ग़ानिस्तान, तुर्की और बिलाद अरबिया के बिशमोल कई इस्लामी ममालिक से मदद की अपील की लेकिन कहीं से कोई मुसबत जवाब नहीं मिला और वतन पर मर्रमिटने की आरज़ू रखने वाला ये मर्द मुजाहिद तन्हा दुश्मनाँ-ए-वतन का पूरी पामर्दी से मुक़ाबला करता रहा।
 Tipu Sultan: Mahan Deshbhakt
लार्ड वेल्ज़ ली एक तरफ़ तो टीपू पर ज़बरदस्त हमले की त्यारियां कर रहा था दूसरी तरफ़ उसे धोके में रखने के लिये दोस्ती का हाथ भी बढ़ा रहा था।एक मक़बूज़ा इलाक़ा बाई नादसलतान को लौटा कर उसे यक़ीन दिला दिया कि अंग्रेज़ अमन मुआहिदे के पाबंद हैं। इसी दौरान शुमाली मिस्र में जनरल निकल्सन की क़ियादत में बर्तानवी अफ़्वाज ने फ़्रांस का बहरी बेड़ा पूरी तरह बर्बाद कर दिया, उस के बाद फ्रांसीसियों की जानिब से किसी तरह की मदद टीपू सुलतान को मिलने का सवाल ना था।टीपू को मज़ीद धोके में रखने के लिये इस पर दबाओ डाला गया कि एक अंग्रेज़ अफ़्सर मेजर डगलस सुलतान के दरबार में भेजा जाएगा ताकि जिन इलाक़ों की कंपनी को ज़रूरत है वो इस से मांग लिये जाएं, ये एक तरह से सुलतान के साथ छेड़खानी की शुरूआत थी। मुआहिदा अमन जो टीपू सुलतान ने अंग्रेज़ों, मरहट्टों और निज़ाम के साथ कियाथा इस पर वो पूरी तरह कारबंद रहा, उसने कई बार अंग्रेज़ों को अपनी जानिब से कोई इसी कार्रवाई ना करने का यक़ीन भी दिलाया जिससे मुआहिदे की ख़िलाफ़वरज़ी होती हो,लेकिन अनगरेज़तवेआ तै कर चुके थे कि अपने लिये इस सबसे बड़े ख़तरे को मिटा कर ही दम लेंगे। बर्तानवी अफ़्वाज कलकत्ता से चल कर मद्रास में जमा हो गईं ख़ुद लार्ड वेल्ज़ ली इस जंग में शामिल होने के लिये कलकत्ता से मद्रास पहुंच गया।जनवरी 1799को टीपू सुलतान को एक गुस्ताख़ाना पैग़ाम भेजा गया कि वो अपने तमाम साहिली इलाक़े और बंदर गाहैं 24घंटे के अंदर बर्तानवी फ़ौज के हवाले कर दे।इस धमकी आमेज़ पैग़ाम के बाद सुलतान को पूरी तरह ये एहसास होगया कि दग़ाबाज़ अंग्रेज़ क़ौम के लिये सयासी अख़लाक़ीयात और मुआहिदों की पासदारी कोई मअनी नहीं रखती जब कि हिंदूस्तानियों ने हमेशा दोस्ताना मुआहिदों का एहतिराम किया है।
टीपू सुलतान की ग़ैरत-ए-अमानी जोश में आ गई और उसने मज़ीद झुकने के बजाय मैदान-ए-जंग में फैसला करने को तरजीह दी। उसने ऐलान किया कि
शेर की एक दिन की ज़िंदगी गीदड़ की हज़ार दिन की ज़िंदगी से बेहतर है।
और फिर एक दिन हमला-आवर फ़ौज के साथ ख़ौफ़नाक जंग हुई। सुलतान अपने जाँबाज़ सिपाहियों के साथ ज़ख़मी शेर की तरह बर्तानवी फ़ौजों पर टूट परा। सुलतानी फ़ौज की ये यलग़ार बहुत शदीद थी अंग्रेज़ों के पांव उखड़ने लगे। सुलतान ने अपने एक मोतमिद सिपहसालार को अपने दस्ते के साथ आगे बढ़कर दुश्मन को तबाह करदेने का हुक्म दिया लेकिन ये सरदार क़मर अलुद्दीन ख़ान अंग्रेज़ों के हाथ अपनी ग़ैरत, हमियत और अमान का सौदा कर चुका था, उसने अपने सवारों को आगे बढ़ाया लेकिन फिर वो उस के हुक्म पर पलटे और ख़ुद सुलतान की फ़ौज पर ही टूट परे, क़मर उद्दीन ख़ां की इस ग़द्दारी से सुलतानी क़ौम को पसपा होना पड़ा और अंग्रेज़ों ने एक तरह से इस मार्का में फ़तह हासिल करली।
अभी टीपू सुलतान सँभल भी नहीं पाया था कि उसे मालूम हुआ कि अंग्रेज़ों की दूसरी फ़ौज जनरल असटेवरट की क़ियादत में बढ़ी चली आरही है। इस फ़ौज को मैसूर पहुंचने से पहले ही रोक देने की ग़रज़ से सुलतानी लश्कर ने कोच किया, दो दिन के मुसलसल सफ़र के बाद तेज़ी से आरही अंग्रेज़ फ़ौज को जालिया और इस पर ऐसा ज़बरदस्त हमला किया कि अंग्रेज़ सिपाही ठहर ना सके, उनके बहुत से सिपाही और अफ़्सर हलाक हुए। अंग्रेज़ी फ़ौज के बहुत से सिपाही भाग कर जंगलों में जाछपे। टीपू सुलतान की तलवार अंग्रेज़ों पर क़हर बन कर गिरी थी। सुलतान के जासूसों ने इत्तिला दी थी कि शिकस्त ख़ूर्दा अंग्रेज़ सिपाही अब लड़ना नहीं चाहते।टीपू सुलतान अपनी फ़ातिह फ़ौज के साथ सिरी रंगा पटनम की तरफ़ रवाना होगया।ख़बर आचुकी थी कि जनरल हारिस शहर की तरफ़ बढ़ रहा है। सुलतानी फ़ौज सिरी रंगा पटनम के क़िले में पहुंच गई। जनरल हारिस की फ़ौजों ने शहर और क़िले पर आग और तोप के गोले बरसाने शुरू कर दिए। टीपू की फ़ौज में इस के इंतिहाई बाएतिमाद वज़ीर पूर्णिया पण्डित और मीर सादिक़ जैसे ग़द्दारों की खु़फ़ीया साज़िशें जारी थीं। क़िले पर आग बरस रही थी ओरला तादाद ज़िंदगियां उस की नज़र हो रही थीं इसे मैं सुलतान से इस के कुछ ख़ास मुशीरों ने कहा कि वो सर-निगूँ की राह से क़िले से फ़रार हो जाएगी और बाहर रह कर अंग्रेज़ों से मुसालहत की कोशिश करे, लेकिन अब पीछे हटना सुलतान के अमानी जज़बे और वतनी ग़ैरत के मुनाफ़ी था,सुलतान ने तो आख़िरी वक़्त तक अंग्रेज़ों से मुक़ाबला करने की क़सम खाई थी।
4मई 1799की सुबह जब सुलतान फ़ज्र की नमाज़ से फ़ारिग़ हुआ तो इस को मुशीरों ने फिर ये मश्वरा दिया कि इस नाज़ुक वक़्त में जब कि अंग्रेज़ी फ़ौजों ने क़िले को पूरी तरह नर्ग़े में ले लिया है, आप इस नाज़ुक वक़्त में अपने बच्चों को यतीम होने से बचाने के लिये अंग्रेज़ों से मुसालहत की कोशिश करें। सुलतान ने ये बात सुनकर कहा:
ये मुल़्क ख़ुदादाद हमारी रेत और बिलख़सूस मुस्लमानों की मिल्कियत है। हमने अपने वतन अज़ीज़ की हिफ़ाज़त के लिये मुसलसल कोशिश की है,मैं जानता हूँ कि मेरे ग़द्दार वुज़रा और आफ़िसरान उस की तबाही में लगे रहे, अब वो अपनी ग़द्दारी और बदआमाली का मज़ा चखेंगे। जहां तक मेरी ज़ात का सवाल है में अपनी जान माल,ऑल वावलाद को अपने दीन पर क़ुर्बान करचुका, इन्सान को सिर्फ एक बार मौत आती है, मौत से ख़ौफ़ज़दा होना बेमानी है।
सिरी रंगा पटनम के क़िले में महताब बाग़ का मोरचा बेहद अहम था जहां सुलतान का निहायत वफ़ादार और बहादुर अफ़्सर सय्यद गुफा रापने जानिसारों के साथ तैनात था। ये यक़ीन के साथ समझा जाता था कि सय्यद ग़फ़्फ़ार जैसे सिपहसालार की मौजूदगी में अंग्रेज़ फ़ौजों की कामयाबी मुम्किन नहीं है, इस लिये सुलतान के नमक-हराम वज़ीर मीर सादिक़ और इस के साज़िशी साथियों ने सय्यद ग़फ़्फ़ार को किसी तरह वहां से हटवा कर क़तल करा दिया और ग़द्दार सिपाहियों ने महताब बाग़ का दरवाज़ा खोल दिया। अंग्रेज़ी फ़ौज क़िले में दाख़िल हो गई। वो दोपहर का वक़्त था। सुलतान ख़ास्सा तनावुल करने बैठा था, अभी पहला लुक़मा उठाया ही था कि इस को सय्यद ग़फ़्फ़ार की शहादत और क़िले का दरवाज़ा खुलने की ख़बर मिली। सुलतान शहादत की राह पर आगे बढ़ने के लिये उठ खड़ा हुआ, उस के वफ़ादार सिपाही साथ थे। सुलतान ने हथियार सँभाले, घोड़े पर सवार हो और दूसरे दरवाज़े से बाहर निकल कर अंग्रेज़ हमला आवरों के लश्कर-ए-जर्रार से जा भिड़ा। सुलतान ने बड़ी दिलेरी के साथ जंग की और दुश्मनों की लाशों के ढेर लगा दिए। चूँकि अंग्रेज़ी सिपाह की तादाद बहुत ज़्यादा थी इस लिये उसने पीछे हट कर क़िले में दाख़िल होने की कोशिश की लेकिन नमक-हराम मीर सादिक़ ने वो दरवाज़ा ही बंद करादिया जिससे सुलतान बाहर निकला था। अब ज़िंदगी और मौत के फैसले के सिवा कोई चारा ना रहा। शेर ने पलट कर ज़ालिम अंग्रेज़ों पर हमला किया,वो दोपहर से मुसलसल लड़ रहा था, ज़ख़मी भी हो चुका था, उसे कई गोलियां लग चुकी थीं,अब दिन ढल रहाथा, सुलतान प्यास से बेहाल था, उसने अपने ख़ादिम राजा ख़ान से पानी मांगा, लेकिन वो कम्बख़्त भी ग़द्दारों के साथ मिल चुका था, उस के पास मश्कीज़े में पानी था लेकिन उसने इसी तरह शिक़ावत का मुज़ाहरा किया जैसे हज़रत इमाम हसेनओ के साथ यज़ीदियों ने कर्बला के मैदान में कियाथा। तभी दुश्मन की एक गोली सुलतान का सीना चीर गई, ज़ख़मी शेर ज़मीन पर गिर गया लेकिन वो शेर दिल इस हालत में भी जल्दी से उठ खड़ा हुआ उस की तलवार अब भी हाथ में थी, ख़ून में नहाते हुए इस ज़ख़मी मुजाहिद ने झपट कर हमला किया और कई अंग्रेज़ों को जहन्नुम रसीद कर दिया। दुश्मनों ने इस पर गोलियों की बौछार कर दी, एक गोली कपनटी पर लगी और आज़ादे-ए-वतन का ये जाँबाज़ मुजाहिद शहादत के मर्तबे पर फ़ाइज़ होगया। मलिक को आज़ाद कराने वाली तलवार गुम हो गई जैसा कि एक शायर ने शमशीर गुम शुदके अलफ़ाज़ से शहादत की तारीख के आदाद बरामद किये हैं।
ग़द्दार मीर सादिक़ का अंजाम ये हुआ कि सुलतान की शहादत से क़बल वो एक खिड़की से बाहर निकल जाना चाहताथा कि सुलतान के एक वफ़ादार दिल-सोख़्ता सिपाही ने इस से कहा, मर्दूद अपने आक़ा को फंसवा कर कहाँ जाता है। ये कह कर तलवार से इस का काम तमाम कर दिया।
टीपू सुलतान की शहादत अंग्रेज़ों के लिये सबसे बड़ी कामयाबी थी, टीपू सुलतान की शहादत की ख़बर पाकर जनरल हारिस ने बेहद मअनी ख़ेज़ नारा लगाया था। अब हिन्दोस्तान हमारा है।
मैसूर की आबादी अक्सरियत में हिंदू थी। हिंदूओं के साथ टीपू सुलतान के दौर-ए-इक्तदार में कहीं भी नाज़ेबा और गैर मुंसिफ़ाना बरताव किया गया हो उस का कोई सबूत नहीं मिलता,उस के बरअक्स अपनी हिंदू रियाया के साथ उस के मुहब्बत आमेज़ रोये की सैकड़ों मिसालें मौजूद हैं। टीपू सुलतान के दरबार में आख़िर तक आला तरीन ओहदे हिंदूओं को मिले हुए थे, पूर्णिया पण्डित टीपू का वज़ीर आज़म था, कृष्ण राउ भी वज़ीर था। इन दोनों का दरबार में बेहद असर और दबदबा क़ायम था। टीपू के दरबार में सिफ़ारतों और नक़ीबों का काम करने के लिये बहुत से ब्रहमन मुक़र्रर थे। दरबार में पुजारियों और ज्योतिषियों को ख़ास अहमियत हासिल थी। शरनगेरी मठ के शंकर अचार्य स्वामी सच्चिदानंद शास्त्री से टीपू को ख़ास अक़ीदत थी, शंकर अचार्य के नाम उस के 30से ज़ाइद ख़ुतूत मौजूद हैं जिनसे टीपू सुलतान की आचार्य से दोस्ती और मुहब्बत का पता चलता है। टीपू सुलतान रासिख़ उल-अक़ीदा मुस्लमान था लेकिन अपनी क़लमरू में उसने मुतअद्दिद मंदिरों को बड़ी बड़ी जागीरें दें जिन में ननजम गड्डा, सिरी रंगा पटनम और मेलकोट के मंदिर शामिल हैं बैंगलौर में टीपू सुलतान के ज़नाना महल केएन सामने सिरी वेंकटरामन का मंदिर और महलात बिलकुल मिले हुए हेंेआ मशहूर और क़दीम मुनादिर सुलतान की मज़हबी रवादारी के शाहिद हैं।
शहीद वतन टीपू सुलतान ने अपनी सलतनत में अदल वमसावात का पर्चम बुलंद किया। जागीरदारी का ख़ातमा किया और मुल्क को इक़तिसादी तौर पर इस तरह ख़ुशहाल कर दिया कि वो दुनिया का अज़ीम मुदब्बिर हुक्मराँ बन गया। टीपू सुलतान की हुकूमत के बारे में बर्तानवी पार्ल्यमंट के एक मैंबर ने लिखा था। मैसूर हिन्दोस्तान में सबसे ज़्यादा सरसब्ज़ इलाक़ा है। यहां टीपू की हुक्मरानी है, मैसूर के बाशिंदे हिन्दोस्तान में सबसे ज़्यादा ख़ुशहाल हैं।
सुलतान टीपू ने रियाया की बहबूदी के लिये बैंक खोले जिससे छोटे सरमाया कारों को ज़्यादा मुनाफ़ा मिलता था।बैंकों के मातहत ज़रूरियात ज़िंदगी की दुकानें खोली गई थीं, टीपू सुलतान ने तिजारत के फ़रोग़ के लिये हर मुम्किन तरीका इख़तियार किया। रियासत में पुलिस का माक़ूल बंद-ओ-बस्त था। जिस अफ़्सर के इलाक़े में कोई वारदात होती उस का ज़िम्मेदार वो पुलिस अफ़्सर होता था अगर वो मुल्ज़िम का सुराग़ ना लगा सकता तो तावान का ज़िम्मेदार क़रार पाता था।सुलतान ने हिन्दोस्तान में पहली बार बहरी फ़ौज क़ायम करने की कोशिश की और हर्बी आलात बनाने के शानदार कारख़ाने क़ायम किये, जंग में राकेट इस्तिमाल करने का तसव्वुर सुलतान ने सबसे पहले पेश किया।
हिन्दोस्तान की तारीख-ए-आज़ादी कुर्बानियों से भरी हुई है। हर मज़हब वमलत के मुजाहिदीन ने बड़े बड़े कारनामे अंजाम दिये हैं लेकिन शहीद-ए-वतन टीपू सुलतान जैसा लायक़ हुक्मराँ और सरफ़रोश मुजाहिद आज़ादी किसी और हिन्दुस्तानी क़ौम ने आज तक पैदा नहीं किया।
ARTICLE WITH THANKS BOOK  ”Fakhre Watan” (Hindi) Hardcover

History of Indian Muslim Freedom Fighters

‘‘टीपू
book: इतिहास के साथ यह अन्याय!! प्रो. बी. एन. पाण्डेय–:भूतपूर्व राज्यपाल उडीसा एवं इतिहासकार उडीसा के भूतपूर्व राज्यपाल, राज्यसभा के सदस्य और इतिहासकार प्रो. विश्म्भरनाथ पाण्डेय ने अपने अभिभाषण और लेखन में उन ऐतिहासिक तथ्यों और वृतांतों को उजागर किया है, जिनसे भली-भांति स्पष्ट हो जाता है कि इतिहास को मनमाने ढंग से तोडा-मरोडा गया है। टीपु सुलतान

”एक मुजाहिद मेमार : मौलाना रहमतुल्लाह कैरानवीi” Book in hindi unicode and PDF

मौलाना रहमतुल्लाह कैरानवी मुख़्तसर तज़करा – मुजाहिद-ए-आज़म पायये हरमैन शरीफैन इमामुल मुनाज़रीन हज़रत अल्लामा मौलाना रहमतुल्लाह साहब कैरानवी रह. बानीये दारूल उलूम हरम मदरसा सौलतिया मक्का मोअज़्ज़मा

अज़ः हज़रत मौलाना मुहम्मद सलीम साहब रह.

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हिन्दी रूपान्तरः हाजी मौलाना मास्टर शमसुल इस्लाम मज़ाहिरी

एहतिमामः मौहम्मद उमर कैरानवी

1. तमहीद 2. दारूल उलूम हरम सौलतिया 3. डाक्टर वजीर खाँ 4. कस्बा कैराना 5. हजरत मौलाना रहमतुल्लाह साहब रह. का नसब नामा (कुल, गोत्रा) 6. हिन्दुस्तान में उस्मानियों की आमद 7. हकीम बीना 8. फरमान जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर बादशाह 9. नवाब मुक़र्रब खाँ 10. नौलखा जमीन, तालाब, कसौटी, नवाब दरवाजा 11. अकबराबाद-आगरा में मुनाजिरे का पहला  इजलास 12. तस्नीफ  और तालीफ 13. इन्कलाब सन 1857ई. 14. रहमतुल्लाह बेतुल्लाह  में 15. कुस्तुन्तीनिया से सुलतान की तलबी 16. सौलतुन्निसा बेगम
17. मदरसा सौलतिया 18. मदरसे के अगराज व मकासिद 19. मदरसा सौलतिया का मसलक 20. कुस्तुन्तीनिया का दूसरा सफर
21. नहर जुबैदा 22. कुस्तुन्तीनिया का तीसरा सफर 23. इमारते मदरसा 24. मक्का मोअज़्ज़मा में
25. हजरत मौलाना मरहूम के तलामिजा 26. मदरसा सौलतिया के तालीम याफ्ता तलबा 27. ‘‘दारूल उलूम हरम सौलतिया’’ के अबनाये कदीम 28. वफात हसरते आयात 29. रहमतुल्लाह अला रहमतिल्लाह 30. कता-ए-तारीख वफात
बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम – तमहीद
हिन्दुस्तान में इन्क़लाब 1857 के बाद मुजाहिदीन के एक मुकद्दस काफिले ने तर्के वतन करके काबये इस्लाम का रूख किया। इस कारवाँ का सरगिरोह मिल्लते इस्लामिया का वह मेमार था जिसने मरकजे इस्लाम में पहुँचकर इस्लामी दुनिया के लिये एक अहम मरकजी जरूरत को अपनी खुदा दाद दूर अन्देशी और ईमानी बसीरत से महसूस किया और अरज़े हरम पर आज से अस्सी साल कब्ल एक आला तामीरी मकसद की इब्तदा की। कुदरत की गैबी ताईद इस जलीलुलकदर शख्सीयत के मुबारक इरादों के साथ थी। इस लिये खुलूस और लिल्लाहियत के वह पाइन्दा आसार काबा के ज़ेरे साया उस्तवार हुये और यह कारनामा एक अजीमुश्शान कारेखैर की हैसियत से उस ऊलुलअज्म, ‘‘मुजाहिद मेमार’’ की इस्लामी गैरत, हमियत और अमली कुर्बानियों की यादगार साबित हुआ।
इस्लामी दुनिया के तूल और अर्ज़ में यह जानने वाले कुछ कम नही कि
दारूल उलूम हरम सौलतिया
सरज़मीन हरम पर काबे के जेरसाया आप का एक मजहबी और इल्मी सर चश्माए फैज है और मक्का मोअज्जमा में ’’इस्लामी दुनिया से आने वाले शाईकीने इल्म का एक अस्सी साला मर्कज़ है जो आप के नाम से दुनिया में मशहूर है। मगर बानीये मदरसा, फखरूल उलमा, मुजाहिदे इस्लाम ‘‘पायाए हरमैन शरीफैन’’ हजरत मौलाना मुहम्मद रहमतुल्लाह साहब कैरानवी रह0 की जाते ग्रामी ग़ैर मामूली शख्सीयत इल्मी खिदमात, इस्लाम और मुसलमानों के लिये उन की यादगारे ज़माना कुर्बानियों से मौजूदा दौर का नया तब्क़ा आम तौर पर नावाकिफ़ है। दारूल उलूम हरम सौलतिया की मर्कजी अहमियत का हकीकतन ताल्लुक इस के बानी और दाईये अव्वल की तारीख़े हयात से है। माहे रजब सन 1370हि0 के माहनामा ’निदाये हरम’ में इस ‘‘जिक्रे कोहन’’के मुतअल्लिक जो अहम मवाद शाये हुआ है उसका बेशतर हिस्सा इस ‘‘मजमूए’’ में आप के पेशे नज़र है, जिस के मुताले से गुजिश्ता सदी के कुछ तारीखी वाकिआत और हालात की एक झलक आप के सामने आजायेगी। वस्सलाम:-
मुहम्मद सलीम  अफिया अन्हु
नाजिम
दारूल उलूम हरम, मदरसा सौलतिया मक्का मोअज़्ज़मा
10 शव्वाल 1371 हि0,  2 जौलाई 1952 ई0
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हिन्दी संस्करण में
कुछ मेरी तरफ सेः
यह पुस्तक ‘‘एक मुजाहिद मेमार’’ उर्दू का हिन्दी रूपान्तर है। तैयारी के दौरानŸ˜ŸŽ के लिए मेमार, मे‘मार, मैमार शब्द भी हमें ठीक लगे जबकि हिन्दी शब्दकोष में मेअमार लिखा है। फंडर लिखें या फन्डर, मौहम्मद लिखें जोकि रायज है या मुहम्मद जैसी बातें सामने आती रहीं।
हिन्द में अक्सर उर्दू बोलते और हिन्दी में लिखते हैं। उर्दू पढने वाले नहीं रहे तो हिन्दी समझने वाले भी नहीं रहे। ऐसे समय में ही यह किताब मौजूदा जरूरत के पेशे नज़र हिन्दी में तैयार की गयी। फिर मेमार मुजाहिद को योधा श्रष्टा लिखने में वह बात कहाँ। उम्मीद है नतीजा अच्छा रहेगा।
उमर कैरानवी
 30 सितम्बर 2005
हामिदँव व मुसल्लियन
हिन्दुस्तान (कदीम) में इस्लाम की फतह व नुसरत का सद साला जिक्रे खैर मुसलमानाने पाकिस्तान और हिन्द की मज़हबी तारीख का एक अहम बाब
गुजिश्ता सदी का माहे रजब सन 1270 हि0 मुसलमानाने हिन्द व पाकिस्तान की मजहबी तारीख में एक खास अहमियत रखता है जिसमें मुसलमानों को अल्लाहताला ने मगरबी कुव्वत व इकतिदार और ईसाइय्यत के गल्बये तसल्लुत के बावजूद अज़ीमुश्शान फतह और नुसरत अता फरमायी।
जमाना बदल चुका, ख्यालात और रूज्हानात में ग़ैर मामूली इन्कलाब रूनुमा है। सियासी पेचीदगियाँ और हंगामा आरााई, मआशी मुशकिलात, बाहमी तफरीक और इखतिलाफ के इस दौर में यह फरसूदा बयानी बजाहिर बेवक्त की रागनी है। दिमागी बे एतदाली और बर्क रफतारी के साथ दुनिया एक नामालूम सिम्त की तरफ जा रही है। इस भाग दौड में किसे फुर्सत है कि वह मुड कर पीछे देखे और मौजूदा नस्ल किसी जिक्रे कोहन को सुनने के लिये तैयार हो मगर तारीख का नाम जब तक दुनिया में जिन्दा है और जिन्दा क़ौमें अपनी मजहबी और कौमी तारीख और शान्दार कारनामों को जब तक अपना सरमायाए हयात समझती रहेंगी उस वक़्त तक हर पुरानी याद और पुराना तज़करा, गुजरे हुये हालात और वाकिआत मनस्सए शहूद पर किसी न किसी उनवान से जरूर आते रहेंगे।
दुनिया गहवारहए इन्कलाब है। हिन्दुस्तान कदीम में ईस्ट इन्डिया कम्पनी के इकतिदार के हमदोश मजहबे ईसवी ने भी फरूग हासिल किया और हर मुमकिन सूरत से इस मगलूब मुल्क को मजहबी हैसियत से भी फतह करने की हर मुमकिन कोशिश की गयी। कम्पनी की ताईद और इआनत से मजहब मसीही की तन्ज़ीम और तरक्की अमल में आती रही। मुल्क के तूल और अर्ज मंें हर जगह इस तन्ज़ीम के आसार कायम किये गये। चर्च मिशन, सोसाइटी, बाईबल सोसाइटी, मिशन फँड, मिशन हस्पताल, मिशन कालिज और मदारिस जाबजा कायम हुये। मजहबी किताबों और अखबारात और रसायल की इशाअत के जर्ये अवाम के रूजहानात और अक़ायद को बदलने की मुहिम जारी की गयी। यह सिर्फ मजहबी जद्दोजहद न थी बल्कि खुद हकूमत (कम्पनी) की मुल्की सियासत और अमली ताईद भी शरीक थी। मिशनरियों को माली इमदाद दी जाती थी और मुमताज हुक्काम उन की हर मुमकिन सर परस्ती को अपना फर्जे मनसबी समझते थे। हुक्कामे वक़्त का असर व रूसूख कोई मामूली चीज नहीं। इस लिये मसीही तहरीक को यहाँ तक तक़वीयत पहुँच चुकी थी कि जब देहली में सन 1857ई0 में ‘‘ओहद-ए-बिश्प’’ कायम करने का सवाल पैदा हुआ तो उस वक्त यह तजवीज भी मद्देनजर थी कि जामा मस्जिद देहली को गृजा बना दिया जाये। इस सूरत हाल का नागुजीर असर था कि हिन्द कदीम में खासतौर पर मुसलमानों को अंग्रेज़ी हकूमत से नफरत पैदा होगई और मसीहीयत की इशाअत में कुव्वत और सियासी इक़तदारे आला से काम लेने की बिना पर मज़हबी मुदाफअत की अहम जरूरत पेश आयी। इस्लाम की सदाक़त और हक्कानियत के खिलाफ जो साजिश की जा रही थी उस पर रब्बानी उलमा कब सब्र और सुकूत कर सकते थे। इस दौर के वह मुजाहिद उलमा जिन्होंने र्जुअत और हिम्मत से काम लेकर हिन्दुस्तान कदीम के मुसलमानों को फितनये मसीहियत की मुसीबत और बला से निजात दिलायी, उन के मुतआल्लिक मौलाना हाली मरहूम फरमाते हैंः
‘‘हिन्दुस्तान में इस्लाम खतरों में घिरा हुआ था। एक तरफ मिशन्री घात में लगे हुये थे। अगरचे क़ेहत के दौरान में उनको दुबला पतला शिकार पेट भराव मिल जाता था मगर वह उस पर क़ाने न थे और हमेशा सेदे फरबह की तलाश में रहते थे। हिन्दुस्तान में सबसे ज्यादा दान्त उनका मुसलमानों पर था इसलिये उनकी मनादियोें में, उनके अखबारों में, उनके रिसालों में ज्यादा तर बौछार इस्लाम पर होती थी। इस्लाम की तालीम की तरह तरह से बुराईयाँ जाहिर करते थे। बानिये इस्लाम के अख़्लाक और आदात पर अनवाओ अक्साम की नुक्ताचीनियाँ करते थे। बहुत से मुसलमान कुछ नावाकफियत और बेइल्मी के सबब और अक्सर इफलास के सबब उनके दाम में आ गये। इस खतरे से बिलाशुबा अुलमाऐ इस्लाम जैसे मौलाना आले हसन, मौलाना रहमतुल्लाह साहब मरहूम और डा0 वजीर खाँ वगैरा मुतनब्बेह हुए। उन्होंने मुतअद्दिद किताबें इसाईयों के मुकाबले में लिखीं और उनसे बिलमुशाफह मुनाजरह किये जिससे यकीनन मुसलमानों को बहुत फायदा पहुचाँ। रद्दे नसारा में तालीफ, तस्नीफ तालीफ और पादरियों से मुकाबला और मुनाजिरे का सिलसिला एक जमाअती न सही लेकिन इन्तज़ामी शक्ल में शुरू हो गया था। कुदरती तौर पर हर जगह मस्जिदंे थी। उलमायेकिराम के वह गढ़ थे। इस इन्कलाबी तहरीक के चलने में कोई दुशवारी पैदा नहीं हुयी। रहनुमा की जरूरत थी हजरत मौलाना रहमतुल्लाह कैरानवी से बेहतर कौन साबित हो सकता था। उन्होंने इसकी बुनियाद डाली और इस काम के लिये देहली, आगरा को मरकज़ क़रार दिया। यहाँ भी मौलाना ने तस्नीफ व तालीफ का काम किया इन की जमात में हिन्दुस्तान के इन्तहा पसन्द और हजरत इस्माईल शहीद के फिदाईन थे जिनकी तादाद काफी थी।’’
इस तहरीक का जिक्र पादरी फन्डर इस तरह तअल्ली के साथ करता हैः
  ‘‘यहाँ (आगरा) के उलमाए इस्लाम देहली के उलमा के साथ मिलकर गुजिश्ता दो तीन साल से किताब मुकद्दस का और हमारी किताबों और मगरिबी उलमा की तन्कीदी कुतुब और तफासीर का मुतालआ कर रहे थे ताकि वह किताबे मुकद्दस को गलत और बातिल कर सकेें। इस का नतीजा यह हुआ कि देहली के आलिम मौलवी रहमतुल्लाह (कैरानवी) ने दो किताबें तस्नीफ की। जनवरी 1854ई0 में जब में यहाँ नहीं था वह आगरा आया था कि अपने अहबाब के साथ इन कुतुब को छपवाने का इन्तजाम करे। मुबाहसा हुआ तकरीबन एक सौ मुसलमान उलमा मौलवी रहमतुल्लाह की मदद के लिये जमा थे और दूसरे रोज इस की दुगनी तादाद थी।’’

यह उलमा बिला किसी मुआवजा के रद्दे नसारा में अपना वक्त सर्फ करते रहे और हर सूबे और हर जिले में इनके शागिर्द रद्दे नसारा का फर्ज अदा करते थे। अगर कोई खास मुआमला या मुनाजरा होता था तो मरकज से उलमाएकिराम उन का मुकाबला करने के लिये जाते जिससे पादरियों और अवाम पर खातिर ख्वाह असर होता था। जो उनकी रिपोर्टों में मौजूद है। अगरचे वह मुखालिफाना व मुआनिदाना अन्दाज में है लेकिन वाकिआत के ढ़ंग और ईसाइयों के तर्ज से यह हकीकत वाजेह हो जाती है कि उलमाए किराम हर जिले में उनके मद्दे मुकाबिल थे और उनको चैन से नहीं बैठने नही देते थे चुनाँचे ‘‘पादरी फ्रंच इंचार्ज जिला मुलतान’’ की रिपोर्ट में हैः
  ‘‘मुलतान के मुल्ला, सैयद और मखदूम सब इस बात के लिए कोशिश कर रहे थे कि खुदा की रोशनी को दाखिल न होने दें  यह दो मशहूर शख्सों यानी मौलवी रहमतुल्लाह ओैर डा. वजीर खाँ के जिन्होंने इस्लाम का तरफदार होकर डाक्टर फंडर से मुबाहिसा किया था, दोस्त थे’’।
हयाते शिब्ली के दीबाचह में अल्लामा सैयद सुलेमान नदवी साहब लिखते हैंः
‘‘अंग्रेजों के बरसरे अरूज आते ही तीन तरफ से हमलों का आगाज हुआ ईसाई मिशनरियों ने अपनी नई नई सियासी ताकत के बल बूते पर इस्लाम के किले रूईन पर हम्ले शुरू कर दिये। दूसरी तरफ हिन्दुओं में आर्य तहरीक ने अपने साबिक मुसलमान हुक्मरानों से निजात पाकर उन पर हम्ले की जुरअत पाई और सबसे आखिर में यूरोपियन उलूम, फनून और तमद्दुन की जाहिरी चमक दमक मुसलमानों की आँखों को खीरह करने लगी। खुदा ने ईसाईयों के मुकाबले के लिये मौलाना रहमतुल्लाह साहब कैरानवी, डाक्टर वजीर खाँ साहब ;आगराद्ध और उसके बाद मौलाना मुहम्मद क़ासिम साहब नानौतवी, मौलाना रहम अली साहब मंगलोरी, मौलाना इनायत रसूल साहब चिडियाकोटी, मौलाना सय्यद मुहम्मद अली साहब मौंगीरी वगैरा अश्खास पैदा किये। जिन्होंने ईसाइयों के तमाम ऐतराजात के पुरजे उडा दिये। और ख्ूासूसियत के साथ डाक्टर वजीर खाँ  साहब और मौलाना रहमतुल्लाह साहब कैरानवी का वजूद तो रद्दे ईसाईयत के बाब में ताईदे गेबी से कम नहीं। और कौन बावर कर सकता था कि उस वक्त में पादरी फन्डर के मुकाबले के लिये डाक्टर वजीर खाँ जैसा आदमी पैदा होगा जो ईसाईयांें के तमाम असरार का वाकिफ और उनकी मज़हबी तस्नीफात का माहिरे क़ामिल और इबरानी, यूनानी का ऐसा वाक़िफ होगा जो ईसाईयों को खुद उन्हीं की तस्नीफात से मुलज़िम ठहराएगा और मौलाना रहमतुल्लाह साहब के साथ मिलकर इस्लाम की हिफाजत का नाक़ाबिले शकिस्त क़िला दम के दम में खडा कर देगा।
आर्यों के दयानन्द सरस्वती के मुकाबले के लिये खास तौर पर मौलाना मुहम्मद क़ासिम साहब का जहूर भी ताईदे गैबी ही का निशान है। और फिर जिस तरह अकाइदे हक्का की इशाअत और रद्दे बिदआत का अहम काम मौलाना मूहम्मद क़ासिम साहब और मौलाना रशीद अहमद साहब गंगोही और इस जमात के दीगर मुकद्दस अफराद के ज़रिये अन्जाम पाया इसके आसारे बाकिया अब भी हमारी निगाहों के सामने हैं।’’
सन 1370 हिजरी के माहे रजब में हजरत मौलाना रहमतुल्लाह साहब रह. और पादरी फॅडर के दरमियान आगरा में यादगारे जमाना मुनाजिरा मुनअकिद हुआ। जिसमें हक को फतेह व कामयाबी और बातिल को हजीमत व शकस्त हुई। यह हालात आईन्दा सतूर में आप मुलाहिजा फरमायेंगे, बिलअमूम हजरत मौलाना रहमतुल्लाह साहब को पाकिस्तान और हिन्द की मौजूदा दुनिया ‘‘बानीये मदरसा सौलतिया मक़्क़ा मुअज़्ज़मा‘‘ की हैसियत से जानती है मगर हजरत मौलाना रहमतुल्लाह साहब के मुजाहिदाना कारनामों और मुदाफिअते इस्लाम की अजीमुश्शान खिदमत से वाकिफ नहीं। बाखबर ख़्वास यक़ीनन वाकिफे हाल हैं। इस्लाम की इस काबिले फखर नुसरत व कामयाबी के सदसाला यादगारी जिक्रे खैर के साथ हजरत मौलाना रहमतुल्लाह साहब रह. के मुख्तसर हालाते ज़िन्दगी हदियए नाजरीन किये जाते हैं।
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हजरत मौलाना मुहम्मद रहमतुल्लाह साहब रहमतुल्लाह अलैह मौहल्ला दरबार कलां, कस्बा कैराना, ज़िला मुज़फ्फर नगर में माह जमादिउल अव्वल सन 1233 हिजरी में पैदा हुए। बाज कलमी याददाशतों से मालूम होता है कि कस्बा कैराना कदीम जमाने में चैहान राजपूतों की राजधानी रह चुका है। जोन्डला और बान्सा जिला करनाल में जो चैहान आबाद थे उनके मूरिस आला राणा हुर्रा की औलाद में से राणा कलसा कैराना का हुकमरान था। जिसकी वजह से कस्बा और निवाह के चैरासी (84) गाँव ‘‘कलसियान गूजर‘‘ कहलाते हैं। राणा कलसा चैहान राजपूत था मगर कैराना और उसकी निवाह मेें गूजर कौम आबाद थी इसलिए राणा ने इस क़ौम मे शादी की। राणा कलसा सुलतान मेहमूद गज़नवी का मआसिर था। सुलतान मेहमूद गजनवी के जमाने में सुलतान की इजाजत से सैयद सालार मसऊद गा़जी रह. मुजाहिदीन की एक बडी तादाद के साथ हिन्दुस्तान पर हमलावर हुए और झिन्झाना होकर कैराना पर हमला किया। शहर के शुमाली और गरबी निवाह में आजतक मजार शुहदा मौजूद हैं। एक कबर चन्द गज तवील शहर के शुमाली जानिब में है जो अरब शुहदा की क़बर बताई जाती है। इसमें बहुत से शुहदा को एक जगह दफन कर दिया गया है। सय्यद सालार मसऊद गाजी रह- के कैराना पर हमले की यादगार आजतक सालारी क़ौम कस्बा में मौजूद है। यह अरब नज़ाद क़ौम कस्बे में शुतरबानी का काम करती है और ऊँट उनका ज़रीया-ए-मआश हैं। कैराना में सबसे पहले यही सालारी क़ौम आबाद हुई सलातीन तुगलक के जमाने में शेख अलाउद्दीन अन्सारी इस निवाह के मन्सबे कज़ा पर मुकर्रर हुए। उस वक़्त से अन्सार कैराना में आबाद है। शेरशाह के जमाने में ‘‘काकडजई‘‘ अफगान आबाद हुए। जिनकी औलाद आजतक मौजूद है।
हजरत मौलाना रहमतुल्लाह साहब रह. का नसब नामाः
रहमतुल्लाह इब्ने खलीलुल्लाह अल मारूफ ब खलीलुर्रहमान इब्ने हकीम नजीबुल्लाह इब्ने हकीम हबीबुल्ला इब्ने हकीम अब्दुर्रहीम इब्ने हकीम कुतबुद्दीन इब्ने शेख हकीम फुजैल इब्ने हकीम दीवान अब्दुर्रहीम (बिरादर नवाब मुकर्रब खाँ) इब्ने हकीम अब्दुल करीम अलमारूफ ब हकीम बीना अलमुकलब ब ‘‘शेखुज्जमाँ’’ इब्ने हकीम हसन इब्ने अब्दुस्समद इब्ने अबू अली इब्ने मुहम्मद यूसुफ इब्ने अब्दुल कादिर इब्ने कबीरूल औलिया हजरत मख्दूम जलालुद्दीन मुहम्मद रह. इब्ने मेहमूद इब्ने याकूब इब्ने ईसा इब्ने इस्माईल इब्ने मुहम्मद तकी इब्ने अबीबक्र इब्ने अली नकी इब्ने उसमान इब्ने अब्दुल्लाह इब्ने शहाबुददीन इब्ने शेख अब्दुर्रहमान गाज़रूनी इब्ने अब्दुल अजीज सरखसी इब्ने खालिद इब्ने वलीद इब्ने अब्दुल अजीज इब्ने अब्दुर्रहमान कबीर मदनी इब्ने अब्दुल्ला सानी इब्ने अब्दुल अजीज कबीर इब्ने अब्दुल्ला कबीर इब्ने उमरो इब्ने अमीरूल मोमिनीन जुन्नूरैन सैयदना उसमान इब्ने अफ्फान रजियल्लाहु अन्हु।
हिन्दुस्तान में उस्मानियों का नसब नामा नस्लन बाद नसलिन उस कदीम तारीखी तूमार में महफूज है जो हजरत कबीरूल औलिया मखदूम जलालुद्दीन रहमतुल्लाह अलैह की दरगाह पानीपत में मौजूद है और जिसकी मुतआद्दिद नकूल बाज उस्मानीयुन्नसब अहले पानीपत के पास हैं। असली तूमार में हर उस्मानी जलाली के नाम का इन्दिराज कमअज़कम बीस जलालियुन्नसब अश्खास की मौजूदगी में होता था। मगर अफसोस है कि आंहकदह बिशक्सत।
हजरत मख्दूम कबीरूल औलिया रहमतुल्लाह अलैह हजरत शाह शर्फुददीन बुअली कलन्दर रहमतुल्ला अलैह से हमेशा इस्तिदआए बेअत किया करते थे और कलन्दर साहब हमेशा यह जवाब देते कि ‘‘तुम्हारा मुर्शद आने वाला है अभी सब्र करो, हम बतादेंगे । जब हजरत ख्वाजा शमसुद्दीन साहब तुर्क रहमतुल्लाह अलैह वारिद पानीपत हुए तो कलन्दर साहब ने मख्दूम साहब से फरमाया के जाओ तुम्हारे पीर आते हैं। उनका इस्तिक़बाल करो। आप घोडे पर सवार शहर से बाहर निकले देखा के एक फकीर चले आते हैं। सलाम के बाद ख्वााजा साहब ने फरमाया के ‘‘मियाँँ जवान! जरा अपने घोडे की चाल तो दिखाओ‘‘ आप ने बाग उठाई और घोडे को दौडाया। ख्वाजा साहब बहुत खुश हुए और फरमाया कि ‘‘ज़हे अस्प व ज़हे सवार‘‘ मख्दूम साहब पर एक खास कैफियत तारी हुई और आप घोडे पर से गिरे। ख्वााजा साहब ने सीने से लगाया और जो कुछ देना था दिया और बेअत करके खिलाफत अता फरमायी। हजरत मखदूम साहब रह0 को मुताला कलन्दर साहब रह0 करा चुके थे लेकिन तालीम ख्वाजा शमसुद्दीन साहब तुर्क पानीपती रह0 पर मुनहसिर और मौकूफ थी जो पाया-ए- तकमील को पहुँची। मख्दूम साहब का विसाल पानीपत में 13 रबीउलइव्वल 765 हिजरी को हुआ। पानीपत में मौहल्ला मख्दूम ज़ादगान में आप की औलाद मौजूद और आबाद थी जो इन्कलाब 1947 ई0 में मुन्तशिर हो गई मगर दरगाह मखदूम साहब और मस्जिद वगैरह बाकी है।
हिन्दुस्तान में उस्मानियों की आमद
सुलतान महमूद गजनवी (वफात 23 रबीउल अव्वल 421 हिजरी मुताबिक 29 अप्रैल 1030ई0)का जिस माहोैल में नशवनुमा हुआ उस का असर है कि वह इब्तिदा से अहले इल्म और अरबाबे कमाल का दिलदादह था उस की जिन्दगी पर इस वाकिये का बहुत गेहरा असर है के उसने अपने खुशनुमा बाग में एक दिलकश मकान तामीर किया जिसके जश्न में उस ने दूसरे उमरा्(शासक दल) और अईयाने ममलकत केे साथ अपने बाप अमीर सुबुक्तगीन को भी मदऊ किया बाप ने बाग और मकान के दिलफरेब माहौल को बेहद पसन्द करते हुए अपने होनहार लायक वलीअहद को जो कीमती नसीहत की वह यह थीः
‘‘ऐसे बाग और मकान तो दूसरे अमीर भी बनवा सकते हैं। तुमको वो इमारत तामीर करनी चाहिए कि जिसकी बराबरी कोई दूसरा न कर सके‘‘। महमूद ने पूछा ‘‘ऐसी इमारत कौनसी है‘‘। बाप ने जवाब दिया कि ‘‘वह अहले इल्म व फजल के दिलों की तामीर है। जो कोई निहाल एहसान उनकी जमीने दिल में लगाए उस का समरह हमेशा पाए।‘‘
इस किस्म की मुश्फिकाना नसाऐह व हिदाययत और उस जमाने के क़दरशनास माहौल मेें मज़हबी और दीनी तरबियत का नतीजा था कि सुलतान महमूद गजनवी उलमा और अहले कमाल का हमेशा कदरदान रहा। उसको उलूम और फनून से तब्ई लगओ था। हर काम में किफायत श्आिरी मददे नजर रहती मगर हुनर परवरी में उसका फेज आम था। उलमा के लिये वजाइफ और तन्ख़ाहें में मुकर्रर थीं। दारूलउलूम, कुतुब खाने, अजाइब खाने वगैरह उसकी इल्म नवाज़ी का सबूत थे। उस के दरबार में उलमा, उदबा, शुअरा जमा रहते। असाइरी, राजी, अस्दी, तूसी, मनुचहर बलखी, हकीम अन्सुरी, अस्जदी, फरखी, दकीकी अल्लामा अबु रिहान जैसे यगानाऐ असर शुअरा और उलमा उस के अहद में पाये गये।
यही पहला मुसलमान हुकमरान जो सुलतान के लकब से मौसूम हुआ। सुलतान महमूद गजनवी की दीन परवरी उलमा नवाजी से सलतनत के अक्सर व बेशतर ओहदों पर काबिल और लायक दीनी हुक्काम मुकर्रर थे। फौज की तन्ज़ीम का भी खास एहतमाम था। फौजी ओहदों में भी उलमा को इमतियाजी हैसियत हासिल थी। हजरत मौलाना रहमतुल्लाह अलैह के जददे आला शेख अब्दुर्रहमान गाजरूनी सुलतान महमूद गजनवी की फौज में शरई हाकिम थे। यह ओहदा ‘‘काजी असकर’’ के नाम से खुलफाये आले उस्मान रहमतुल्लाह अलैहिम अजमईन के जमाने में भी हमेशा रहा और आखिरी खलीफा सुलतान मुहम्मद रशाद खाँ खामिस मरहूम के जमाने तक इस ओहदे पर मुमताज और मुतदैयन उलमा मुकर्र किये जाते थे। जो फौज के तमाम शरई मुआमलात व मुकदमात का फैसला किया करते। शेख अब्दुर्रहमान गाजरूनी रह0 (गाज़रोन या गाज़रान तवाबिआत शीराज में मशहूर मकाम थाद्ध सुलतान महमूद गजनवी के लशकर के साथ ‘‘काजी असकर’’ की हैसियत से हिन्दुस्तान आये और जब सुलतान महमूद गजनवी ने सोमनाथ के मन्दिर पर हमला किया तो वह फौज के साथ शरीक जिहाद थे। फतह पानीपत के बाद यहीं मुकीम हुये। पानीपत में जेरे किला मदफून हैं। आप की कब्र पानीपत में एक छोटे से अहाते के अन्दर मशहूर व मारूफ है।
हजरत मौलाना रहमतुल्लाह अलैह हकीम मुहम्मद हसन व हकीम अब्दुर्रहीम अब्नाये हकीम अब्दुल करीम अलमारूफ ब ‘‘हकीम बीना’’ तबीब दरबारे अकबरी के खैरूल खलफ थे। कशमीर से वापसी के बाद लाहौर के करीब चाॅँदनी रात में अकबर बादशाह हिरनों की लडाई का तमाशा देख रहा था। इत्तेफाकन एक हिरन अपने हरीफ को छोड कर अकबर की तरफ झपटा और उसकी दोनों रानों के बीच में सींग मारा। जख्म हो गया, वरम और तकलीफ बढती गई। इलाज से कोई इफाका ना हुआ तो अबुलफजल की राय से हकीम बीना को पानीपत से मुआलजे के लिए बुलाया गया। एक माह सात रोज के बाद सेहत हो गयी। शहिन्शाह अकबर ने हकीम बीना साहब को ‘‘शेखुज्जमाँ’’ का शाही खिताब अता किया। हकीम मूहम्मद हसन भी अपने वालिद के साथ बादशाह के इलाज में हमा तन मसरूफ खिदमत रहे इसलिए मोरदे अलताफे शाही हुए ओैर कैराना बतौर जागीर अता हुआ फरमान की नकल दर्ज ज़ेल हैः
फरमान जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर बादशाह
बजिम्न मुआफी व अताए जागीर कैराना मे इलाका
‘‘खवानीने रफी मिकदार व सलातीन व उमराये बाविकार सुदूर वुजरा किफायत शिआर व उम्माल ममालिके हिन्दुस्तान सानहल्लाहु अन आफातिज्जमाँ चूँ फजायल मआब कमालात इकतिसाब हिकमत शिआर, मसीहा आसार, शेख हसन दर इजाला अमराज व आराज इंसाँन बकदरिल वुसइ वाला मकान बिसाते अहसान व इमतिनान बजहूर रसानीदा व मीरसानद बिना बराँ इनायात व इलतिफाते बेगायात शामिले हाल व काफिले आमाल आँ फजाइल मआब गरदानीदा ।
फरमान वाजिबुल इत्तिबा शर्फ निफाज याफ्त कि मवाजी पान्सद बिगेह जमीन मजरू अज मोजा डूमाखेडी, खन्द्रावली परगनह कैराना मिन आमाल मेयाने दोआब हजरते देहली बइवज मब्लग दह हजार तिन्गाह वादि कि अजाँ मोजा बमूजिब फरमान आलीशान हजतर व दो कल्बा जमीन अज सवाद कस्बा परगनाह मजकूर मुताल्लिक बमशारून इलैह मुफव्वज व मुताल्लिक बमशारून इलैह बूदह बाशद, कि बाजिबी आँरा साल बसाल कसवे ब हाल अफजूनद व मआश खुद कुनद व इजालाये अमराज जुमरह इनाम बगायत ऐहतमाम बजहूर रसानद व दारोगाहा व उम्माले आँ परगनाह रा मीबायद कि जमीन हाए मजकूर रा बतसररुफे ऊ गुजारन्द व इख्राजात व कुल तकालीफ हबूबी मुजाहमत नसाज़न्द, व मुजाफ व मुसल्लम दानिस्ता बहेच वजह प्रामून न गर्दन्द व हर साल बफरमान मोहताज नदारन्द।—तहरीर हाजा फी शहर-जीकादा सन 915 हिजरी’’–
हकीम मौहम्मद हसन शहजादा सलीम के तबीब खास थे शाहजादे ने ‘‘ मुक़र्रब खाँ‘‘ खिताब दिया। जहाँगीर ने तख्त नशीनी के बाद ‘‘मुकर्रबुल खाकान‘‘ और ‘‘नाइबुस्सुलतान’’ के खिताबात से नवाब मुकर्रब खाँ को मुअज़्ज़ज किया और पन्ज हजारी का मन्सब दिया। तख्त नशीनी के कुछ अरसे के बाद जहाँगीर ने नवाब मुकर्रब खाँ को सूबा दक्कन व गुजरात का गवर्नर मुकर्रर किया। 1618 ई0 में शहजादा-ए-शाहजहाँ जब वहाँ भेजे गये तो नवाब मुकर्रब खाँ को सूबा बिहार का गवर्नर मुकर्रर किया। मिस्टर होजज ;ीवकरमेद्ध अग्रेंजी सैयाह व मुसव्विर उन की सूबा दारीए बिहार के जमाने में जुलाई 1620ई0 में पटना आया था और नवाब मुकर्रब खाँ का मेहमान रहा। हुसने सलूक से उसके साथ पेश आय। मिस्टर होजज के खतूत से मालूम होता है कि उसपर नवाब मुकर्रब खाँ का रोब बहुत गालिब था और यह खतूत शुक्रिया के जज़्बात से लब्रेज़ नजर आते हैं। जिन में नवाब साहब के बहुत से हालात लिखे गये हैं 1621ई0 में सूबा देहली व आगरा की हकूमत पर सरफराज हुए। शाहजहाँ जब तख्त नशीन हुए तो नवाब मुकर्रब खाँ को मजीद ईनाम और इकराम के साथ मुजाफात कैराना के परगने जागीर में अता हुए। नवाब मुकर्रब खाँ के लडके हकीम रिजकुल्लाह, शाहजहाँ के तबीबे दरबार और हश्त सदी मन्सबदार थे। हजरत औरंगज़ैब आलमगीर रहमतुल्लाह अलैहे ने हकीम रिजकुल्लाह को खिताब ‘‘खानी‘‘ मरहमत फरमाया। 1668 ई0 में हकीम रिजकुल्लाह साहब ने वफात पाई।
दीवान अब्दुर्रहीम और दीवान अब्दुल हकीम नवाब मुकर्रब खाँ के यह दोनों छोटे भाई भी अस्हाबे मनासिब व जाह थे। दीवान अब्दुर्रहीम नवाब मुकर्रब खाँ की गवर्नरी ए दक्कन व गुजरात वगैरह के जमाने में तबीबे दरबार जहाँगीर रहे। उनकी औलाद मंें आजतक तिब का सिलसिला और खिदमते खल्क का जज़्बा बाकी है। दीवान हकीम अब्दुर्रहीम की औलाद में हर एक अपने वक्त का कामिले फन तबीब था।
हकीम वजीहुद्दीन साहब मुसन्निफ किताब ‘‘ मख्जने हिक्मत‘‘ तिब वेदक जो 1196 हिजरी में लिखी गई और हकीम अली अकबर साहब मरहूम बिरादर हजरत मौलाना रहमतुल्लाह साहब रह0 खास तौर पर काबिले जिक्र हैं।
915 हिजरी में फरमाने अकबरी के मुताबिक कैराना व मुजाफाते कैराना नवाब मुकर्रब खाँ को बतौर जागीर अता हुआ तो उस्मानीयुन्नसब जलाली खानदान का यह हिस्सा पानीपत की सकूनत तरक करके कैराना में आबाद हुआ। इस मामूली कस्बे की तोसी व तन्जीम की गई। कस्बे से बाहर नवाब मुकर्रब खाँ और दीवान अब्दुर्रहीम ने अपने महिल्लात, कचहरियां और मुताल्लिकीन रियासत के मकानात वगैरह बनाये जो अब कस्बे की आबादी का एक जुज़ है। नवाब मुकर्रब खाँ ने कैराना में आमों और दीगर इक्सामों के फलों का बाग लगाया जिसमें गुजरात दक्कन और दूर दस्त मुमालिक से आमों के दरख्त मंगा कर लगाये। एक सोै चालिस बीगह इस बाग का रक्बा था। बाग के वस्त में दो सौ बीस गज लम्बा दो सौ गज चैडा हौज (तालाब) बनवाया। हौज के अन्दर माहताबी वगैरह बीस गज मुरब्बा में बनवाई। इस हौज में जमना का पानी एक तरफ से आता और दूसरी तरफ से निकलता था। सर्द और गर्म मुल्कों के दरख्त नसब कराये। सोलवीं जलूस में जहाँगीर खुद कैराना आया। इस बाग की तफसीलात ‘‘ तुजके जहाँगीरी‘‘ में मौजूूद है। जहाँगीर लिखते हैंः
‘‘मुखलिस व मुहिब्बे खास, यार वफादार मुकर्रब खाँ मुतमन्नी था कि मैं उसके यहाँ आऊँ मैं ने उसके घर को कुदूम मैमनत लुजूम से काबिले रश्क बना दिया और इस खैर खवाह क़दीम को बेशकीमत सामान, कीमती जवाहरात तीन लाख रूपये, एक बाग और एक वसी मकान दिया।’’
नवाब मकर्रब खाँ के लगाये  हुये बाग के आम हस्बे रिवायत ‘‘ताजुल मआसिर‘‘ मुद्दतों तक देहली में मशहूर और मरगूब रहे। वह पुरानी दुनिया अगरचे इन्कलाब 1857ई0 में उजड चुकी मगर यह यादगारे जमाना बाग जिस जमीन पर कायम था वह अब भी ‘‘नौलखा जमीन’’ के नाम से मारूफ है। मशहूर है कि इस बाग में छोटे बडे हर किस्म के नौ लाख दरख्त थे। बाग में नवाब मुकर्रब खाँ की बनाई हुयी बारादरी भी मौजूद है जिस जमाने में नवाब मुकर्रब खाँ गुजरात के गवर्नर थे और बन्दरगाह सूरत भी उनके ज़ेरे असर थी उस वक्त उन्होंने अपनी हिकमत अमली से सात जहाज जो मुद्दत से गर्क़ाब थे समुन्दर से निकलवाये। अलावा दीगर अशया के कसौटी (संगे समाक) के चन्द सतून नादिरूल वजूद भी बरामद हुये। इन अशया की इत्तला शहन्शाह जहाँगीर को दी गयी शाही हुकम से यह तमाम सामान नवाब मुकर्रब खाँ को अता हुआ। मजकूराबाला तालाब के वस्त में चबूतरे पर जो बंगला तामीर किया गया था उसमें कसौटी के यह सतून लगाये गये थे जो अब हजरत बू अली शाह कलन्दर रह0 की दरगाह पानीपत में नसब हैं। नवाब मुकर्रब खाँ के इस बाग के मशरिकी जानिब संगीन इमारात का सिलसिला था जो ‘‘दरबार’’ के नाम से मारूफ था। यहाँ अदालतें ,फीलखाने और रियासत के दफातिर वगैरह थे। बाग के दूसरी जानिब सकूनती महिल्लात वगेरह थे जो ‘‘नवाब दरवाजा‘‘ के नाम से अब तक मौसूम है, यह पुरानी इमारतें जमाने के नासाजगार हालात और फिर इन्कलाब सन 1857ई0 की तबाहकारी में बर्बाद हो गईं। दरबार और नवाब दरवाजा के सरबफलक और आलीशान फाटक, नक्कार खानं और कुछ इमारतें पुरानी शानो शोकत की याद को जिन्दा और बाकी रखने के लिये अब तक मौजूद हैं। ‘‘अद्दवामु लिल्लाह‘‘ नवाब साहब का मजार पानीपत में हजरत बू अली शाह कलन्दर रह0 के अहाते में मौजूद है। कब्र का तावीज असली जहर मोहरा के एक टुकडे का है जिस का वजन 27 मन का ब्यान किया जाता है। दीवान अब्दुर्रहीम के मजार का अफसोस है कि पता न चल सका गालिबन देहली में महरौली के करीब कहीं है।
हजरत मौलाना रहमतुल्लाह साहब रह0 की विलादत बा सआदत इसी ‘‘मौहल्ला दरबार’’ में अपने आबाव अजदाद के इन तारीखी मकानात में हुयी। बारह बरस की उमर में कुरान खत्म करने के साथ दीनियात, फारसी की इब्तदाई किताबें अपने बुजुर्गों से पढीं, उस के बाद देहली बगर्जे तालीम तशरीफ ले गये और मौलाना मुहम्मद हयात साहब के मदरसे में दाखिल हुये। क़्याम भी मदरसे में रहा सन 1250 हि0 में हजरत मौलाना मरहूम के वालिद मौलवी खलीलुल्लाह साहब मरहूम देहली में महाराजा हिन्दुराव बहादुर के मीर मुन्शी मुकर्रर हुये और धीरज पहाडी के करीब उन का क्याम हुआ तो मौलाना अपने वालिद माजिद के पास तशरीफ ले आये। दिन में मदरसा मौलाना मुहम्मद हयात में तालीम हासिल करते और रात को महाराजा को अकबर-नामा सुनाते थे। कुछ अर्से तक हजरत मौलाना मरहूम ने भी महाराजा हिन्दुराव के यहाँ बहैसियत मीर मुंशी काम किया है। तहसीले इल्म का शौक मौलाना को लखनऊ ले गया। चन्द रफका के साथ आप लखनऊ पहुँचे और मुफती सादुल्ला साहब मरहूम से शर्फे तलम्मुज हासिल किया। हजरत मौलाना के असातजा के अस्माये ग्रामी दर्ज जै़ल हैंः
(1) मौला मुहम्मद हयात साहब रह0
(2) मौलाना मुफ्ती साअदुल्लाह साहब रह0
(3) मौलाना अहमद अली रह0 बिडोली, जिला मुजफ्फर नगर जो आखीर में वजीरे रियासत पटियाला हो गये थे।
(4) आरिफ बिल्लाह मौलाना अब्दुर्रहमान चिश्ती रह0। यह उस्तादे शाहे वक्त थे। तमाम उलूम और फुनून में महारते ताम्मा रखते थे। इन से इस्तफादे के जमाने में हजरत मौलाना के रूफका में मौलाना अब्दुर्रहमान साहब पंजाबी और मौलाना सैयद मुहम्मद अली साहब भी थे जो अपने वक्त के फाजिल और साहिबे फैज बुजुर्ग माने जाते थे। मौलाना शाह अब्दुर्रहमान चिश्ती और उन के उस्ताद मौलाना मुहम्मद हयात साहब रह0 मरहूम बस्ती हजरत निजामुद्दीन औलिया देहली में मदफून हैं।
(5) मौलवी इमाम बख्श साहबाई साहब
(6) हकीम फैज मुहम्मद साहब। हकीम साहब अपने जमाने के बाकामाल तबीब थे, खानदानी रिवायत के मुताबिक हजरत मौलाना मरहूम ने हकीम साहब से इल्मे तिब में तकमील की।
(7) मुसन्निफ लोकारसम से रियाजी हासिल की
हिन्दुस्तान में हजरत मौलाना के दर्स व तदरीस का जमाना बहुत महदूद है जमाने के नासाजगार हालात और खास तौर पर हिन्दुस्तान में नसारा के बढते हुये इकतदार को रोकने की फिक्र ने आप को इस का मौका न दिया कि इतमिनान के साथ तालीम और तदरीस का फैजे आम जारी करते। तकमीले तालीम और अकबराबाद आगरा के यादगारे जमाना मुनाजरा के दरमयानी अर्से में चन्द साल तक दरबार कैराने की मस्जिद में हजरत मौलाना ने एक दीनी मदरसा कायम किया। इस मदरसे के फैजयाब तलबा मंे से चन्द खास नाम दर्ज जैल हैं जो हिन्दुस्तान में हजरत मौलाना के खास तलामिजा थे उन में से बाज असहाब ने मक्का मुअज्जमा भी पहुँच कर हजरत मौलाना से शर्फे तलम्मुज हासिल किया।
(1) मौलाना अब्दुस्समी रामपुरी मुसन्निफ हम्दबारी
(2) मौलाना अहमदुद्दीन साहब चकवाली
(3) मौलाना नूर अहमद अमृतसरी
(4) मौलाना शाह अबुल खैर साहब
(5) मौलाना शाह शरफुल हक साहब सिद्दीकी
(6) मोलवी कारी शहाबुद्दीन साहब उसमानी कैरानवी
(7) मोैलाना हाफिजुद्दीन साहब दुजान्वी
(8) मौलाना इमाम अली साहब उसमानी कैरानवी
(9) मौलाना अब्दुलवहाब साहब वेलोरी बानी मदरसाये बाकियातुस्सालिहात, मद्रास
(10) मौलाना बदरूल इस्लाम साहब उसमानी कैरानवी मौहतमिम मदरसा हमीदिया कुतुबखाना शाही कुस्तुन्तुनिया
1256 हि0 में हजरत मौलाना मरहूम की शादी अपनी खाला की लडकी से हुयी सन 1257हि0 में फिर महाराजा हिन्दुराव ने आप को और आप के वालिद माजिद को अपने पास देहली बाडा हिन्दुराव में बुला लिया और हजरत मोैलाना  को अपना मीर मुन्शी मुकर्रर किया और उनके वालिद माजिद के जिम्मे जायदाद की निगरानी और देख भाल का काम सपुर्द हुआ कुछ अरसे के बाद मौलवी खलीलुल्लाह साहब (उर्फ खलीलुर्रहमान) का इन्तकाल हो गया और बाज खान्गी मजबूरियों की बिना पर हजरत मौलाना मरहूम ने महाराजा हिन्दुराव के यहाँ अपनी जगह पर अपने छोटे भाई मौलवी मुहम्मद जलील साहब को मुलाजिम रख कर अलैहदगी इखतियार की और कैराना पहँच कर दर्स व तदरीस के साथ रद्दे नसारा की मजहबी खिदमत में मसरूफ हुये और ‘‘इजालतुल ओहाम’’ लिखनी शुरू की
‘‘इजालतुल औहाम’’ ज़ेरे तरतीब थी कि हजरत मौलाना मरहूम सख्त अलील हुये उठने बैठने और चलने फिरने के काबिल न रहे। इशारे से नमाज अदा होती थी। अकरबा व अइज्जा, तलामिजा और तीमारदार बढती हुयी कमजोरी और शिद्दते मर्ज से परेशान थे। एक रोज नमाज फजर के बाद आप रोने लगे। तीमार दार समझे कि जिन्दगी से मायूसी है। अइज्जा ने तसल्ली व तशफ्फी करनी चाही आपने फरमाया ‘‘बखुदा सेहत की कोई अलामत नहीं। लेकिन इन्शाअल्लाह सेहत होगी। रोने की वजह यह है कि ख्वाब में आँ हजरत सल्लल्लाहू अलैहि वसल्ल्म तशरीफ लाये। हजरत सिद्दीके अकबर रजी. भी साथ हैं। हजरत सिद्दीके अकबर फरमाते हैं ऐ जवान! तेरे लिये रसूलुल्लाह की यह खुशखबरी है कि अगर तकलीफ ‘‘इजालतुल औहाम’’ मर्ज की वजह है तो वही बाइसे शिफा होगी’’। मौलाना मरहूम ने फरमाया कि इस खुशखबरी के बाद मुझे कोई रंज और मलाल नहीं बल्कि मसरूर और खुश हूूँ और फर्ते मसर्रत से यह आँसू निकल आये। अलहम्दुलिल्लाह कि उसके बाद सहत व आफियत हो गयी और ‘‘इजालतुल औहाम’’ की तरतीब व तालीफ का काम शुरू कर दिया। यह वह जमाना था जब कि ईसाईयों ने हिन्दुस्तान में इस्लाम के खिलाफ जबरदस्त मुहिम जारी  कर रखी थी। पादरी फन्डर ;च्ंकतम ब्ण्ब्ण्च्ण् थ्वदकमतद्ध और उस की जमात ने दिल शिकन तकरीरों का सिलसिला जारी कर रखा था, पादरी फन्डर की किताब ‘‘मीजानुलहक‘‘ ने अवाम में खौफ व हिरास पैदा कर दिया था। खास तौर पर उलमा-ए-किराम की खामोशी से मिशनरी का जुहला पर काफी असर होने लगा था और पादरी उलमा की खामोशी से नाजायज फायदा उठाने लगे। उलमाये इस्लाम ने तैयारी शुरू की। मुकाबले के लिये मवाद फराहम किया गया और इस्लाम की हक्कानियत, सदाकत और अल्लाह का नाम बुलन्द करने के लिये रद्दे नसारा की मजहबी जंग के काइदे अव्वल हजरत मौलाना मरहूम ने एलान कियाः
‘‘मैंने हिन्दुस्तान के सबसे बडे पादरी जो उलमाये मसीहीयीन में मुमताज हैसियत का मलिक और मीजान का मुसन्निफ था उस से ख्वाहिश जाहिर की कि वह मेरे साथ मजम-ए-आम में मुनाजरा करे ताकि हक वाजेह होजाये और यह मालूम हो जाये कि उलमाये इस्लाम ने इन रसाइल की तरदीद इसलिये नहीं की कि वह आजिज थे बल्कि जवाब देने की जरूरत नहीं समझते थे।’’   (मीजानुल हक, पृष्ठ3)
हजरत मौलाना मरहूम अपने शफीक दोस्त मौलवी मुहम्मद अमीरूल्लाह साहब मीर मुख्तार राजा साहब बनारस (जो पादरी फन्डर से भी वाकिफ थे) के साथ पादरी फन्डर के मकान पर गये ताकि मुनाजरा के लिये गुफतुगू करें। पादरी अपने मकान पर न मिले, चुनाँचे 23 मार्च सन 1854ई0 से हजरत मौलाना मरहूम ने पादरी फंडर से खत और किताबत शुरू की। इस मजहबी मरासलत का सिलसिला हजरत मौलाना मरहूम के आखिरी खत मुअर्रिखा 7 अप्रैल सन 1854ई0 पर खत्म हुआ। उनवान मुनाजरा, मकाम और तारीख मुनाजरा तय हुये। तरफैन के इत्तफाक से इब्तदाई मराहिल मुकम्मल होने के बाद पीर के रोज 11रजब सन 1270 हि0 मुताबिक 10 अप्रैल सन 1854 ई0 को अलस्सबाह कटरा अब्दुलमसीह अकबराबाद-आगरा में मुनाजिरे का पहला  इजलास मुनअकिद हुआ। हजरत मौलाना रहमतुल्लाह साहब रह0 के साथ डाक्टर मुहम्मद वजीर खाँ मरहूम और पादरी फन्डर के साथ पादरी फरंच थे। मजलिसे मुनाजिरा में मिस्टर स्मिथ हाकिम सदर दीवानी, मिस्टर कृस्चन सेकिन्ड सदर सूबा बोर्ड, मिस्टर विलियम मजिस्टेªट इलाकाये फौज, मिस्टर लेडली तर्जुमान हकूमत, पादरी विलियम गलबन, मुफती रियाजुद्दीन साहब, मौलवी फैज अहमद साहब सरिश्तादार सदर बोर्ड, मौलवी हजूर अहमद साहब, मौलवी अमीरूल्लाह साहब मुखतार राजा साहब बनारस, मौलवी कमरूल इस्लाम साहब इमाम जामा मस्जिद आगरा, मुन्शी खादिम अली साहब मोहतमिम मतलउल अख्बार और मुन्शी सिराजुल हक साहब हाजरीन में खास तौर से काबिले जिक्र हैं। अवाम को इस मुनाजिरे से बेहद दिलचस्पी थी। सब से पहले पादरी फन्डर ने हाजरीन को मुखातिब करते हुये कहाः
‘‘यह जानना जरूरी है कि यह मुनाजिरा क्यूँकर मुनअकिद हुआ। यह मौलाना रहमतुल्लाह की सई व कोशिश और ख्वाहिश का नतीजा है। इस से फायदे की सूरत मेरे नजदीक नजर नहीं आती। मेरी तमन्ना यह है कि दीने ईसवी की हक़ीक़त मुसलमानों के सामने रख्ँूंा। मुबाहिसे के उनवान, नस्ख और तहरीफ उलूहियत हयाते मसीह, तस्लीस व रिसालत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) तय हुये हैं’’।
पादरी फन्डर के बाद हजरत मौलाना रहमतुल्लाह साहब खडे हुये और नसख व तहरीफे इन्जील पर फाजिलाना बहस की और खुद ईसाईयों की मतबूआत से नसख और तहरीफ साबित कर दिया। बिल आखिर पादरी फन्डर ने डाक्टर मुहम्मद वजीर खाँ साहब के जवाब में कहा कि सात आठ जगह तहरीफ और तब्दीली हुयी हैं । मौलवी क़मरूल इस्लाम इमाम जामा मस्जिद आगरा ने मुन्शी खादिम अली खाँ साहब से फर्माया कि ‘‘लिखो पादरी साहब आठ जगह तहरीफ होने के इकरारी हैं ’’ पादरी फन्डर ने कहा कि ‘‘हाँ बहुत अच्छा है। लिखिये और इस हद तक तहरीफ जरूर हुयी है, लेकिन कुतुबे मुकद्दसा में इस से नुकसान नहीं हुआ है।’’ हजरत मौलाना मरहूम ने फर्माया ‘‘जिस वसीके में एक जगह तहरीफ साबित हो जाये वह काबिले एतबार नहीं रहता। और जब कि सात आठ जगह का ऐतराफ खुद पादरी साहब करते हैं’’ वक्त काफी हो चुका था पादरी फन्डर के ईमा पर मुनाजरा दूसरे दिन के लिये मुलतवी किया गया।
दूसरे रोज 12 रजब सन 1270 हि. मुताबिक 11अपै्रल सन 1854ई0 मंगल के दिन सुबह को जलसाए मुनाजिरा फिर मुनअकिद हुआ। जिस में मिस्टर स्मिथ सदर दिवानी, मिस्टर रेड सदर बोर्ड, मिस्टर विलियम मजिस्ट्रेट इलाकाये फौज, पादरी विलियम गलबन, पादरी हारली, मुफती रियाजुद्दीन साहब, मुफती असदुल्लाह साहब सदरूस्सुदूर, मौलवी फैज अहमद साहब सरिश्ता दार सदर बोर्ड, मौलवी हुजूर अहमद साहब, मौलवी अमीरूल्लाह साहब मुख्तार राजा साहब बनारस, मौलवी कमरूल इस्लाम साहब इमाम जामा मस्जिद आगरा, मौलवी अमजद अली साहब वकील, मौलवी सिराजुल हक साहब, मुन्शी खादिम अली साहब मोहतमिम मतलउल अख्बार, मौलवी अमीर अली शाह साहब, मौलवी कमरूद्दीन खाँ साहब मोहतमिम असअदुल अख्बार, मौलवी मुजफ्फर अली शाह साहब जाफरी कादरी, सैयद सफदर अली साहब शिकोह आबादी, पण्डित जुगल किशोर, मौलवी फैज अहमद बदाँयूनी, मौलवी अमीरूल्लाह साहब वकील, मौलवी मुईनुद्दीन साहब, सैयद बाकिर अली साहब नाजिम महकमा दीवानी, मौलवी करीमुलला खाँ साहब बछडायूनी, सैयद हाफिज हुसैन साहब, हाफिज खुदा बख्श साहब, डाक्टर इलहामुल्ला साहब गोपामवी, मुफती इफहामुल्ला साहब साहिर, काजी बाकिर अली खाँ साहब हमदानी, राजा बलवान सिंह काशी, मौलवी सैयद मदद अली साहब तपिश, मिर्जा जैनुल आबिदीन साहब आबिद, डाक्टर मुकन्दलाल, हकीम फरखन्द अली गोपामवी, सैयद फजल हुसैन साहब, डाक्टर वजीरूद्दीन साहब फरूखाबादी, हकीम जवाहरलाल साहब, गुलाम मुहम्मद खाँ साहब, खलीफा गुलजार अली साहब असीर, गुलाम कुतबुद्दीन खाँ साहब बातिन, मोलवी सिराजुलइस्लाम साहब और दूसरे उलमा और रऊसाये शहर मौजूद थे।
पहले दिन के मुनाजरे की शोहरत आम हो चुकी थी इस लिये दूसरे दिन एक हजार से जियादा हाजरीन की तादाद थी। इस इजलास में भी तहरीफे इन्जील की बकिया बहस जारी रही पादरी साहिबान हर मौके पर गुरेज करते रहे। शकिस्त खुर्दा की बर अफरोतगी तबई अमर है इसलिये पादरी फंरच तुर्श रूई का इजहार करने लगे। यह मुनाजिरा भी बिला इख्तिताम बहस खत्म हुआ मगर पादरी फन्डर ने आम मुनाजिरा और मजमे आम में गुफतगू से पहलू तही करते हुये डाक्टर मुहम्मद वजीर खाँ से मरासलत जारी की। यह खत और किताबत यकुम मई सन 1854 ई0 से शुरू हुयी और 16 अगस्त सन 1854 ई0 को खत्म हुयी  पादरी फन्डर लाजवाब हो चुके थे इसलिये डाक्टर मुहम्मद वजीर खाँ साहब अपने पहले खत में पादरी फन्डर को लिखते हैः
‘‘पहले आप मौलाना रहमतुल्लाह की बातों का जवाब दीजियेे उसके बाद अगर मबाहसा करना जरूरी है तो अपनी कुतुबे दीनिया से हाथ धो कर और उन को मवाफिक इस्लाह अहले इस्लाम के मन्सूख व मुहर्रफ मान कर तस्लीस के मैदान में कदम रखे जब यह मसअला तय हो जायेगा तो हजरत खातिमुल मुर्सलीन की नबुव्वत के उनवान पर गुफतगू की जायगी’’।
हजरत मौलाना मरहूम का दावा था कि जिस मज़हब की तरफ तुम दुनिया को बुला रहे हो वह आसमानी किताब अपनी असली हालत में नहीं है और जिस किताब को तुम मज़हबी किताब कहते हो वह नाकाबिले ऐतबार है पेशवायान मज़हब ईसवी ने इन्जील में बहुत कुछ तहरीफ कर दी है इस लिये आज दुनिया में दीने ईसवी की बुनियाद खोखली हैं।
मुनाजराये अकबराबाद में यह शर्त खास अहम्मियत रखती थी कि अगर हजरत मौलाना मरहूम पादरी फन्डर के एतराजात का जवाब ना दे सके तो मजहब ईसवी इख्तियार कर लेंगे इसी तरह अगर पादरी फन्डर मौलाना मरहूम के सवालात का जवाब ना दे सके तो वह मुसलमान हो जायेंगे। इस मुनाजिरे में हजरत मौलाना मरहूम के जिम्मे रसूले मकबूल की रिसालत को साबित करना। कलाम पाक का आज तक बिला तहरीफ व तगयीर से बिलकुल महफूज आसमानी किताब होना और इब्ताले तसलीस के साथ तहरीफे इन्जील का मुदल्लल सुबूत पेश करना था इस के मुकाबले में पादरी फन्डर को इसबाते तस्लीस के साथ मौजूदा इन्जीलों को वही सहाईफे आसमानी साबित करना था जो हजरत ईसा अलैहिस्सलाम पर नाजिल हुईं और उनमें किसी किसम की तहरीफ नहीं हुयी। हजरत मौलाना मरहूम ने अपनी खुदादाद काबिलियत और ताईदे गेबी से दो रोज के मुनाजिरे में इस अमर को साबित कर दिया कि मौजूदा इन्जील जिस पर ईसाईयों और पादरीयों को नाज है तहरीफ शुदा है जिस का इकरार पादरी फन्डर ने जलसाये आम में कर लिया।
तीसरे दिन मुनाजिरा न हुआ और पादरी फन्डर ने आम मजमे में आने के बजाये अपनी खिफ्फत मिटाने के लिये हजरत मौलाना मरहूम को खत लिखा कि ‘‘आप ने मुनाजिरे में जिन इबारतों के हवाले दिये हैं, आपके कहने पर मैंने समझ लिया कि ऐसा ही होगा। लेकिन मैं ‘‘हल्लुल इश्काल’’ भेज रहा हूँ उस में मुलाहिजा कीजिये वह मक़सद नहीं है जो जनाब ने ब्यान किया है’’!
हजरत मौलाना मरहूम ने इस गुरेज का मुदल्लल और माकूल जवाब दिया। यह खत और किताबत मौलाना मरहूम और पादरी फन्डर के दर्मियान 23 अप्रैल सन 1854 ई0 तक जारी रही। इस मुनाजिरे की पूरी कैफियत ‘‘अलबहसुश्शरीफ फी इस्बातिन्नसख व तहरीफ’’ के नाम से वज़ीरूद्दीन साहब ने मुरत्तब की जो हाफिज अब्दुल्लाह साहब के अहतमाम से सन 1270हि0 में ‘‘फख्रूल मताबे’’ शाहजहाँ आबाद देहली में किताब की शक्ल में छपी और वलीअहद मिर्ज़ा फखरूद्दीन इब्ने सिराजुद्दीन बहादुर शाह बादशाह देहली के हुकम से छपकर और उन्हीं के हुक्म से हिन्दुस्तान के अतराफ व अकनाफ मे इशाअत पज़ीर हुयी। यह किताब सिर्फ मुनाजिरा अकबराबाद आगरा और हजरत मौलाना मरहूम व पादरी फन्डर के आखरी खतूत का मजमुआ है।
मुनाजिरा अकबराबाद को छोटी तकती पर हिस्सा अव्वल मबाहिसा मजहबी और दूसरा हिस्सा ‘‘मरासलात मजहबी’’ के नाम से सैयद अब्दुल्लाह साहब अकबराबादी ने मुन्शी मुहम्मद अमीर साहब के एहतमाम से ‘‘मतबए मुन्अमिया’’ अकबराबाद सन 1271 हि0 में छपवाया। पहला हिस्सा फारसी में तकरीरी मुनाजिरा की रोएदाद है। दूसरे हिस्से में डाक्टर मुहम्मद वजीर खाँ साहब और पादरी फन्डर का तहरीरी मुनाजिरा ऊर्दू में है। इस किताब का अरबी तर्जुमा ‘‘इजहारूल हक’’ के हाशिये पर मतबू हैं जो मतबए महमूदिया काहिरा में सन 1317 हि0 में तबा हुआ।
हजरत मौलाना मरहूम ने फितनए मसीहीयत के इस्तीसाल और रोकथाम की गर्ज से जो किताबें रद्दे नसारा में तस्नीफ  और तालीफ कीं वह हस्बे जे़ल हंैः
1- इजहारूल हकः  खलीफतुल मुस्लिमीन सुलतान अब्दुल अजीज खाँ और खैरूद्दीन पाशा तूनसी सदर आजम की तहरीक पर पादरी फन्डर से अकबराबाद आगरा में मुनाजिरा की मुफस्सल कैफियत और तमाम मसाइल का निहायत बस्त व शरह के साथ बयान है। 16 रजब सन 1280 हि0 कुस्तुन्तीनिया में इस किताब की तालीफ शुरू की और आखिर जिलहिज्जा सन 1280 हि0 में खत्म हुयी और 1281 हि0 में सब से पहले कुस्तुन्तीनिया में छपी। सदर आजम मौसूफ के हुकम से एक तुर्क आलिम ने अरबी से तुर्की में इस का तर्जुमा किया और ‘‘इबराजुल हक’’ के नाम से मुकम्मल तुर्की तर्जुमा शाय हुआ। नीज यूरोप की मुतअद्दिद जबानों में हकुमत उसमानिया की तरफ से इस के तर्जुमे शाए किये गये पादरियों ने खास अहतमाम व कोशिश से तलफ किया। मिस्र में मुतअद्दिद बार तबा हो चुकी है। मौलवी सलीमुल्लाह साहब मरहूम ने उस का ऊर्दू में तर्जुमा किया जिसके छपने की नौबत न आयी। मौलवी गुलाम मुहम्मद साहब बहांजारांदेरी ने बडी महनत व जानकाही से गुजराती में तर्जुमा किया जो शाए हो चुका है। इजहारूल हक के अंग्रेजी तर्जुमा की इशाअत के बाद ‘‘टाइम्स आॅफ लन्दन’’ ने उस पर तबसरा करते हुये लिखा था कि ‘‘लोग अगर इस किताब को पढ़ते रहेंगे तो दुनिया में मजहब ईसवी की तरक्की बन्द हो जायेगी’’। नवाब हाजी इस्माईल खाँ साहब मरहूम रईस दतावली जिला अलीगढ़ ने मक्का मुअज्जमा में हजरत मौलाना मरहूम को टाईम्स का यह तराशा और इजहारूल हक के मुतआल्लिक उस का मजकूरा बाला रिवियू खास तौर पर दिया था। रद्देनसारा में सिर्फ यही एक किताब ऐेसी है जिस का जवाब या रद्द आज तक मसीही दुनिया न देसकी। ‘‘ताईदुलहक विरहमतिल्लाह’’ इसका तारीखी नाम है। ‘‘इजहारूल हक’’ एक मुकदमा और छः अबवाब पर मुशतमिल है। अबवाब की तफसील जैल में मुलाहिजा होः
1. बाब अव्वल, बयान व तफसील कुतुब एहदे कदीम व जदीद
2. बाब दवुम,बयान व तफसील इसबात तहरीफ इन्जील
3. बाब सेवुम, बयान व तफसील  इसबात नसख इन्जील
4. बाब चहारूम,बयान व तफसील इब्ताले तस्लीस
5. बाब पंजुम, कुरआन का कलामुुल्लाह होना।
6. बाब शशुम, इसबाते नबुव्वत मुहम्मद स0 और पादरियों के ऐतराजात की तरदीद।

Original Title: Izhar ul Haq –

Truth Revealed Maulana M Rahmatullah Kairanvi Volume 4 – Volumes [Hardcover],

  

Ahmed Deedat  took a more active interest in religious debate after he came across the book Izhar ul-Haqq (Truth Revealed),[7] written by Rahmatullah Kairanawi, while he was rummaging for reading material in his employer’s basement.[8] This book chronicled the efforts of Christian missionaries in India a century earlier. The book had a profound effect on Deedat, who bought a Bible and held debates and discussions with trainee missionaries, whose questions he had previously been unable to answer.[1]

2- इजालतुल औहामः  यह किताब 564 सफहात पर सैयदुल मताबे कुचा बुलाकी बेगम देहली मंे सैयद कव्वामुद्दीन साहब के जेरे एहतमाम फारसी में सन 1269 हि0 में बडी तकती पर छपी। रद्दे-नसारा के अकसर मबाहिस का मुसकित जवाब है। इस में पादरी फन्डर के ‘‘मीजानुल हक’’ में ऐतराजात के दन्दान शिकन जवाबात भी हैं।
3-जेद्धइजालतुश्शुकूकः यह किताब ईसाईयों के उन्तालीस सवालो का जवाब है। सन 1268हि0 मुताबिक 1854 ई0 में तस्नीफ हुयी और दो जिलदों में शाए हुयी। इसमें नबुव्वत मुहम्मदी और तहरीफे बाईबिल के मुदल्लल सुबूत हंै। दोनों जिलदें 1116 सफहात पर मुशतमिल हैं इस किताब की सबबे तालीफ के मुताल्लिक हजरत मौलाना मरहूम दीबाचे में तहरीर फरमाते हैंः
‘‘सन 1269 हि0 दो अमर बाइस हुये कि इन (पादरियों के सवालात) का जवाब लिखूँ एक यह कि बाज ईसाईयों ने इन सवालों में इस्लाह देकर और छः सवाल और बढाकर उन को जनाब मुस्तताब मिर्जा मुहम्मद फखरूद्दीन वली अहद बहादुर दामा इजलालुहू की खिदमत बा बरकत में भेजा और जनाब मुफख्खम अलैह ने मुझसे दरखास्त की कि उन का जवाब लिखूँ और उन का अमर मानना पडा’’।
हजरत मौलाना मरहूम के शागिर्द रशीद शमसुल उलमा फाजिल जलील मौलाना अब्दुल वहाब साहब मरहूम वेलोरी बानीये मदरसा बाकियातुस्सलिहात, मद्रास ने अपने एहतमाम और सर्फे से मद्रास में पहली जिल्द छपवाई थी। दुसरी जिल्द मौलाना मौसूफ के खल्फ अरशद मौलाना अबुल फजल जियाउद्दीन मुहम्मद साहब मरहूम मोहतमिम मदरसा ए मजकूर ने अपनी निगरानी में तबा करायी। जिल्द अव्वल और जिल्द दवुम की तस‘ही (संशोधन)  वगेरह खुद शमसुल उलमा मौलाना अब्दुल वहाब साहब ने माहे शाबान सन 1288 हि0 में मुकम्मल फरमाई जिसके मुताबिक दोनों जिल्दे तबा हुईं।
4- एजाजे़ ईसवीः इस किताब में हजरत मौलाना मरहूम ने कामिल तौर पर बाइबिल का गैर मोतबर और मुहर्रफ होना साबित किया है। यह किताब सन 1269हि0 में आगरा में लिखी गयी। पहली बार आगरा में और दूसरी मतर्बा मतबए रिजवी देहली में तबा हुई। दो सौ सफहात पर मुशतमिल है।
5-  अहसनुल अहादीस फी इब्तालित्तस्लीस : दलायल अकलियान नकलिया से तस्लीस को बातिल किया है सन 1271 हि0 में तस्नीफ हुयी और मतबए रिजवी देहली में सन 1292 हि0 में छपी।
6- बुरूके लामिआः रसूले मकबूल की रिसालत का मुदल्लल इस्बात और खातिमुलमुर्सलीन पर खत्मे रिसालत को साबित किया है।(गैर मतबूआ)
7- अलबहसुशरीफ फी इस्बातिन्नस्खे वत्तहरीफ
 सन 1270हि0 में लिखी गयी। तहरीफ इन्जील पर मुहक़िक़ाना बहस है। 56 सफहात और मुतवास्सित तकती पर फख्रूल मताबे देहली में छपी है।
8-डंनककपस म्ूंरंरनस डप्रंद मुअद्दिल अऊजाजुल मीजानः  यह किताब मीजानुल हक- मुअल्लिफा पादरी फंडर का जवाब है रिसाला नूर अफशाँ नम्बर 30 जिल्द 12 मतबूआ 24 जौलाई सन 1884 ई0 में पादरी सफदर अली साहब के मजमून से मालूम होता है कि इस किताब का कलमी नुस्खा उन के पास है।
9-तकलीबुल मताइनः यह किताब ‘‘तहकीके दीने हक’’ मुअल्लिफा पादरी लासमंद का रद्द और जवाब है।(गेैर मतबूआ)
10-मैयारूल तहक़ीक:  किताब ‘‘तहकीकुलईमान’’ मुअल्लिफा पादरी सफदर अली का दन्दान शिकन जवाब है।
इन्कलाब सन 1857ई0
गर्दिशे जमाना से सलतनते मुगलिया का टिमटिमाता हुआ चिराग गुल हुआ। इन्कलाब सन 1857ई0 ने हिन्दुस्तान में अंग्रेजो के इकतदार को तकमील तक तहुँचाया और कम्पनी का मकसदे तिजारत पूरा हुआ। सियासी दुनिया में किसी क़वी और गालिब ने आज तक कमजोर ओैर जेरेदस्त के साथ रहम और शफक़्क़त का बरताव नहीं किया। रोना सिर्फ अपनी गफलत और बदइकबाली का है। इस जमाने के उलमा की एक अमली जमाअत अपने फरज से गाफिल ना थी। एलायेे कलिमतुल्लाह और अहयाऐ सुन्नत के मजहबी जज़्बा और दीनी फरीजे की अदायगी के लिये ये जमाअत मैदान में आयी, अपनी बिसात और हिम्मत के मुताबिक खिदमत का हक अदा किया।
बिना करदन्द खुश रस्मे बखून व खाक गलतीदन
खुदा रहमत कुनर्द इं आशिक़ाने पाक तीनत रा
परगना कैराना व शामली में जमींदारा शयूख़ और मुसलमान गुजरों के हाथ में था जिन में दीनदारी के साथ जोश भी मोजूद था। थानाभवन और कैराना का एक महाज कायम किया गया। मुजाहिदीन की जमाअत मुदाफअत ओैर मुकाबला करती रही। शामली की तहसील पर हमला किया गया परगना के चारों तरफ इस मुजाहिदीना तहरीक का असर आम हो चुका था। थानाभवन  में हजरत हाजी इमदादुल्लाह साहब और मौलवी अब्दुल हकीम साहब थानवी मे् रफका और निवाहे कैराना में हजरत मौलाना मरहूम गोरह फौज का मुकाबला कर रहे थे। मुजाहिदीन कैराना में चूँकि मुसलमान गुजर ज्यादा थे इसलिए इन की कियादत चैधरी अजीमुद्दीन हजरत मौलाना मरहूम के साथ कर रहे थे। (इन्कलाब के बाद चैधरी अजीमुद्दीन मक़्क़ा मुअज्ज़मा हजरत मोैलाना मरहूम के पास आ गये थे और यही इन का इन्तकाल हुआ) उस ज़माने में असर की नमाज के बाद मुजाहिदीन की तनजीम व तरबियत के लिये कैराना की जामा मस्जिद की सीढ़ियेां पर नक्कारे की आवाज पर लोगों को जमा किया जाता और ऐलान होता थाः
मुल्क खुदा का और हुक्म मौलवी रहमतुलाह का
इस जुमले के सिवा और जो कुछ कहना होता था वह अवाम को सुनाया जाता। इस पुरानी आवाज को सुनने वालों में से अब कोई नहीं रहा मगर जिन्होंने अपने बुजुर्गों से इस की सदाये बाजगश्त सुनी है वह अब तक मौजूद हैं। कैराना के महाज पर बजाहिर शकस्त का इमकान न था। मगर बाज अब्नाये वतन की जमाना साजी और मुखबिरों की साजिश ने हालात का रूख बदल दिया। कैराना मेें गोरा फौज और तोपखाना दाखिल हुआ। मौहल्ला दरबार के दरवाजे के सामने तोप खाना नसब किया गया और गोरा फौज ने मौहल्ला दरबार का महासरा किया। हर घर की तलाशी ली गयी। औरतों और बच्चों और हर शख्स को फरदन फरदन दरबार से बाहर निकाला गया। इसलिये कि मुखबिर ने इत्तला दी थी की मौलाना दरबार मंे रूपोश हैं। कैराना के करीब ‘‘पन्जीठ’’ मुसलमान गुजरों का एक गाँव है जहाँ हजरत मौलाना मरहूम अपनी बाकी माँदा जमात के साथ पहुँचे। खुद ‘‘पन्जीठ’’ के लोग भी मुजाहिदीन में शरीक थे। इसी दौरान में गोरा फोज के एक घोडे सवार दस्ते ने पन्जीठ का रूख किया। कैराना और कुर्बवजवार के तमाम हालात की इत्तला हजरत मौलाना मरहूम को मिलती रहती थी। पन्जीठ के मुखिया को जब फौज का आना मालूम हुआ तो उस ने जमात को मुन्तशिर कर दिया और हजरत मौलाना मरहूम से ख्वाहिश की कि खुरपा लेकर खेत में घास काटने चले जायें। गौरा फौज उसी खेत की पगडण्डी से गुजरी। हजरत मौलाना मरहूम फरमाया करते थे कि ‘‘मैं घास काट रहा था और घोडों की टापों से जो कंकरियाँ उडती थी वह मेरे जिस्म पर लग रही थीं और में उन को अपने पास से गुजरता हुआ देख रहा था’’।
गौरा फौज ने गाँव का मुहासरा किया। मुखिया को गिरफ्तार कर लिया गया। पूरे गाँव की तलाशी ली गयी मगर हजरत मौलाना मरहूम का पता ना चला मजबूरन यह फौजी दस्ता कैराना वापिस हुआ। हालात पर काबू पालिया गया और हजरत मौलाना मरहूम के खिलाफ फौजदारी मुकदमा चलाया गया। और वारन्ट जारी हुआ आप को मफरूर व बागी करार देकर गिरफ्तारी के लिये एक हजार रूपये के इनाम का ऐलान हुआ। हजरत मौलाना मरहूम अपना नाम ‘‘मसलहुद्दीन’’ बदलकर पैदल देहली रवाना हुये। आपके लिये यह सख्त आजमाईश का वक्त था। ईमानी अज्म, हिम्मत और सब्र और इस्तकलाल के साथ जयपुर और जोधपुर के मुहीब रेगिस्तानी जंगलों और खतरनाक रास्तों को पा प्यादा तय करते हुये सूरत पहुँचे। बन्दरगाह सूरत से भी जहाज का सफर आसान ना था। बादबानी जहाज चला करते थे। साल भर में सिर्फ एक जहाज हवा की मवाफकत के जमाने में सूरत से रवाना होता और इसी तरह जद्दे से आया करता था। एक खत का महसूल चार रूपये था। जो लोग हिजरत के इरादे से तर्के वतन करते वह साथ ही दुन्यावी ताल्लुकात और बाहमी अलाईक को जिन्दगी ही में खत्म कर दिया करते थे।
हजरत मौलाना मरहूम की रवान्गी और फौजदारी मुकदमे के बाद आप की और आपके खानदान की जायदाद जब्त होकर नीलाम हुयी। खास तौर पर पानीपत में मुखबिर ‘‘कमालुद्दीन’’ की शनाख्त पर जो जायदाद कुर्क करके नीलाम की गयी उसका मुख्तसर बयान दर्ज जे़ल है। नीलाम जायदाद का फैसला डिप्टी कमिशनर करनाल ने 30 जनवरी 1862 ई0 में किया।
1- सराय खजूर इसकी कीमत सरकारी तोैर पर डिप्टी कमिशनर करनाल के कागजात में पाँच सौ रूपया है।
2- सराय चैढे  3- सराय शेख फज्ल इलाही
4- सराय कस्साबान
5- सराय लोह आबाद
6- सराय मालियान
यह सब सरायें और वसी कतआत जमीन और मकानात एक हजार चार सौ बीस रूपये में नीलाम हुईं। जिनकी लाखों रूपये कीमत थी। मजरूआ इलाके और जराअती जमीनें इस सकनाई जायदाद के अलावा हैं जो बहक्के सरकार जब्त हुईं। मज़कूराबाला सराये जिस कीमत पर नीलाम हुईं वह भी मुलाहिजा होः
सराये खजूर 42 रूपये, सराये लोहाबाद 15 रूपये, सराये चैढे 56 रूपये, सराये कस्साबान 14 रूपये।
कागजात जायदाद नीलाम शुदा में इन्डकस मशमूला का यह उनवान है:
‘‘इन्डकस मशमूला मिस्ल फौजदारी मुकदमये अर्जी कमालुद्दीन साकिन कैराना हाल पानीपत मौलवी रहमतुल्लाह बागी’’।
रहमतुल्लाह बेतुल्लाह  में
तवील सफर के आलम और मसाइब को बरदाशत करता हुआ यह सरवकफ मुजाहिदे इस्लाम, मर्कजे इस्लाम में पहुॅँचा ताकि काबे के जेरे साया खिदमते इस्लाम का कोई पहलू निकाल सके। हिन्दुस्तान में इस अमली जमात के अकसर अफराद ने मक्का मुअज्ज़मा का रूख किया। हजरत हाजी इमदादुल्लाह साहब मरहूम, हजरत मौलाना रहमतुल्लाह से कुछ पहले मक्का मुअज़्ज़मा पहुँच चुके थे और रबात दाऊदिया में (जो कि बाबुल उमरा से मुत्तसिल है) के एक हुजरे में मुकीम थे। सुबह सादिक के करीब हजरत मौलाना मरहूम मक्का मुअज़्ज़मा पहुँचे, मताफ़ में हजरत हाजी साहब से मुलाकात हुई, तवाफे कुदूम और सई में हजरत हाजी साहब मरहूम साथ रहे उस के बाद दोनों रबात दाऊदिया में आये। उस जामने में सैयद अहमद दहलान ‘‘शेखुल उलमा’’ थे और मस्जिदे हरम में आप का हलकाए दर्स मरजए आम था। शरीफ अब्दुल्लाह इब्ने ओन इब्ने मुहम्मद ‘‘अमीरे मक्का’’ थे। सुलतान अब्दुल अजीज खाँ का दौरे खिलाफत था। हजरत मोैलाना मरहूम ने हालात का जायज़ा लिया और उलमाए मस्जिदे हरम से ताअल्लुकात पैदा हुये। सैयद अहमद दहलान के दर्स को अकसर सुनने का मौक़ा मिलता। मौसूफ चूँकि शाफीयुल मज़हब थे इसलिये एक रोज दौराने तक़रीर में किसी मसअले पर बहस करते हुये अपने मज़हब की तरजीह के साथ अहनाफ के दलाईल को कमजोर साबित करने की कौशिश की। दर्स खत्म होने के बाद हजरत मौलाना मरहूम ने सैयद अहम दहलान से पहली मर्तबा मुलाकात की और इस मसअले के मुतअल्लिक एक तालिबइल्म की हैसियत से अपनी तशफ्फी चाही। थोडी देर के सवाल व जवाब से और इल्मी गुफतगू से सैयद अहमद दहलान को इसका अन्दाजा हो गया कि यह शख्स तालिबइल्म नहीं। हक़ीक़त हाल दर्याफ्त की, हजरत मौलाना मरहूम ने इख्तसार के साथ कुछ हालात ब्यान किये। दूसरे दिन अपने घर में दावत के लिये हजरत मौलाना मरहूम से फरमाया। आप अपने रफीक अजीज हजरत हाजी साहब मरहूम के साथ सैयद साहब के दौलत खाने पर तशरीफ ले गये। इस मजलिस में हजरत मौलाना मरहूम ने इन्कलाब सन 1857ई0 के तमाम हालात और खास तौर पर नसारा की मजहबी कोशिशों और रद्दे नसारा में मुसलमानों की अजीमुश्शान कामयाबी की तफसील बयान की। जिससे बेहद मसरर्त का इजहार फरमाया और हजरत मौलाना मरहूम से देर तक बगलगीर हुये। इसी मजलिस में हजरत मौलाना मरहूम को मस्जिद हरम में दर्स की बाकायदा इजाजत दी और उलमाए मस्जिद हरम के दफतर में आप का नाम दर्ज किया।
कुस्तुन्तीनिया से सुलतान अब्दुल अजीज खाँ मरहूम का फरमान अमीरे मक्का शरीफ अब्दुल्लाह पाशा के नाम आया कि ‘‘हज के जमाने मंें हिन्दुस्तान से जो उलमा व बाखबर असहाब आये हैं उनसे पादरी फन्डर के मुनाजिरे और इन्कलाब सन 57ई0 के खास हालात मालूम करके बाबे खिलाफत को मुत्तले किया जाये’’। अमीर मक्का ने शेखुल उलमा सैयद अहमद दहलान से इस फरमान का तजकिरा किया। मौसूफ ने फरमाया कि ‘‘जिस आलिम से यह मुनाजिरा हुआ है वह खुद यहाँ मौजूद है’’। अमीरे मक्का के हुक्म से दूसरे दिन हजरत मौलाना रह0 शेखुल उलमा के साथ अमीरे मक्का की खिदमत में हाजिर हुये। सुलतान को हालात से मुत्तेले किया गया और कुस्तुन्तीनिया से सुलतान की तलबी और हुकुम पर अमीरे मक्का ने हजरत मौलाना मरहूम को सन 1280हि0 मुताबिक 1864ई0 में शाही मेहमान की हैसियत से रवाना किया।
इन्कलाब 57ई0 के बाद पादरी फन्डर जर्मनी स्विटजरलैण्ड और इंगलिस्तान में रहा, चर्च मशीनरी सोसाईटी लन्दन ने इसको कुस्तुन्तीनिया भेजा ताके वहाँ काम करे। पादरी फन्डर अपनी शर अन्गेज तबीयत से मजबूर था। दौलत उस्मानिया में फन्डर और उसकी जमात में यह मशहूर करा दिया था कि हिन्दुस्तान में ईसाईयत की फतेह और इस्लाम को शकिस्त हो चुकी है और उलमाए इस्लाम ला जवाब हो चुके हैं। हिन्दुस्तान के मुसलमान मसीहीयत को कुबूल कर रहे हैं। इस खबर से भी सुल्तान बहुत मुतशवविश थे। हजरत मौलाना मरहूम की आमदे कुस्तुन्तीनिया की खबर सुनकर पादरी फन्डर कुस्तुन्तीनिया से रूपोश हुआ। सुलतान ने एक मजलिस-ए-उलमा मुनअकिद की जिस में वुजराए सलतनत के अलावा अहले इल्म अस्हाब को मदऊ किया और हजरत मौलाना मरहूम से हिन्दुस्तान में मजहबे ईसवी की शकिस्त और इन्कलाब 57ई0 के हालात सुने। दौलते उस्मानिया में इस फितने व फसाद को रोकने के लिये हकुमत ने मसीही मुबल्लिगीन को कैद किया। उनकी किताबों पर पाबन्दिया लगाई गईं और सख्त अहकामात जारी किये गयें।
अकसर नमाजे इशा के बाद सुलतान बकमाले इलतफात शाहाना हजरत मौलाना मरहूम को शर्फे बारयाबी अता फरमाते थे। उस वक्त खैरूद्दीन पाशातोन्सी सदरे आजम और शेखुलइस्लाम वगैरह भी शरीक मजलिस होते। सुलतान अब्दुलअजीज खाँ मरहूम ने हजरत मौलाना मरहूम की जलीलुलकदर दीनी मुजाहिदाना खिदमात की कदरअफजाई फरमाई। जर्रीन खिलअत के साथ तमगयेे मजीदी दरजा दोयम और ग्राँकदर वजीफऐ माहाना से सरफराज फरमाया।
सुलतान की ख्वाहिश और खैरूद्दीन पाशा की तहरीक पर माहे रजब 1280 हिजरी में हजरत मोैलाना मरहूम ने ‘‘इजहारूलहक‘‘ लिखनी शुरू की, और आखिर जिलहिज्जा सन मजकूर में छः माह के अन्दर तैयार करके सुल्तान की खिदमत में  पैश की। खैरूद्दीन पाशा ने हजरत मौलाना मरहूम से फरमाया कि अमीरूल मोमिनीन की खवाहिश पर आप ने ये किताब लिखी मगर उसके मुकद्दमे में आप ने मक़्क़ा मुअज़्ज़मा के शेखुलउलमा का जिक्र किया है हालाँकि अमीरूल मोमिनीन का नाम आना चाहिये था। हजरत मौलाना मरहूम ने फरमाया कि
‘‘इस खालिस मजहबी खिदमत में किसी दुनियावी गरज़ और मक्सद का कोई शाइबा न आना चाहिये। इसके अलावा मक्का मुअज्जिमा में खुद शेखुलउलमा मुझ से इन हालात के कलमबन्द करने की खाहिश कर चुके थे और इब्तिदायी मवाद की तरतीब का काम भी शुरू कर दिया था। दूसरी वजह यह है कि इस किताब की तालीफ का असल सबब शेखुलउलमा हैं। किसी वजह से अगर वह मुझे अमीरे मक़्क़ा तक न पहुंचाते तो मेरी रसाई यहां तक न होती और इस खिदमत का मौक़ा न मिलता।‘‘
मौलाना की इन वजूहात को बनजरे इस्तेहसान और कदर शनासी देखा गया।
मौलाना मरहूम के अरसए क्याम कुस्तुन्तीनिया में अक्सर उलमा और मुख्तलिफ मजा़क और ख्याल के अहले इल्म वगैरह अस्हाब शाही मेहमान खाने में आते थे। मुख्तलिफ मजहबी मसाइल पर तब्सरा और तबादलाऐ ख्याल होता था युरोप की तालीम और नई रोशनी का असर यहाँ तक पहुँच चुका था इसलिये हजरत मौलाना मरहूम ने जरूरत का एहसास करते हुये बेसत व नबुव्वत और हशर, नशर नुजूले वही वगैरह उमूर को अक्ली दलाइल से साबित किया और ‘‘तन्बीहात‘‘ के नाम से इन अमूर पर एक रिसाला लिखा जिस की तालीफ से जमादिउस्सानी 1281 हिजरी में फारिग हुये। यह रिसाला खैरूद्दीन पाशातोन्सी सदरे आजम के हुकुम से तबा हुआ। मिस्र में ‘‘इज़्हारूलहक’’ के बाज मतबूआ नुस्खों के हाशिये पर यह रिसाला छपा हुआ है।
कुस्तुन्तीनिया से वापसी के बाद मस्जिद हरम में दर्स व तदरीस का सिलसिला जारी रहा सबसे पहले हजरत मौलाना मरहूम ने माकूल से तलबा को रूशनास कराया और खास तौर पर रियाजी में हेअत की तदरीस शुरू की। जो हजाज़ में तालीमी हैसियत से गैर मारूफ था। इल्मे सर्फ मुस्तकिल तौर पर दाखिले दर्स न था बल्कि नहू के साथ इल्मे सर्फ की इब्तिदाई मालूमात पढाई जाती थी। हजरत मौलाना मरहूम ने सर्फ की तालीम को नहू से अलग किया। इसी के साथ यहां के तरीका-ए-दर्स व तदरीस और मकामी अहम जरूरतों पर काफी गौर के बाद यह राए कायम की कि यहां एक ऐसे दारूलउलूम का सन्गेबुनियाद रखा जाए जो मरकजियत के शायाने शान हो। दुनिया की मुख्तलिफ जुबानें जानने वाले उलमा मुदर्रिस हांे और ऐसा निसाबे तालीम राइज किया जाये जो दीनी और दुनियावी जरूरियात का मुतकफिफल हो। अगरचे सलतनते उस्मानिया इन उलमाए हरम और बाकमाल अफराद की हौसला अफजाई में लाखों रूपये बेदरेग सर्फ कर रही थी जो मस्जिदे हरम में दर्स व तदरीस में मशगूल थे मगर उस में जो नकाइस पाये जाते थे वह हस्बे जे़ल हैंः
1. वह उलमा अपने दर्स व तदरीस को किसी निजाम और काम को जा़बते की मातेहती मेें अन्जाम नहीं दे रहे थे।
2. कोई मखसूस निसाबे तालीम राइज व मुकरर्र न था। और जो कुछ पढ़ाया जाता था वह तलबा में किसी किस्म की काबलियत व इस्तिदाद पैदा नहीं कर सकता था।
3. तरीकाए तालीम निहायत अब्तर हालात में था और सबसे बडा नुक्स यह था कि किताब की इबारत को खुद उस्ताद पढता और खुद ही मतलब ब्यान करता। शागिर्द उसे उस्ताद का एक वाज समझते और अपने दिमाग पर जोर डालने के आदी ना थे। उस्ताद से सवाल करना या नफ़से मस्अले पर ऐतराज पैदा करना मा‘यूब समझा जाता था। समझने या तोजीह के लिये इस्तिफ्सार बेअदबी में दाखिल था।
4. जो उलूम पढाए जाते थे। उनमें नहू व फिकह, तफसीर, हदीस पर तमाम उमर खतम होने के बावजूद तक्मील या आला काबलियत पैदा नहीं होती थी। तफसीर जलालेन जो आमतौर पर हिन्दुस्तान में साल भर में पढाई जाती थी उस वक्त सात साल में खत्म हुआ करती थी। बाकी उलूम के पढने, फनून के हासिल करने का रुजहान और शौक ना था और ना तबहहूर और इस्तिेदाद के साथ पढाने की हिम्मत थी।
5. इन मुहाजरीन की औलाद के लिये जो मुमालिक इस्लामिया से हिजरत करके आते हैं किसी किस्म की तालीम तरबियत का कोई इन्तजाम ना था। उनकी औलाद गैर तरबियत याफ्ता और जिहालत व बदअख्लाकी का शिकार थी। ना वह दुनिया के किसी काम की थी और ना वह दीन के।
6. मक्का मुअजि़्ज़़मा को सरचश्मा-ए-दीन और मर्कजे इस्लाम ख्याल करके हर साल इस्लामी दुनिया के दूरदराज मकामात से बडी तादाद में मतलाश्यिाने उलूमे दीनिया इस शौक में आते थे के इस चश्मे से सेराब हों मगर उस जमाने में यहां उन तलबा की तालीम का कोई इन्तजाम था और ना क्याम, तआम और दीगर जरूरियाते तालीम की कोई सूरत थी।
इन तमाम हालात और गिरदोपेश की जरूरतों पर काफी गौर करने के बाद यह पहला शख्स था जिसने अहले हरम और शाईकीने उलूम दीनया की जरूरत का एहसास किया और अपने हकीमाना दिमाग से यह बात पैदा की कि हजरत अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास रजि0 की मिटी हुई दरस्गाह का जमीने हरम पर एहया किया जाए। मुहाजरीन की औलाद और अहले अरब के बच्चों की तालीम और तरबियत के इन्तिजाम के साथ सन्अत और दस्तकारी सिखाने के लिये एक बाकाइदा सन्अती स्कूल भी आला पैमाने पर कायम किया जाए। ताके अहले हजाज़ और इन मुहाजरीने हरम की औलाद जरूरी और इब्तिदाई तालीम के बाद गदागिरी और इफलास का शिकार होकर नन्गे इस्लाम न बनें।
हजरत मौलाना मरहूम मक्का मुअज्जिमा के हिन्दुस्तानी मुहाजरीन और अहले खैर अस्हाब को इस अहम जरूरत की तरफ मुतवज्जेह फरमाते रहे। इस सिलसिले में मुताअद्दिद इज्तिमाआत हुुए और यह ते पाया कि नवाब फैज अहमद खाँ साहब मरहूम रईस जिला अलीगढ़ जो इस जमाने के तब्काए मुहाजरीन में दुनियावी वजाहात के लिहाज़ से मुमताज थे, उनके जाती और मस्कूना मकान के एक हिस्से में मदरसा की इब्तिदा की जाये और मुमताज हिन्दुस्तानी मुहाजरीन की हमदर्दी और अम्ली शिर्कत इस कारे खैर को हासिल रहे। मक्का मुअज्जमा के इस सब से पहले मदरसे की सबसे पहली तारीखी और बुनियादी अपील दर्ज जै़ल हैः
‘‘हम्द और नात के बाद अर्ज यह है कि अक्सर हिन्दियांें अहले तोफीक की हिम्मत से हरमैन शरीफैन ज़ादा हुमल्लाहु शर्फन में बाजे बाजे खैर के काम जैसे रूुबातें और सबीलें तैयार हो गयी है। पर अब तक कोई मदरसा उनकी तरफ से यहाँ नहीं है। हालाँके और कामों से यह काम भी बडा खैर का काम हैं। इसलिये यह अर्ज है कि जो इस अमर में शरीक हों वह अपना नाम मा उस रक़्म के जो उन्हें माहाना देना मन्जूर हो, लिख दें और थोडे का ख्याल न करें कि थोडा थोडा इकटठा हो के बहुत हो जाता है। और इस मदरसे की तदरीस के और खर्च के कवाइद उन लोगों की राय से मुकर्रर होंगे जो इस अमर के लिये बामश्वरा मुकर्रर किये जाऐंगें। फक्त।
अलमरकूम यकुम माह रमजानुल मुबारक
 1290 हिजरी कुदसी।
मुहम्मद हुसैन शेखुल मुतव्विफीन हिन्द, 3 रूपये माहाना
रहमतुल्लाह, 2 रूपये माहाना
मुहम्मद अहसान,  2 रूपये माहाना
इरादत हुसैन, 1 रूपये माहाना
अहमद हसन, 25 रूपये सालाना
जाफर हुसैन ताकियाम मक्का से  3 रूपये महाना
मियाँ अब्दुलकरीम,  3 कुर्श माहाना
हाफिज अब्दुल्लाह, साढे  तीन कुर्श
जैनुल आबिदीन, 20 दीवानी
मुहम्मद फैज अहमद खाँ, 5 रूपये माहाना
मुहम्मद फजलुल्लाह अफी अन्हु, आठ आने माहाना
मुहम्मद जीवन, 1 रूपये, महाना
मियाँ जान, आठ आने, महाना
अब्दुर्रहीम अत्तार ,चार आनेे, महाना
इनायतुल्लाह, साढे तीन कुर्श, महाना
अब्दुर्रहीम अत्तार,पाव मजीदी, माहाना
अब्दुलवहाब, 2 रूपये माहाना
इस्माईल, 2 कुर्श, माहाना
अब्दुलकादिर शेखुलमुतवफ्फीन बन्गाला, 1 रू0, माहाना
अब्दुल अजीज अफीयुल्लाह अन्हु, 1 रू0, माहाना
अब्दुर्रहमान अत्तार बंगाली, रूबु रबिया,माहाना
जान मुहम्मद मेमन, पाव रियाल,माहाना
हाफिज कादिर बख्श,(ताक्याम मक्का मुअज्जमा)रूबु  मजीदी, माहाना
निजाम अली चाए फरोश, रूबु रियाल, माहाना
अमीर अली, चार आनेे, माहाना
अब्दुलजब्बार नबीरह शाह अब्दुस्सत्तार, 4 कुर्श, माहाना
मुहम्मद अहसनुद्दीन, रूबु रियाल
मुन्शी अजीजुर्रहमान, 3 कुर्श, माहाना
अब्दुलहक कातिब बंगाली, 3 कुर्श, माहाना
अब्दुल्लाह मुजल्लिद, निस्फ रबिया, माहाना
फिदा मुहम्मद, 1 रूपय, माहाना
शैर मुहम्मद खाँ, 4 कुर्श, माहाना
मियाँ कासिम, 3 कुर्श, माहाना
कम्तरीन अली जान अफीयल्लाह अन्हु, रूबु रियाल, माहाना
अब्दुर्रहमान खूरदह फरोश, 2 कुर्श, माहाना
दाऊद मुल्ला कोकनी, रूबु  मजीदी, माहाना
कमालुद्दीन, 1 रूपया, माहाना
अब्दुलवहाब, रूबु  मजीदी, माहाना
हकीम महबूब अली, आठ आने, माहाना
इब्राहीम अली, आठ आनेे, माहाना
मौ0 नजीर, 3 कुर्श, माहाना
अब्दुल हमीद, 3 कुर्श, माहाना
हाफिज अब्दुल हकीम मशहूर पहलवान, रूबु रियाल, माहाना
हकीम अब्दुल अजीज, 3 कुर्श, माहाना
फिदवी मुहम्मद आजम, नीम कुर्श, माहाना
अली बख्श समकरी, 3 कुर्श, माहाना
कुदरतुल्लाह, चार आनेे, माहाना
गाजी चार आने, माहाना
अब्दुल्लाह गुर फरोश, 1 इश्रीन
सय्यद अब्दुल अली, रूबु रियाल, माहाना
महताब बैग, 1 रू0, माहाना
मुन्शी नज्मुद्दीन, आठ आनेे, माहाना
मुहम्मद कामिल मुताव्विफ 1 रू0, माहाना
मुहम्मद इब्राहीम, चार आने , माहाना
अमीर हाजी, चार आने, महाना
अब्दुलकरीम, चार आने , माहाना
हाजी मुहम्मद, 1 रू0, माहाना
अब्दुर्रहमान खय्यात रूबु मजीदी, माहाना
मौलवी खलीलुर्रहमान, चार आने
लाल मुहम्मद सब्बाग, रूबु मजीदी
अब्बास खाँ, रूबु मजीदी
फकीर इमदादुल्लाह चिश्ती, 1 रू0 हत्तुलमकदूर
सय्यद हसन अली ज़मज़मी,  1 रू0
मुहम्मद इस्माईल इब्ने हकीम मुल्ला नवाब, 3 कुर्श
इब्राहीम इब्ने हुसैन मताले, 2 रू0, माहाना
शेख फरीद, चार आने
जोर आवर खाँ, 1 कुर्श
शेख रमजानी मुजेयिन, 3 कुर्श
अब्बास खाँ सबही, साढे तीन कुर्श
हाफिज अब्दुल गफूर खैयात, 4 कुर्श
अब्दुल्लाह इस्माईल सिन्धी, रूबा रियाल
ईसा और हमजा, लिलआ रियाल यक मुश्त
मुसम्मात सकीना, 1 कुर्श माहाना
मीर इमदाद अली कमीसी युल कादिरी,  1 रू0, माहाना
मुल्ला मुहम्मद नवाब,  1 रू0
अब्दुस्समद कुतुबी, चार आने माहवार
जेनब मारफत सकीना, एक कुर्श
वजीरन मारफत सकीना, एक इशरीन
शब्बो मारफत सकीना, एक इशरीन
जियाउद्दीन बंगाली, रूबा मजीदी
जोजा जियाउद्दीन मजकूर, 2 कुर्श
नानी मौलवी मुहम्मद इस्माईल, 3 कुर्श
हाफिज अब्दुल्लाह नाबीना मुदर्रिसे दोयम, 1 कुर्श
हाफिज असदुल्लाह मुतव्विफ, चार आने
अली पन्जाबी, चार आने
काजिम अली खाँ, 2 कुर्श
अब्दुल्ला मस्तान, 2 आने
नूरन बीबी, 2 आने
अली इब्ने अब्दुल्लाह सिंधी,  5 34 कुर्श
अहमद बिन अब्दुल खालिक सिंधी, 5 34 कुर्श
इब्राहीम बिन कासिम सिंधी,  5 34 कुर्श
अब्दुल मौला खैयात सिंधी,  3 कुर्श
हाजी मुकीम बिन अल्ला रक्खा सिंधी, 3 कुर्श
मुहम्मद हुसैन,  6 रू0 सालाना
गामा बिसाती, चार आने
मुहम्मद खलील अहमद खाँ, एक कुर्श
मौलवी अब्दुल खालिक अत्तार बंगाली,  रूबु मजीदी
नूर मुहम्मद मुजल्लिद, 3 कुर्श
मौलवी अब्दुस्सलाम, निस्फ रूपया
बीबी शहर बानो, एक रूपया अज यकुम शव्वाल
जोजा जनाब शाह इमदादुल्लाह, 2 कुर्श
मुहम्मद जान, 2 आने जिलहिज्जा से
अब्दुल करीम बंगाली, 2 आने जिलहिज्जा से
हाजी शरीअतुल्लाह, 2 आने जिल हिज्जा से
मुहम्मद नासिर बंगाली, 2 कुर्श यकुम जीकादा से
मुन्शी जफरूल्लाह साहब, 1 रू0
मुन्शी मुमताज अली,  2मुहर्रम से 1 रू0
मुन्शी नवाजिश हुसैन,  यकुम मुहर्रम से  5 रू0
मियाँ मुहम्मद अली, 2 कुर्श
मुहम्मद जावा खैयात, रूबु रियाल
मकसूद अली, 3 आने
मौलवी रहमअली, 1 रू0
मुहम्मद उसमान नज्जार, 3 कुर्श
अहमद कन्सार, 1 रू0
मुहम्मद खाँ सब्बाग, 1 रू0
सौलतुन्निसा बेगम
मौसम हज 1290 ई0 में कलकत्ते की एक ऊलुलअजम और मुखैयर खातून सौलतुन्निसा बेगम साहिबा अपनी लडकी और दामाद के साथ हज के लिये आईं। हर नेक दिल और साहिबे इस्तताअत मुसलमान की दिली ख्वाहिश होती है कि वह हरमैन शरीफैन में कोई नेक काम और सदकाए जारीया कायम कर जाये। सौलतुन्निसा साहिबा मरहूमा भी मक्का मुअज्जमा में एक रिबात (मुसाफिर खाना) बनाने का बेहतर जज़्बा अपने साथ लायीं। मौसूफा के दामाद अकसर मसाजिदे हरम में हजरत मौलाना मरहूम के हलकायेदर्स में शरीक होते। मशवरे के तौर पर उन्होंने अपनी खुशदामन के मुबारक इरादे का जिक्र किया। हजरत मौलाना मरहूम ने फरमाया कि ‘‘मक्का मुअज्जमा और मदीना मुनव्वरा में रिबातों और मुसाफिर खानों की कमी नहीं सबसे ज्यादा जरूरत एक मदरसे की है। मक्का मुअज्जमा में कोई मुस्तकिल मदरसा नहीं’’। सौलतुन्निसा बेगम साहिबा दूसरे दिन हजरत मौलाना मरहूम की खिदमत में हाजिर हुयीं और इस राय को इन्तहाई मुसर्रत के साथ पसन्द करते हुये मदरसे के लिये जमीन वगेरह के मुताल्लिक गुफतगू की। अल्लाह ताअला को यह अजीमुश्शान कारेखेैर इस बुलन्द हिम्मत खातून से लेना था। मौहल्ला खन्दरीसा में जगह खरीदी गयी। और मदरसे की ता‘मीर शुरू हो गयी। अक्सर सौलतुन्निसा साहिबा मरहूमा खुद ता‘मीर का काम देखने के लिये तशरीफ लातीं और अपनी खुशकिस्मती और इस तोफीके खिदमत पर अल्लाह तआला का शुक्र अदा करतीं। मदरसे के सबसे पहले रजिस्टर की इब्तदाई इबारत जो हजरत मौलाना मरहूम के कलम मुबारक की है नकल जैल हैः
‘‘हम्द और नअत के बाद यह है कि अगरचे मदरसा हिन्दीया हजरात अहले हिन्द की हिम्मत और तवज्जह से मक्का मुअज्जमा अदामल्लाहु शर्रफहा में सन 1290 रमजान के महीने में कायम हुआ था। पर असबाब चन्द दर चन्द से जो इस सन के चार महीनों में कई तरह के हरज पेश आये, सो इस लिहाज से हम उन चार महीनों को नजर से गिरा के इस मदरसे के कियाम को मुहर्रमुलहराम बारह सौ इक्यानवे (1291) गिनते हैं। और सब अमूर मुतअल्लिका इस मदरसा को इसी साल से लेते हैं। अल्लाह खैर से इन अमूर को अनजाम दीज्यो। बिमन्नही व करमिही।
12 शाबान सन 1291 हि0 रोज चहार शंबा (बुध) में मदरसा सौलतिया जदीदा में सब मदरसों और तालिबइल्मों को लाया गया। यकुम शाबान सन 1292 हि0 से नवाब महमूद अली खाँ बहादुर वाली छतारी ने सौ रूपये माहवार इस मदरसे के मुकर्रर कर दिये ‘‘।
अजल से इल्म इलाही मे यह सआदत और फखर इस बेवा खातून के हिस्सा में था इस लिये हजरत मौलाना मरहूम ने इन के इस ईसार की बेहतर यादगार के तौर पर मरकजे इस्लाम के इस अव्वलीन इल्मी बिना का नाम
‘‘मदरसा सौलतिया’‘
रखा जो कयामत तक इस के नाम को इज्जत और सच्ची नामवरी के साथ ज़िन्दा रखेगा।
हजरत बानीये मदरसा सौलतिया को इब्तिदा में अलावा उन मुश्किलात के जो इस किस्म के कामों में हर एक काम करने वाले को पेश आती हंै, दो नये अमर सद्देराह हुये जिनका वहम और गुमान भी हजरत बानीये मदरसा को ना थाः
1. अंग्रेजी कोन्सिल मुतअय्यिना जद्दाह को यह ख्याल और वहम परेशान करता रहा कि हजरत मौलाना मरहूम इस दर्सगाह के पसेपर्दा अंग्रेजो के खिलाफ परोपेगण्डा और कोई बागयाना साजिश ना करते हों। इसलिये कि हजरत मौलाना मरहूम पर 1857 ई0 के इन्कलाब में गैर वफादारी का इल्जाम लगाया गया था। इस वजह से मदरसे के क्याम में उसने हर मुमकिन रुकावट पैदा करने में दरेग़ न किया।
2. हज्जाज़ के मकामी तुर्क हुक्काम को यह अन्देशा दामनगीर रहा कि जमीने हरम पर मदरसे की इब्तिदा हिन्दुस्तान के मुसलमानों की कोशिश से हो रही है। ऐसा न हो कि यह दर्सगाह आईन्दा बेरूनी इक्तिदार और अगयार की मुदाखलत का किसी वक्त में ज़र्या बन जाये। इस में शक नहीं कि तुर्कों की बदगुमानी एक हद तक दुरूस्त थी क्योंकि वह अपने मुल्क में मिशन और पादरीयों के खैराती और रिफाहे आम के कामों का तल्ख तजुर्बा उठा चुके थे। बावजूद इन तमाम मुिश्कलात और जबरदस्त मुखालफत के बानिये मदरसे के हिम्मत और पामर्दी को हाथ से ना दिया और उनका मुकाबला किया।
ताजीरे जुर्मे इश्क है बे सर्फा मोहतसिब
बढता है और जोके गुनह याँ सजा के बाद
कुछ जमाने के बाद हकीकते हाल और असलियत की रोशनी में तमाम शक और शुब्हात के बादल छट गये और मौलाना मरहूम ने खुलूस व ल्लिाहियत और इस्तिकलाल की बदौलत आईन्दा के लिये रास्ता साफ कर लिया।
मदरसे के अगराज व मकासिद
सतूरे बाला से मालूम हो चुका है। कि आज से अस्सी साल कब्ल मक्का मुअज्जमा की तालीमी हालत और दर्स और तदरीस की रफ़्तार किस कदर महदूद थी। हजरत मौलाना मरहूम ने अपनी खुदादाद दूर अन्देशी और हस्सास दिल और दिमाग से मदरसे के क्याम के बाद जो लायेअह अमल मुरत्तब फरमाया इस में इन तीन अहम अगराज को मक्सदे अव्वलीन बताया हैः
1. इस्लामी दुनिया से मक्का मुअज्जमा में हर साल शाइकीने उलूमे दीनिया की एक जमात इस जज्बे और वलवले के साथ आती है कि इस्लाम के दीनी मर्कज में तालीम हासिल करे और इस्लामी तेहजीब और मुआशरत का गेहरा मुतालआ करने का करीब से मौका मिले। इन आफाकी तलबा की तालीम और क्याम व तआम का एहतमाम और हत्तुल इमकान उन की जरूरीयात का लिहाज़ रखना मदरसे का अहम फर्ज है।
2. मुहाजरीने हरम की औलाद की तालीम व तर्बियत का इन्तजाम करना ताके आवारागर्दी जिहालत और बद अख्लाकी के शिकार ना हों और तालीम और तर्बियत के साथ उन को शरीफ पेशे सिखाए जाऐं ताके गदागरी और फिक़्र और तन्गदस्ती की मुसीबत से उनको निजात मिले और खुदा के घर में दूसरों के दस्तनगर ना रहें।
3. हिन्दुस्तान (क़दीम) में कुरआन पाक की सही किराअत की इशाअत और इस ऐतराज को उठाना कि हिन्दुस्तानी हुफ्फाज कलामुल्लह को गलत पढते हैं। मिस्र और हजाज़ वगैरह मुमालिके इस्लामिया के कुर्रा और हुफ्फाज की हिन्दुस्तानियों पर यह नुक्ता चीनी बेजा नहीं। इस के इजाले के लिये हर मुमकिन कोशिश करना।
मदरसा सौलतिया का मसलक
अगराज व मकासिद के साथ हजरत बानीये मदरसा रहमतुल्लाह अलैहे ने अपनी ईमानी फ्रासत और गिर्द व पेश के तमाम हालात का गहरा मुतालआ करने के बाद इस इरफानी मरकज के लिये कुछ जरूरी और अहम हिदायात मुरत्तब फरमाईं। इन में बिलखुसूस इन तीन उमूर पर ज्यादा इसरार के साथ पाबन्दी की ताकीद फरमाई।
1. कतई तौर पर सियासियात और सियासी दिलचस्पियों से हर कारकुन व मुदर्रिस और तालिबेइल्म को बे ताल्लुक रहना जरूरी है।
2. इख्तलाफी अमूर और मुख्तलिफ फी मसाईल से कुल्ली तौर पर ऐहतराज किया जाये।
3. तफरीक और गिरोह बन्दी से हर तरह बचना चाहिए।
हजरत मौलाना मरहूम ने जिस हिक्मत और बालिग नज़्ारी से इन अमूर की पाबन्दी को लाज़मी करार दिया और इनको मदरसे का मुस्तकिल मसलक मुअय्यन फरमाया। हालात ने यह साबित कर दिया है कि हजरत बानीए मदरसा रहमतुल्लाह अलैहे को यकीनन खुदादाद बसीरत हासिल थी। पचास साल पहले हजरत मौलाना मौहम्मद अली साहब मरहूम बानी ‘‘ दारूल उलूम नदवतुल उलमा‘‘ मदरसा सौलतिया की इस खुसूसियत के सिलसिले में तहरीर फरमाते हैंः
‘‘ मदरसे की खुशनसीबी और मौलाना मरहूम की नेक नीयती का एक उम्दा समरह यह है कि इसके तमाम मुदर्रिसीन और तलबा इस वक्त की आफतों से अलैहदा हैं। इनके ख्यालात में ना इफरात और तफरीत है और ना जिदाल और निजा का इन्हें शौक है और न किसी मुसलमान की तकफीर और तफसीक का इन्हें ख्याल है। अलहम्दुलिल्लाह इस नाजुक और पुर फितना वक्त में इस बला से बचना ही खुदा का बडा फज्ल है। वह इस मदरसे पर है’’।
कुस्तुनतीनिया का दूसरा सफर
1299 हिजरी में उस्मान नूरी पाशा दौलते उस्मानिया की तरफ से गवर्नर मुकर्रर किये गये मोसूफ चूँकि फौजी आदमी थे इसलिये हिक्मत अमली और दूर अन्देशी उनमें ना थी। बाज खुदगर्ज और फितना अंगेज लोगों की रेशादुवानी से वह मदरसा सौलतिया से बदजन हुऐ और इसे अजनबी मुल्क की एक तेहरीक समझकर मुखालफत पर आमादा हो गये। हजरत मौलाना मरहूम से ताल्लुकात की कशीदगी ने मामले को कुस्तुन्तीनिया तक पहुँचा दिया और तरफैन के मारूजात सुलतान अब्दुल हमीद खान की बारगाह में पेश हुऐ। यह हजरत मौलाना मरहूम के दूसरे सफर कुस्तुन्तीनिया की कुदरती तमहीद थी। उसमान नूरी पाशा के इरादों और हालात के बर अक्स कुस्तुन्तीनिया से हजरत मौलाना मरहूम की तलबी का हुक्म पहँचा। इस सफर के इब्तिदाई हालात खुद हजरत मौलाना मरहूम की नविश्ता तेहरीर से दर्ज जे़ल हैंः
‘‘20 रबीउलअव्वल 1301 हिजरी हफ्ता के दिन मग्रिब के वक्त मक्का मुअज्जिमा से जद्दे को रवााना हुए। आठवीं के आगबूट में चलने की तजवीज मौकूफ रही फिर बावूर (जहाज) मिस्री में 15 रबीउलस्सानी 1301 हिजरी रोज बुद्ध को सवार हुऐ और उसने जुमेरात के रोज सुबह के वक्त लंगर उठाया। पीर की रात के 5 बजे सुईज पहुँचे और सुबह को जो पीर का दिन और 20 रबीउस्सानी की थी बाबूर (जहाज) से उतरे और मुहम्मद अली दीदी साहब के मकान पर उतरे। वहाँ से मंगल के दिन 21 तारीख इस्कन्दरिया को रेल पर गये। 3 बजे इस्कन्दरिया पहुँचे। सादुल्लाह बे के मकान पर उतरे। 29 तारीख रबीउस्सानी जुमेरात के दिन तक वहाँ रहे। फिर आठवें दिन जो बुद्ध का दिन 30 रबीउस्सानी 1301 हि0 की थी। बाबूर(जहाज) मिस्री पर सवार होके रवानाऐ इस्तन्बूल हुए। इजमीर से जो हफ्ते का दिन और तारीख 3 जमादिउलअव्वल की थी तार बर्की जनाब नसीम बे और जनाब शरीफ अब्दुल्लाह और जनाब खैरूद्दीन पाशा के नाम असर के वक्त रवाना किये और जमादिउल अव्वल की पाँचवी तारीख पीर के दिन इस्तन्बूल में पहुँचे इधर जहाज ने लंगर डाला। उसी वक्त फिलफौर मुस्तफा वहबी लेयावर (ए डी सी) और बीन बाशी हजरत सुलतान के, जहाज पर चढे और मिल के कहा कि ‘‘हजरत सुलतान ने बहुत बहुत सलाम फरमाया है और किश्ती खास अपनी भेजी है, चलिये।’’ वहाँ से चलकर सराय (महल) कसरे शाही सुलतानी तक जो बिनाये सुलतान मरहूम अब्दुल मजीद खाँ गाजी की है आये। वहां कश्ती से उतर कर दो घोडों की बग्गी में सवार होकर महल सराय सुलतानी में आये और महल सराय के एक कमरे में उतरे, उस रोज मुलाकात को जनाब कमाल पाशा और जनाब उसमान बे और जनाब अली बे थे और जनाब नसीम बे तीनों कुरनाये (मुशीर) हजरते सुलतानी के हैं और जनाब सैयद अहमद असद मदनी जो मुसाहिब हजरत सुलतान हैं दिन को, और रात को नुसरत पाशा आये अगले दिन मंगल को जनाब उसमान पाशा गाजी आये और बुध को सातवीं तारीख जनाब शेख हमजा जाफिर और जनाब सैयद अहमद असद मदनी आये और जनाब कमालपाशा आये और रात को जनाब अली बे कुरना दर्जा दोयम ने हजरते सुलतानी की तरफ से मिजाज पुर्सी करके कलिमाते अवातिफ शाहाना पहुँचाये। आठवीं तारीख जुमेरात के रोज शेख मुहम्मद जाफिर साहब तशरीफ लाये और जुमे को जनाब हसनी पाशा दामाद सुलतान अब्दुल मजीद मरहूम और जनाब सिफवत पाशा और जनाब इस्माईल हक्की और जनाब सैयद फजल पाशा आये और उसी दिन मग्रिब के वक्त खलअत सुलतानी मेरे और बदरूलइस्लाम (हजरत मौलाना मरहूम के भतीजे) और मोेलवी हजरत नूर (सदर मुदर्रिस मदरसा सोलतिया) के लिये आया। और हफते के दिन दसवीं तारीख जनाब दरवेश पाशा और जनाब शरीफ अब्दुल्लाह पाशा और जनाब सैयद अहमद असअद और जनाब इसहाक आफिनदी और जनाब नाजिरे औकाफ(वजीर औकाफ) तशरीफ लाये और असर के वक्त निशान (तमगा) मजीदी दर्जा चहारूम का हजरत सुलतान की तरफ से आया। और बारहवी तारीख इतवार के दिन रजा पाशा बाश कातिब (चीफ सेक्रेट्री सुलतान) मगरिब के बाद आये और बारहवीं तारीख पीर के दिन मगरिब के बाद बहुक्म सुलतानी जनाब शेखुलइस्लाम अहमद असद उरयानी जादा की मुलाकात को जाना हुआ। बहुत ताजीम से पेश आये और फरमाया कि हजरत सुलतान ने फरमा भेजा है कि अच्छी ताजीम कीज्यो कि अब तक ऐसा मेहमान अजीज मेरे पास नहीं आया है। सो उस के मुवाफिक मुझे जरूरी है कि ताजीम करूँ और 13 तारीख मंगल के दिन ‘‘सनदे रऊस‘‘ मेहक्माऐ शेखुल इस्लाम से हासिल हुई। 15 तारीख जुमेरात के दिन मकान अलैहदा में आये। असर के वक्त 17 तारीख हफ्ते के दिन वहबी बे ने हजरत सुलतान की तरफ से हुक्म पहुँचाया कि ‘‘मर्जीऐ हजरत सुलतानी यह है कि तुम अपने अहलो अयाल को बुलवालो। मौसम रबी करीब आ पहुँचा। अब अर्से तक आबो हवाऐ इस्तन्बूल बहुत अच्छी रहेगी’’। नर्मी से इस अम्र में उज़्र किया गया। पीर के दिन दूसरी तारीख रजब के 1301 हिजरी हजरत सुलतानी की जेब खास से पांच हजार कुर्श साग़ माहवार मुकर्रर हुये। (तकरीबन दो हजार पाँच सोे रूपया माहाना) और 10 हजार कुर्श साग़(तकरीबन पाँच हजार रूपये) अता फरमाये। मंगल के दिन किसये मिफताह काबा और एक तस्बीह अकीकुलबहर की और एक तस्बीह संगे मक्सूद की भिजवाई गई और फरमाया कि ‘‘इसके शुक्रिये में मैंने तुमको ‘‘रुत्बाए पायहे हरमैन शरीफैन‘‘ का अता किया। इसका लिबास भी पहुँचेगा। और छटी तारीख रजब जुमेरात के दिन को असर के बाद सराये सुलतानी (महल) को जाना हुआ। मग़रिब के बाद मुलाकात हुई। गायते इनायते शाहाना से पेश आये। मसनद से उठ के एक दो कदम बढ कर हाथ मेरा कुव्वत से अपने हाथ में पकड कर फरमाया कि ‘‘कस्रते शगल के सबब अब तक मुलाकात नहीं की थी और ताखीर का सबब इसके सिवा दूसरा अमर नहीं’’। फिर हम बैठ गये। जब में उठा और सामने आया(तुर्की आदाबे शाही के मुताबिक) फिर दुबारा कमाल खुशी से उठ के मेरा हाथ अपने हाथ में पकड के कहा कि ‘‘ तुम्हारा हाल सुनने का मैं मुश्ताक था। इसी लिये मैंने तुम को बुलाया है। और फुर्सत में मैं और मुलाकात अच्छी तरह करूँगा और कुछ देर तक बातें करूँगा।‘‘ दोनों बार मैंनें भी दुआ और कलमाते शुक्रिया मुनासिस्बा कहे। 11 रजब 1301 हिजरी को हजरत मौलवी नूर रवानाए मक्का मुअज्जमा हुऐ और 12 रजब रोज पन्जशंबा को फरमाने सुलतानी ‘‘ पायाए हरमैन शरीफैन‘‘ के अता की बाबत हजरत सुलतान ने भिजवाया और 14 रजब रोज शन्बा को शेखुल इस्लाम की मुलाकात को गया। मिस्ल अव्वल के ताजीम व मुहब्बत से पेश आये।’’
इस्नाऐ क्यामे कुस्तुन्तीनिया में मुतअद्दिद बार हजरत मौलाना मरहूम को सुलतान ने सर्फे बारयाबी बख्शा और मुख्तलिफ मसाईल और मामलात पर गुफतगू होती थी। सुलतान ने मदरसा सौलतिया के लिये माकूल माहाना इम्दाद मुकर्रर करने के मुताल्लिक ख्याल जाहिर फरमाया जिस के जवाब में शुक्रिया और दुआ के बाद हजरत मौलाना मरहूम ने सुलतान की खिदमत में अर्ज किया किः
‘‘हरमैन शरीफैन में अमीरूलमोमिनीन के बहुत से जारी करदा अमूर खैर हैं और बहुत से नेक काम तश्नऐ तकमील, मदरसाऐ सोलतिया चूँकि हिन्दुस्तान (हिन्द और पाकिस्तान) के दीनदार और नेक ख्याल मुसलमानों की इमदाद से चल रहा है और काइम है। उनको इस कारे खैर में शिर्कत व सरपरस्ती की सआदत से मरहूम न फरमाया जाये जो यकीनन अमीरूलमोमीनीन के इल्ताफे शाहाना से बईद नहीं।‘‘
एक मुलाक़ात में मौलाना बदरूल इस्लाम साहब (हजरत मौलाना मरहूम के भतीजे) भी साथ थे। उनके लिये सुलतान ने हुक्म फरमाया कि यह मेरे पास रहेंगे और कुतुब खाना हमीदिया (सुलतान अब्दुल हमीद खाँ का शाही दारूल कुतुब जो दुनिया के खास कुतुब खानों में शुमार होता था और जिसमें सलातीने आले उसमान की तमाम किताबों को जमा किया गया है) कस्रे यलदिज का उन को मोहतमिम बनाता हूँ। हजरत मौलाना मरहूम ने इस कद्र अफजाई का शुक्रिया अदा किया। और मौलाना बदरूल इस्लाम साहब इस खास इल्मी खिदमत पर मामूर हुये। आखिर वक्त तक सुलतान के मौतमद अलैह रहे। मुहासरा-ए-कस्रे यलदिज और सुलतान अब्दुल हमीद की माजूली के पुरखतर वक्त में सिर्फ तीन अशखास सुलतान की खिदमत में बाकी रहे जिन में मौलाना बदरूल इस्लाम भी थे।
सुलतान से अलविदाई मुलाकात के बाद दूसरे दिन मुस्तफा वहबी बे यावर और खैरूद्दीन पाशा और नसीम बे और सैयद अहमद असअद मदनी यह चारों असहाब तशरीफ लाये और सुलतान की तरफ से ज़ाती हदया एक मुरस्सा तलवार हजरत मौलाना मरहूम को दी और सुलतान के यह अलफाज नकल किये कि
‘‘हथयार हर मुजाहिद फी सबीलिल्लाह की जीनत है’’।
कुस्तुन्तीनिया से हजरत मौलाना मरहूम मक्का मुअज्जमा पहुँचे मदरसा सौलतिया के लिये यह मुसर्रत और खुशी का दिन था। यह अमर खास तौर पर काबिले जिक्र है कि इसतकबाल करने वालों में हजाज के गवर्नर ‘‘उसमान नूरी पाशा’’ भी थे जो सबसे पहले हजरत मौलाना मरहूम से बगलगीर हुये और अपनी गलत फहमी की मुआफी चाही।
नहर जुबैदा
मलिका बगदाद खलीफा हारून रशीद की बीवी जुबैदा खातून का दायमी सदकाये जारिया नहरे जुबैदा इमतदादे जमाना से बहुत ज्यादा काबिले मरम्मत और इस्लाह थी। और पानी के लिये साकिनाने हरम को काफी दिक्क्त और जहमत पेश आती थी। इसी जमाने में सेठ अब्दुल वाहिद साहब उर्फ ‘‘वाहिदना सेठ’’ मक्का मुअज्जमा आये और इस सिलसिले में एक मशावरती इज्तिमा मदरसा सौलतिया में मुनअकिद हुआ। सेठ अब्दुल वाहिद साहब बा तोफीक साहिबे हिम्मत दोलतमन्द थे। हजरत मौलाना मरहूम ने नहर जुबैदा की अज़सरे नौ इस्लाह और मरम्मत का बीडा उठाया और इसके लिये हकुमत की इजाजत और हालात के लिहाज से एक मुस्तकिल मजलिस कायम की गयी जिस में मुहाजरीन मक्का मुअज्जमा के हर तब्के में से हर कौम के मुमताज अफराद मजलिस में मेम्बर बनाये गये। उस मजलिस की सदारत के लिये हजरत मौलाना मरहूम को मुन्तखब किया गया मगर आपने अपने शागिर्दे रशीद ‘‘फजीलत मआब मौलाना शेख अब्दुर्रहमान सिराज साहब मरहूम मुफती अहनाफ और शेखुलउलमा मक्का मुअज्जमा’’को इसके लिये मोजूँ समझा। और खुद नायब सदर की हैसियत से इस अजीमुश्शान काम की जिम्मेदारी उठायी। सेठ अब्दुलवाहिद साहब नहर जुबैदा के खजांची और तहवीलदार मुकर्रर हुये। खुदा का शुक्र व अहसान है कि यक सदकाये जारिया उन बुजर्गों की हिम्मत से दोबारा जिन्दा हुआ।
कुस्तुनतीनिया का तीसरा सफर
दूसरे सफर से वापसी के बाद दीगर मशागिल व मसरूफियात के साथ खैरूद्दीन पाशा अली बे और शेखुल इस्लाम वगैरह मुकर्रबीने सुलतान और आयाने दौलत से हजरत मौलाना मरहूम की खत और किताबत का सिलसिला रहा। और अकसर बराहे रास्त सुलताने मुअज्जम को भी बाज अहम उमूर के मुतआल्लिक खुतूत तहरीर फरमाते रहे। किब्रसिनी और कसरते मशागिल के सबब आप को जोफ़ेे बसर की शिकायत होगयी और 1303 हिजरी में हजरत मौलाना मरहूम नजूलूलमा (मोत्याबन्द) की वजह से लिखने पढने से मजबूर हो गये। सुलतान को इस की इत्तला हुयी तो आप ने फौरन हजरत मौलाना मरहूम को कुस्तुन्तीनिया तलब किया। इस हालत में यह तवील सफर आप के लिये नाक़ाबिले बर्दाशत था मगर सुलतान के हकुम से आप ने अज्मे सफर किया। रफका में मोलवी अब्दुल्लाह साहब उर्फ अब्दुल्लाह जी शगिर्द और खादिम हज़रत मौलाना मरहूम ने इस सफर के जो इब्तदाई हालात कलमबन्द किये वह दर्जज़ैल हैंः
‘‘पोर्ट सईद में रोज शंबा 27 शाबान सन 1304 हि0 इस्तम्बूल को दो तार रवाना किये एक बनाम मियाँ बदरूल इस्लाम साहब के और एक बनाम अली बे के। और इस तार में एक जनी उसमानी अला दो फरंक खर्च हुये और उसी रोज़ शंबा बाद असर आगबोट(जहाज) पोर्ट सईद से रवाना हुआ और चहारशंबे की रात को चाँद रमजाने शरीफ का नजर आया और रोज चहार शंबा पहली रमजान मुबारक बहिसाब हमारी रूयत के सुबह के वक्त तीन बजे ‘चनाक किले’ में पहुँचे और वहाँ कमन्दार (फौजी अफसरे आला) तमाम किलों चनाक किले का आगबोट पर आया और मौलवी साहब से मिला और कहा कि सराये (महल शाही) से हुकुम आया कि ‘‘मौलवी रहमतुल्लाह साहब चनाक किले में पहुँचे या नहीं इससे इत्तला दो। तो इस बात के वास्ते आप की खिदमत में हाजिर हुआ’’ और बाद एक साअत के फिर आगबोट चला और रोज पंजशंबा 2 रमजानुल मुबारक सन 1304 हि0 इस्तम्बूल मंें पहुँचे और सराये यलदीज (कस्रे यलदिज) में ‘‘चादर कशक’’ में उतरे और बाद एक साअत के जनाब सैयद अहमद असअद आफिनदी मदनी तशरीफ लाये और कहा कि ‘‘हजरत सुलतान आपको बुलाते हैं’’। थोडी देर के बाद फिर एक आगा (ख्वाजा सरा) आया तो जनाब मौलवी साहब हज़रत सुलतान के पास तशरीफ ले गये। हज़रत सुलतान बडी ताज़ीम से पेश आये और बाद दो साअत के फिर जनाब मौलवी साहब रूखसत लेके मकान (चादर कशक) मे तशरीफ लाये। फिर करीब मग़रिब इसी रोज फिर सय्यद अहमद असअद आफिन्दी मदनी तशरीफ लाये और कहा कि ‘‘हज़रत सुलतान बुलाते हैं’’ तो मौलवी साहब तशरीफ लेगये और वहीं इफ्तार किया और तरावीह भी वहीं पढी। हज़रत सुलतान ने उस वक्त फरमाया कि आपकी आँखों के इलाज के वास्ते कल में डाक्टरों को जमा करूँगा। फिर वहाँ से मौलवी साहब मकान पर तशरीफ लाये और रोज जुमा बाद असर हजरत सुलतान ने अपने एक साहब के साथ पाँच डाक्टर उम्दा को भेजा। उन्होंने आके मौलवी साहब की आँखों को खूब तहकीक से देखा और कहा ‘‘ इन्शाअल्लाह तआला आँखें अच्छी हो जावेंगी पर इलाज दो महीने के बाद करेंगे क्योंकि अब तक पानी आखों में कामिल नहीं उतरा‘‘। और रोज पंजशंबा में हाजी अली बे कुरनाये सानी भी बाद जोहर तशरीफ लाये और उन्होंने मोलवी साहब से मुलाकात करके मौलवी बदरूल इस्लाम से कहा कि मौलवी साहब के वास्ते कपडे बाजार से ले आवें और जाके कपडे बाज़ार से खरीदे और लेते आये। और रोज़े जुमा नमाजे जुमा जामाए हमीदिया में पढ़ी और रोज संबा 5 रमजान मुबारक के बाद जोहर जनाब अब्दुल्लाह पाशा नजदी वास्ते मुलाकात जनाब मौलवी साहब के आये और रोज दो शंबा 7 रमजान शेख मौहम्मद जाफिर मे अपने बडे बेटे के वास्ते मुलाकात के तशरीफ लाये और बाद उस के ओर चन्द बार हजरत सुलतान ने बुलाया और 15 रमजान रोज सेहशंबा जियारते चादर शरीफ में जाने के वास्ते बग्गी उमदा भेजी और सैयद अहमद असअद आफिन्दी को बसबब जोफे बसर के साथ किया और वहाँ जाये जियारत में इसहाक आफिन्दी और अकसर कुजाते असकर मिले। और 30 रमजान को जनाब सैयद अहमद असअद को हजरत सुलतान ने मौलवी साहब की खैरयत दर्याफ्त करने को भेजा और पहली शव्वाल रोज चहार शंबा को हुई और नमाज ईद की जामे हमीदिया में पढी।‘‘
सुलतान की ख्वाहिश थी कि हजरत मौलाना मरहूूम कुस्तुन्तीनिया में उनके पास रहें। एक सोहबत में सुलतान ने अपनी इस ख्वाहिश का इज़हार भी किया जिसके जवाब में हजरत  मौलाना ने फरमायाः
‘‘अइज्जह और अकारिब को छोड कर तर्के वतन कर के खुदा की पनाह में उस के दरवाजे पर आकर पडा हूँ वही लाज रखने वाला है, आखरी वक्त में अमीरूल मोमिनीन के दरवाजे पर मरूँ तो क्यामत के दिन क्या मुँह दिखाऊँगा’’।
हजरत मौलाना मरहूम को क्यामे कुस्तुन्तीनिया बहुत गराँ और शाक गुजर रहा था और उमर के इस आखरी दौर के हर लम्हे को वह खुदा के घर में गुजारने के ख्वाहिशमन्द थे। इस जमाने में (सत्तर साल पहले) आप्रेशन एक हैबतनाक चीज थी इस लिये हजरत मौलाना मरहूम शाही अतिब्बा से आँख के आप्रेशन के लिये तैयार ना हुये। सुलतान को आप की अजहद दिलदारी मन्जूर थी इसलिये मर्जी के खिलाफ इसरार नहीं किया और सुलतान से इजाजत लेकर जीकादा में मक्का मुअज्जमा तशरीफ ले आये। 1305 हि0 में एक मकामी मुआलिज से नुजूलल मा् का आप्रेशन मक्का मुअज्जमा में कराया जो अफसोस है कि कामयाब न हुआ।
हजरत मौलाना मरहूम चूँकि लावलद थे इसलिये आपने अपने बडे भाई मौलाना हकीम अली अकबर साहब मरहूम के पोते मौलाना मुहम्मद सईद साहब मरहूम को वतन से बुलाया। उनके वालिद मौलवी मुहम्मद सद्दीक साहब अंबाला में सर रिशतादार थे और मकान के करीब एक मिशन स्कूल था जिसमें मुन्शी निहालुद्दीन साहब फारसी के मुदर्रिस थे। मुन्शी निहालुद्दीन साहब और मौलवी मुहम्मद सद्दीक साहब में दोस्ताना ताअल्लुकात की बिना पर मौलवी मुहम्मद सद्दीक साहब ने अपने लडके को मिशन स्कूल में दाखिल कर दिया था। इसकी इत्तिला जब हजरत मौलाना मरहूम को हुई तो आप ने रन्ज व मलाल का इज़्हार फरमाया और सख्ती के साथ लिखा कि ‘‘मुहम्मद सईद को मिशन स्कूल से निकालकर फौरन मक्का मुअज्जमा भेज दिया जाये।‘‘ चुनाँचे 12 वर्ष की उमर में मक्का मुअज्जमा पहुँचे और हज़रत मौलाना मरहूम ने अपने एहतमाम और निगरानी में उनकी तालीम व तरबियत का नज़म फरमाया। ज़ोफे बसारत के बाद खुतूत की तहरीर का काम उनके जिम्मे हुआ। दूसरी तरफ हजरत हाजी इम्दादुल्लाह साहब की ख्वाहिश पर बिलउमूम मग़रिब और इशा के दरमियान मौलाना साहब मरहूम हज़रत हाजी साहब के खुतूत वगैरह सुनाने और उनका जवाब लिखने के लिये जाते थे और इस तरह इन दोनों बुज़ुर्गों ने अपनी खास निगरानी और तर्बियत से मर्कजेइस्लाम की खिदमत के लिये आप को तैयार किया।
इमारते मदरसा
सरजमीने हरम पर हजरत मौलाना मरहूम ने मदरसा सौलतिया की शक्ल में जो दाइमी कारेखैर छोडा इसकी मुतअद्दिद खुसूसियात में यह इमतियाज काबिले ज़िक्र है कि इसके पास अपनी जाती मुतअद्दिद इमारतें हैं और मदरसे के तमाम शोबे इन वसी इमारतों में हैं जो इसी मक्सद के लिये हजरत बानी अलैहिर्रहमा रह0 ने बनाई थीं आपके एहदे मुबारक में मदरसे की अक्सर इमारतें मुकम्मल और तैयार हैंः
1.  मदरसे की सबसे पहली इमारत : ‘‘सौलतिन्निसा बैगम साहिबा मरहूमा‘‘ रईसा कलकत्ता की इआनत और माली इमदाद से 1291 हिजरी में तैयार हुई और इस मोहसिन खातून के नाम से इस इमारत को मौसूम किया। इस अव्वलीन वसी(विशाल) इमारत में पाँच बडे कमरे और 3 छोटे कमरे, वसी सहन और दीगर जरूरियात हैं।
2.  मदरसे का दारूलइकामा  (बोर्डिन्ग)ः दूसरी मुस्तकिल इमारत है जो सूबा बिहार के एक आली हिम्मत रईस मीर वाजिद हुसैन साहब मरहूम रईस पटना की यादगार है। इस इमारत की इब्तिदा 1293 हिजरी में हुई। मदरसे के इस दारूलइकामा में पचास तलबा के रहने और क्याम की गुन्जाईश है जिसका कोई मुआवज़ा वगैरह किसी से नहीं लिया जाता।
3.  मस्जिदे मदरसा:. मदरसे की मस्जिद तारीखी हैसियत के अलावा हिन्दुस्तानी तर्ज तामीर का वाहिद नमूना है सहने हरम में जमजम के करीब ‘‘सुलतानी कुतुबखाना‘‘ की इमारत थी। सहने हरम में इस इमारत की वजह से नमाज के औकात में हुज्जाज को खास तौर पर तक्लीफ और जहमत होती थी। हजाज़ के गवर्नर नूरी पाशा ने वजारते औकाफ़ कुस्तुन्तीनिया को इस तरफ तवज्जेह दिलाई कि कुतुब खाने की इमारत अगर सहने हरम से उठा दी जाए तो जाइरीन ओर हुज्जाज की आसानी और सहूलियात का बाईस होगा। यह दरख्वास्त सुलतान अब्दुल हमीद मरहूम के हुजूर में मन्जूर हुई। किताबें और इमारत का तमाम सामान मस्जिदे हरम से एक मुलहिका इमारत में मुन्तकिल किया गया और कुतुबखाने की इमारत गिरा दी गई। मुन्हदिम इमारत का सामान वगैरह के नीलाम का एलान हुआ। इस खबर को सुनकर हजरत मौलाना रहमतुल्लाह साहब रहमतुल्लाह अलै0 बैचेन हुए कि जो पत्थर और सामाने इमारत ज्वार काबा और सहने हरम में रहा हो नीलाम के बाद न मालूम किस जगह पर और किस मकाम पर खरीदने वाले इस्तेमाल करें। हजरत मोलाना मरहूम ने उस्मान नूरी पाशा से अपना ख्याल जाहिर किया कि इस सामान से मदरसा सौलतिया के मुताल्लिक एक मस्जिद बनवा दी जाये जिस की जरूरत भी है। इस तजवीज से हजाज़ के गवर्नर ने इत्तेफाक जाहिर किया। मलबे की कीमत 1500रू0 ते हुई। और यह सहनेहरम से मदरसे में मुन्तकिल हुआ। सन 1301 हिजरी में इस यादगारे जमाने मस्जिद की तामीर शुरू हूई। मक्का मुकर्ररमा के मैमार गुम्बदों के बनाने में महारत नहीं रखते थे। मस्जिद के तीनों गुम्बद पानीपत जिला करनाल के मे‘मारों की यादगार हैं जो उस ज़माने में फरीजाए हज अदा करने की गर्ज से मक्का मुअज्जमा आये थे। मस्जिद की इमारत 1304 हिजरी में मुकम्मल हुई। हिरात के ज़ी इल्म और खुश कलम व खुश कलाम मुहाजिर जिनको हजरत मौलाना मरहूम से खुलूस और दिली ताअल्लुक था उन्होंने मस्जिद का मुन्दर्जा जै़ल कित्आऐ तारीख लिख कर अपने हाथ से महराब की पैशानी पर कन्दा कियाः
बसके खुश मन्जर अस्त इँ मस्जिद
मारअल एैन मिस्लुहुस्सानी
गश्त तारीख ‘‘खानए रहमत’’
(1304हि0)
रहमतुल्लाह कुल अललबानी
मक्का मुअज्जमा में
हजरत मौलाना मरहूम के तलामिजा
मस्जिदे हरम में हज़रत मौलाना का हलकाये दर्स मरजा खास व अवाम था। मस्जिदे हरम की तदरीस के जमाने में और मदरसा सौलतिया के इब्तिदाई दौर में आपसे जिन असहाब को शर्फे तलम्मुज हासिल हुआ इस तवील फहरिस्त में चन्द मुमताज उलमाये हरम के नाम दर्ज जै़ल हैंः
1. शरीफ हुसैन बिन अली। साबिक अमीरे मक्का और बानीये हकुमते हाशिमीया
2. शेख अहमद अब्दुल्लाह मर्दाद। शेखुल अइम्मा वल खुतबा मस्जिदे हरम
3. शेख अब्दुर्रहमान सिराज। मुफ्तीये अहनाफ और शेखुल उलमा मक्का मुअज्जमा
4. शेख अमीन मुहम्मद मदार्द। नाइब काजीये मक्का मुअज्जमा
5. शेख अब्दुर्रहमान हसन अजीमी
6. शेख अब्दुल्लाहुल गमरी। मुदर्रिस मस्जिदे हरम
7. शेख हसन अब्दुल कादिर तैयब। मुदर्रिस मस्जिद हरम
8. शेख असअद अहमद दहान। काजी मक्का मुअज्जमा
9. शेख अब्दुर्रहमान अहमद दहान। मुदर्रिस मुस्जिदे हरम और सदर मुदर्रिस मदरसा सौलतिया मक्का मुअज्जमा
10. शेख हसन काजिम। मुदर्रिस मस्जिदे हरम
11. मोलवी अब्दुस्सतार साहब देहलवी। मुदर्रिस मस्जिद हरम
12. शेख अब्दुल्लाह अहमद अबुल खैर। काजीये मक्का और मुदर्रिस मस्जिद हरम
13. शेख अब्दुल हमीद बख्श फलकी
14. सैयद हसन दहलान। मुदर्रिस मस्जिदे हरम
15. शेख अब्दुर्रहमान शेबी। कलीद बरदार खाना काबा
16. शेख मुहम्मद हुसैन खैयात। बानीये मदरसा खैरिया मक्का मुअज्जमा
17. आबिद हुसैन मालिकी। मुफ्ती मालिकीया मक्का मुअज्जमा
18. शेख अहमद नज्जार मरहूम। काजीये ताईफ
19. शेख मुहम्मद हामिद मरहूम। काजीये जद्दाह
20.  शेख मुहम्मद सईद बा बसील। मुदर्रिस मस्जिद हरम
21. मोैलाना बदरूल इस्लाम साहब। मुदर्रिस मदरसा सौलतिया और मोहतमिम कुतुब खाना हमीदीया कसरे यलदिज कुस्तुनतुनिया
22. शेख अब्दुल्लाह जवावी मरहूम। मुफ्ती शाफईया मक्का मुकरमा
23. शेख हस्बुल्लाह मरहूम। मुदर्रिस मस्जिद हरम
24. शेख मुहम्मद अली जैनुल आबिदीन मरहूम। मुदर्रिस मस्जिद हरम
25. शेख सालेह कमाल मरहूम। मुदर्रिस मस्जिदे हरम
26. शेख मुहम्मद अली कमाल मरहूम। मुदर्रिस बा मक्का मुअज्जमा
27. शेख दरवेश अजीमी मरहूम। मुदर्रिस और मुक्का मुअज्जमा
28. शेख बकर रफी मरहूम। मुदर्रिस मस्जिदे हरम
29. मौलवी नजीर अहमद बंगाली। मुहाजिर मक्का मुअज्जमा
30. मौलवी अब्दुर्रहमान साहब। मुहाजिर मक्का मुअज्जमा
31. मौलवी जियाउद्दीन अब्दुल वहाब साहब मरहूम। मोहतमिम मदरसा बाकिया तुस्सालिहात मद्रास
32. मौलाना कारी अब्दुल्लाह साहब। सदर मुदर्रिस शौबा तजवीदुल कुरआन मदरसा सौलतिया मक्का मुअज्जमा
33. शेखुल कुर्रा मौलाना कारी अब्दुर्रहमान साहब इलाहाबादी
34. मौलाना अब्दुल्लाह गाजी साहब मरहूम। मुअर्रिख मक्का मुअज्जमा और मोहतमिम कुतुब खाना मदरसा सौलतिया मक्का मुअज्जमा
35. हकीम मुहम्मद इसमाईल नवाब साहब मरहूम। मक्का मुअज्जमा के मशहूर तबीब और आलिम
36. मौलाना मुहम्मद सईद साहब मरहूम। साबिक नाजिम मदरसा सौलतिया मक्का मुअज्जमा
37. मौलाना अब्दुल्लाह सिराज मरहूम। मुफतीये अहनाफ और काजीयुल कज्ुजात  और वजीर आजम हकूमते हाशिमिया (हजाज)
38. सुलैमान हस्बुल्लाह मरहूम। मुदर्रिस मस्जिदे हरम
39. मौलवी अब्दुल खालिक इस्लामाबादी। बानीय मदरसा इस्लामिया दारूल फाईजीन मक़्क़ा मुअज्जमा
40. शेख मुहम्मद सालेह मैमनी मरहूम। मुअर्रिख मक्का और अज मुकर्रबीन शरीफ ऊन अमीर मक़्क़ा।
हजरत मौलाना मरहूम के अहदे मुबारक के बाद भी आप की इस मरकजी दर्स गाह से अलहमदुलिल्लाह इलमी फैज और दीनी खिदमत का सिलसिला जारी रहा आज से अस्सी साल कबल फन्ने तजवीद और किरआत पर बहुत कम तवज्जेह की जाती थी और इसी लिये यह काबिलेकदर फन बराये नाम था। यह एक मुसल्लमा हकीकत है कि हिन्दुस्तान (पाकिस्तान और हिन्द) के तूल और अर्ज में जहाँ फन तजवीद का सिलसिला और किरअते सबा का चर्चा दिखाई देता है यकिनन बिलवास्ता या बिलावास्ता वह मदरसा सौलतिया का फैज है। मदरसा सौलतिया के तालीम याफ्ता तलबा जिन्हों ने हिन्दुस्तान (कदीम) में तजवीद और किरात की तरक्की व तालीम में खास हिस्सा लिया उन में खुसूसियत के साथ कुर्राये जैल काबिले जिक्र हैंः
1) मोलवी कारी मुहम्मद सुलेमान साहब मरहूम भोपाल
2) कारी सैयद हसन साहब दुजाना जिला रोहतक
3) कारी अब्दुर्रहमान साहब मरहूम इहयाउल उलूम इलाहाबाद
4) कारी अब्दुल खालिक साहब मदरसा तजवीदुल कुरआन सहारनपुर
5) कारी इब्राहीम रशीद साहब खतीब मक्का मस्जिद हैदराबाद
6) कारी अब्दुल वहीद खाँ साहब मरहूम दारूल उलूम देवबन्द
7) कारी अब्दुल मालिक साहब मदरसा फुरकानिया लखनऊ
8) कारी फैज आलम साहब। गोलडा, रावलपिण्डी
9) कारी महमूद यार साहब भोपाल
10) कारी मुतीउल्लाह साहब मुलतान
11) कारी मीरान शाह साहब मरहूम मुअल्लिम ए तजवीद दारूल उलूम नदवा लखनऊ
12) मौलाना कारी जियाउद्दीन मोहतमिम मदरसा बाकियातुस्सालिहात मद्रास
13) कारी हमीदुद्दीन साहब बानीये मदरसा तजवीद संभल जिला मुरादाबाद
14) मोलवी कारी सैयद मुतर्जा हुसैनी साहब बम्बई
इन मशाहीर कुर्रा के अलावा ‘‘रहमतुल्लाह’’ के इस फैज आम से जो अजीमुश्शान और इल्मी फवाइद हासिल हुये उन के अस्सी साला मुफस्सल तजकरे की इन महदूद सफहात में गुन्जाईश नहीं मगर ‘‘दारूल उलूम हरम सौलतिया’’ के अबनाये कदीम की इस मुख्तसर फैहरिस्त में इजमाल की तफसील मौजूद है वल हम्दुलिल्लाह।
1) शेख अहमद इब्ने अब्दुल्लाह कारी मरहूम। मुदर्रिस मदरसा सौलतिया, काजीए मक्का और मुदर्रिस मस्जिद हराम मेम्बर मजलिस शूरा मम्लकत सऊदिया
2) शेख अब्दुल हमीद हदीदी। हाल काजीए मक्का और मेम्बर मजलिस ए औकाफ आला
3) शेख हुसैन अब्दुल गनी मरहूम। मुदर्रिस मदरसा सोलतिया, मेम्बर हाइकोर्ट और मुदर्रिस मस्जिदे हरम
4) यहया अमान। साबिक मुदर्रिस मदरसा फलाह, मस्जिद हरम, काजीए मक्का और मेम्बर हाईकोर्ट और हाल काजीए ताइफ
5) शेख मुहम्मद नूर कत्बी। हाल काज़ी मदीना मुनव्वरा और मुदर्रिस मस्जिदे हरम
6) शेख अहमद नाज़रीन। मरहूम मदरसा सौलतिया, मदरसा फलाह और नाइब काजी ए मक्का मुअज्जमा
7) शेख सालिम सफी। साबिक मुदर्रिस मदरसा सौलतिया,  मदरसातुलफलाह और नाइब काजी ए मक्काा मुअज्जमा
8) शेख हामिद कारी। साबिक मुदर्रिस मदरसा सौलतिया, काजी ए ताइफ और हाल काजीए युम्बा
9) शेख हसन सईद यमानी साबिक मुदर्रिस मदरसा सौलतिया,  मेम्बर हाइकोर्ट और हाल काजीए कुज्जात रियासत समाटरा
10) शेख अहमद हरसानी। हाल काजीए महकमा ताजीरात दरजा दोम मक्का मुअज्जमा
11) शेख सुलैमान मुराद। मरहूूम मुदर्रिस मदरसा सोलतिया और काजीए ताईफ
12) शेख हसन मुहम्मद मुशात। मुदर्रिस मदरसा सोलतिया और हाल नाइब काजी ए मक्का
13) शेख अब्दुल्लाह हद्दादी। मुदर्रिस मदरसा सोलतिया, साबिक काजी ए ताईफ और हाल खाना नशीन
14) शेख सिराज मुहम्मद नूर शाशा। साबिक काजीए तबूक, सब रजिस्ट्रार ताईफ, हाल सदर शोबाये औकाफ नहर जुबैदा और मुदर्रिस मदरसा सौलतिया
15) सय्यद मुहम्मद मरजोकी कतबी मरहूम। साबिक मुदर्रिस मदरसा सौलतिया, बाश कातिब महकमा शरईया और मुफत्तिश महाकिमे  शरईया ममलकत सऊदिया
16) शेख ईसा रव्वास मरहूम। साबिक मुदर्रिस मदरसा सौलतिया,  मस्जिद हरम और मदरसा फलाह
17) सैयद अहसन अहदल। साबिक मुदर्रिस मदरसा सौलतिया और हाल काजी ए महकमा ताजीरात
18) शेख अब्बास अब्दुल जब्बार। मुदर्रिस मस्जिद हरम और मुफत्तिशे कुतबे इल्मिया
19) शेख उसमान अहमद बशनाक मरहूम। साबिक मुदर्रिस मदरसा सौलतिया और मस्जिदे हरम
20) शेख मुहयुद्दीन। करन्शी माहिर इल्मे फलक मक्का मुअज्जमा
21) शेख अहमद इब्राहीम गजावी। शाइरे दरबार जलाल्तुल मुल्क अब्दुल अजीज इबने सऊद, मेम्बर मजलिस ए शूरा ममलकत सऊदिया और सदर डिस्ट्रिक्ट बोर्ड मक्का मुअज्जमा
22) शेख मुहम्मदुस्सादिक। मुदीर मेहक्मा मरदुम शुमारी ममलकत सऊदिया
23) शेख महमूद कारी। मुदीर कुल्लिया शरीअत मक्का मुअज्जमा
24) शेख महमूद आरिफ। साबिक मुदर्रिस मदरसा सौलतिया,  मस्जिदे हरम और हाल मुदीर मदरसा अरबिया रियासत सलानगोर
25) शेख अहमद मन्सूरी। साबिक मुदर्रिस मदरसा सौलतिया और हाल मुदीर ‘‘दारूल उलूम जावया’’ मक्का मुअज्जमा
26) सैय्यद हाशिम नाइबुलहरम मुदीर इदारा मस्जिदे हरम मोहतरम मक्का मुअज्जमा
27) शेख मुहम्मद ईसा ताशकन्दी। वकील अदालत और मेम्बर मयुन्सिपल बोर्ड मक्का मुअज्जमा
28) जमाल सबुंल। सुपरनटिनडेन्ट दफ्तर वजारत खारजा ममलकत सऊदिया
29) सैय्यद मोहसिन मसाबी मरहूम। साबिक मुदर्रिस मदरसा सौलतिया और बानी ए मदरसा दारूल उलूम जावया मक्का मुअज्जमा
30) शेख हामिद मीर। साबिक मुदर्रिस मदरसा सौलतिया और हाल मुदीर मदरसा सानविया ताईफ
31) शेख मुहम्मद अब्दुल करीम सुडानी। मुदीर मदरसा सानविया। मदीना मुनव्वरा
32) शेख दाऊद अब्दुर्रहमान दहान मरहूम। मुदर्रिस मदरसा सौलतिया और मस्जिदे हरम
33) शेख अब्दुल्लाह मगरिबि। साबिक मुदर्रिस मदरसा सौलतिया और बानीए मदरसा इसलामिया फेरा। जावा व मुदीर मदरसा फलाह जद्दा और हाल नाईब काजी ए मक्का मुअज्जमा
34) मोलाना मुहम्मद सलीम साहब। साबिक मुदर्रिस मदरसा सौलतिया, हाल नाजिम मदरसा सौलतिया, मुशरिफ आम (निगरान शरई) ’’दारूल फाईजीन’ और सदर इदाराए हुज्जाज मन्जिल जद्दा
35) शेख मुहम्मद अली इलियास। मुदर्रिस मदरसा सौलतिया द्द हाल मुदीर शोबा ए इब्तिदाई मदरसा सौलतिया
36) शेख मुख्तार मखदूम मरहूम। मुदर्रिस मदरसा सौलतिया निगरां शोबा सानवी मदरसा सोलतिया
37) शेख इब्राहीम यूसुफ खाँ। साबिक नाईब काजी ए ताईफ
38) शेख बकर कमाल। साबिक काजीए ताईफ
39) शेख मुहम्मद मदनी मुँजद्ददी। मुदीर शोबा ए ऊर्दू इदारा हज ममलकत सऊदिया
40) शेख ज़किरिया बेला। मुदर्रिस मदरसा सोलतिया, मस्जिद हरम  और हाल निगराँ शोबा सान्वी मदरसा सोलतिया
41) शेख अली बकर।मुदर्रिस मदरसा सोलतिया और मस्जिद हरम और बानी ए मदरसा इसलाह
42) शेख मुहम्मद सालेह सलीम। वकील अदालत शरईया मक्का मुअज्जमा
43) शेख मुहम्मद शाह। मददगार इदारा बेेतुलमाल महकमा शरईया
44) शेख अब्दुल्लाह आशी। मुदीर जमीअत असआफ (फस्ट ऐड सोसायटी) ममलकतए सऊदिया
45) शेख असअद मुफ्ती। मुदीर दफ़्तर शिरकत अर्जिया लिस्सय्यारात – (अरबीन मोटर कम्पनी मलकअते सऊदिया) मदीना मुनव्वरा
46) सैय्यद मुहम्मद इब्राहीम फूलानी। मुसन्न्फि व अदीब
47) सय्यद सईद उबई यमानी। अज उलमाये यमन
48) सय्यद मुहम्मद हिजाम यमानी। मुदर्रिस शहर सन्आ (यमन)
49) शेख अनअम नासिर यमानी। मुदर्रिस मदरसा फलाह मक्का मुअज्जमा
50) शेख मुहम्मद अबुबक्र मुल्ला। मुदर्रिस मदरसा अजसा (नजद)
51) शेख अब्दुर्रहमान मुल्ला मुदर्रिस मदरसा अजसा (नजद)
52) शेख अब्दुल्लाह अलकोहजी। साबिक मुदर्रिस मदरसा सौलतिया व हाल वाईज़ व खतीब बहरैन
53) शेख अब्दुल्लाह फिदा मरहूम। मुदर्रिस मदरसा सौलतिया व मोहतमिम कुतबखाना मस्जिदे हरम मक्का मुअज्जमा
54) शेख मुहम्मद अली यमानी। मुदर्रिस मस्जिदे हरम, हाल मुअल्लिम और अतालीके बाज शाहजादगान
55) शेख अब्दुर्रहमान मज़हर। शेखुल मोअल्लिमीन (पाकिस्तान और हिन्द) मक्का मुअज्जमा
56) मौलाना अब्दुल वहाब साहब देलहवी। मालिक फर्म हाजी अब्दुस्सत्तार, अब्दुल जब्बार साहेबान (शााख कोठी हाजी अलीजान साहब मरहूम दिल्ली) और मेम्बर मजलिसे कुतुब खाना हरम
57) हाफिज अब्दुलबारी साहब देलहवी। मैनेजर फर्म हाजी अब्दुस्सत्तार और अब्दुल जब्बार साहेबान ताजिराने मक्का मुअज्जमा
58)  हाफिज मुहम्मद इनाम साहब देहलवी। ताजिर मक्का मुअज्जमा
59) हाफिज मुहम्मद रफी साहब देलहवी। ताजिर मक्का मुअज्जमा और वकील रियासत हैदराबाद दक्कन
60) शेख उमर अकबर। नाइब शेखुल मुअलिमीन (पाकिस्तान और हिन्द) मक्का मुअज्जमा
61) सय्यद हाशिम अली नहहास।नाइब मुदीर और एडीटर रिसाला ‘‘मन्हुल’’ मक्का मुअज्जमा और शोबा तहरीरात वजारत मालिया मक्का मुअज्जमा
62) शेख अब्दुल खालिक रफ़ा। हाल ताजिर जद्दा
63) हाफिज जियाउद्दीन अहमद साहब मरहूम। साबिक मोतमिदे अमूमी सदर दफ्तर दारूल उलूम हरम सोलतिया करांची।
64) शेख इमरान रशादी। साबिक चार्ज डीएफेयर इण्डोनेशिया लगीशन जद्दा।
65) सय्यद बक्र जवावी। साबिक सैक्रेट्री मजलिसे मियोनिसपल बोर्ड मक्का मुअज्जमा और हाल मुदीर शोबाए सन्अत
66) शेख अब्दुल कादिर इलियास। मुदर्रिस मदरसा सौलतिया और हाल मुदर्रिस मदरसाए अजीजिया मक्का मुअज्जमा
67) शेख अब्दुल फत्ताह रावह। मुदर्रिस मदरसा फैसल्या मक्का मुअज्जमा
68) शेख अब्दुल कादिर करामातुल्लाह। मुदर्रिस मदरसा सौलतिया और हाल मुदीर मदरसाए राबिग
69) शेख हसन सिद्दीक। सिन्धी मुदर्रिस मदरसा सौलतिया और हाल मुदर्रिस मदरसा सऊदिया
70) शेख मुहम्मद महमूद नदीम। इन्सपेक्टर रोडस आरगनाईजेशन डिपार्टमेन्ट ममलकते सऊदिया।
71) शेख शमसुद्दीन इण्डोनेशी। साबिक मुदर्रिस मदरसा सौलतिया व हाल मुदर्रिस मदसये उमराऐ ताईफ
72) शेख महमूद जोहदी। मुदर्रिस मदरसा सौलतिया और हाल काजीयुल कुज्जात रियासत सलामगोर
73) शेख अली अब्दुल्लाह बल्लू। मदारिस महकमा तालीम मक्का मुअज्जमा
74) शेख अहमद हसन मुशात ताजिर मक्का मुअज्जमा
75) मौलवी महबूबर्रहमान कैरानवी। साबिक उस्ताज दारूल उलूम नदवातुलउलमा लखनऊ, हाल उस्ताज अदब मदरसा आलिया कलकत्ता
76) शेख खलील अब्दुर्रहमान। मुदर्रिस मदरसा सौलतिया हाल मुदर्रिस गोवरमिंट स्कूल रियाज़(नजद)
77) शेख मुहम्मद अली मलावी। मुदर्रिस मदरसा सौलतिया और हाल इदारा काकी मोटर वर्कशाप मक्का मुअज्जमा
78) शेख मुहम्मद सईद अबुल खैर मरहूम। साबिक मुदीर औकाफ ममलकत सऊदिया
79) शेख मुहम्मद अली इब्ने तुर्की। साबिक मेम्बर मजलिसे शरई और हाल मुदर्रिस मस्जिद नबवी मदीना मुनव्वरा
80) शेख अब्दुस्समद फिदा। ताजिरे कुतुब मक्का मुअज्जमा
81) हकीम मुहम्मद नईम साहब। तबीब सौलतिया दारूश्शिफा और मुन्तज़िम शौबा ऊर्दू रेडियों स्टेशन ममलकत सऊदिया
82) शेख जुबैर अहमद। मुदर्रिस मदरसा सौलतिया, मोहतमिम मदरसा दारूल उलूम जाविया और हाल मोहतमिम मदरसा अरबिया  फलफलाँ इण्डोनेशिया
83) शेख राज उसमान। मुफ्ती ए शहर कल्लान जावा
84) शेख अब्दुल मजीद। मोहतिमिम मदरसा इस्लामिया जम्बी जावा
85) शेख हसन यहया। मोहतमिम मदरसा नूरूल ईमान जावा
86) शेख कमास अब्दुस्समद। बानीए मदरसा नूरूलईमान जावा
87) शेख मुहम्मद अली मन्सूर। सदर मुदररिस मदरसा इदरिसिया फेरा
88) शेख अबू बकर कमरीन। मुदर्रिस मदरसा इस्लामिया, फलम्बान
89) मुहम्मद मरजूक़ी, मुफतीये फलम्बान
90) क़ारी अलाउददीन, बानीये मदरसा तजवीद कवाला फेरा,जावा
91) शेख ज़ेनुददीन अमीनान। बानी ‘‘मदारिस जात नहज़तुल वतनुददीनयतुल इस्लामिया’’ जावा
92) शेख अब्दुल गनी मवारी। नायब काजी और बानीय मदरसा अरबिया मवार ,जावा
93) शेख अब्दुर रशीद मुहम्मद तैयब। मौहतमिम मदरसा फौलू, जावा
94) शेख मेहमूद मैदान। बानीये मदरसा मुस्तफवीया कदह
95) शेख अब्दुल हलीम। खतीब मौहतमिम मदरसा मुस्तफवीया कदह
96) शेख ताजुददीन सबकी। मुदररिस मदरसा इस्लामिया, समाटरा
97) शेख अब्दुस्समद सालेह। मौहतमिम मदरसा अरबिया, पीनांग
98) शेख खलील अब्दुल जब्बार। साबिक चीफ एकाउटेंट, वजारतए मालिया, ममलकत सऊदिया
99) शेख अब्बास कत्तान मरहूम। साबिक चेयर मेन मक्का मौअज्जमा
100) शेख सुलैमान जुनैदी। मजलिसे इलमी इण्डोनेशिया
वफात हसरते आयात
इस्लाम और मुसलमानों की दीनी और इल्मी हर मुमकिन खिदमत के बाद इस मुजाहिद फी सबीलिल्लाह ने 75 साल की उमर मेें जुमे के रोज़ 22 रमजान उल मुबारक 1308 हि0 में दाईये अजल को लब्बैक कहा और इस्लाम का यह सच्चा खादिम अपनी तमन्ना और आरज़्ाू के मुताबिक पैवन्दे ज़मीने हरम मौहतरम हुआ। जन्नतुल मौअल्लात में हज़रत खदीजतुल कुबरा रजीअल्लाह अनहा के जवार और सद्दीकीन और शुहदा के जुमरे में मदफून हुए।
रहमतुल्लाह अला रेहमतिल्लाह
इस छोटे से अहाते में सिर्फ पाँच कबरें हैं जिनमें अकसर व बेशतर इसी तबक़े के खासाने खुदा, आलमे आखिरत में एक दूसरे के साथ हैं। मेहज़ तारीखी मालूमात के लिए इन बुज़र्गों के नाम दरज जैल हैंः
1.हजरत मौलाना रहमतुल्लाह साहब, 2.हजरत हाजी इमदादुल्लाह साहब 3.नवाब अब्दुल अली खाँ साहब रईस छतारी ज़िला बुलन्द शहर 4.शमसुल उलमा मौलाना मुहम्मद हुसैन साहब इलाहबादी के वालिद 5.मौलाना अब्दुल हक़ साहब शैखुद दलायल मुसन्निफ, ‘‘इकलील शरह मदारिकल तनज़ील’’ 6.मौलवी अजीज बख्श साहब मरहूम बदाँयूनी. 7.मौलाना हजरत नूर साहब, सदर मुदर्रिस मदरसा सौलतिया 8.मौलवी अब्दुल्लाह ग़ाजी साहब साबिक मौहतमिम कुतुब खाना मदरसा सौलतिया व शागिर्द हजरत मौलाना मरहूम 9. शेख अब्दुल हकीम साहब साबिक खजाँची मदरसा। रेहमतुल्ला अलैहिम अजमईन।
कता-ए-तारीख वफात
फखरुल उलमा हज़्ारत मौलाना मुहम्मद रहमतुल्लाह साहब कैरानवी नूरूल्लाहू मरकदहू ,बानीये मदरसा सौलतिया मक्का मौअज्ज़मा ज़ादहल्लाहू शरफन। अज़ मौलवी अहमदुददीन साहब मुतवत्तन चकवाल, ज़िला जेहलुम तिलमीज़ हज़रत मौलाना मरहूमः
आह ज़ीं हीने मसाईब इक़तराँ
मजम-ए-अन्दोह व रंजे बेकराँ
गश्त सब्र अज़ खातिरे गमदीदा गुम
हस्त कौले मसनवी शाहिद बराँ
बिशनू अजने चूँ हिकायत मीकुनद
काईं ने खामा अस्त दिल रा तर्जुमाँ
वज़ जुदाईहा शिकायत मीकुनद
बाज़बाने तेज़ व चश्म खूँ फशाँ
कज नेस्ताँ तामरा बबुरीदा अन्द
सख़्त हैरानम बदस्ते ईं व आँ
दर फिराक़म मर्द व ज़न नालीदा अन्द
गिरिया अम शौरे दमद दर हाजिराँ
सीना खाहम शरहा शरहा अज फिराक़
गर कुनम रंजे निहानी राअयाँ
ताबुगोयम जिकरे दर्दे इश्तियाक़
ज़इन्तक़ाले किबला-ए-अहले दिलाँ
हजरत मखदूमना इल्मुल हुदा
फैज बख्श नाकसाँ व नाकिसाँ
फखरे अहलुल हिन्द फी मुल्किल अरब
बलके दर इस्लामबूल अज़वये निशाँ
दर ईराक़ व हिन्द व मिस्र व शाम व रूम
दर फजाईल गश्ता मुमताज़-ए-ज़माँ
काशतिहारश शमस फी निसफिन नहार
फी बसीतिल अर्ज़ बिल लुतफिल अयाँ
ज़ैरे ईं गुम्बद हजार अहले कमाल
मुशतहर गश्तन्द अम्माने चुनाँ
मातमश यकनेस्त बल सद मातम अस्त
जुल्मते आमद अयाँ अन्दर जहाँ
फोते आलिमे मौते आलम गुफता अन्द
सैयिमा आनाँ कि न आयद मिशले शाँ
1308 हिजरी
बूद दर दुनिया चिरागे दीन व दिल
1308 हिजरी
ताके शेख मुल्के हरमैन गश्त आँ
रोज जुमा बिस्त व दवुम अज़ माहे सोम
1308 हिजरी
रफ्त सूऐ बागे शाह यानी जनाँ
1308 हिजरी
गर्क बादा दर सुयूले फेजे हक
1308 हिजरी
दाम बिल अफज़ाल फी कहफिल अमाँ
चूँके अल्ताफे जनाब आमद बयाद
आँ ज़माँ बर दिल रसद जखमे गराँ
ज़ार मीनालम ज़हाले ज़ार खेश
चूँ नदानम चाराए अन्दोहे जाँ
लाजुर्म चूँ नेस्त दरमाँ गैर सब्र
मी नुमायम बर दुआ खत्मे बयाँ
रहमतुल्लाही अला अस्लाफिही
नेअमतुल्लाह बाद दर अख़्लाफे़ शाँ
गौ ग़रीबुल वतन तारीखे विसाल
रहमतुल्लाह लदै खैरूल जनाँ
1308 हिजरी
……………………………………..
मदरसा सौलतिया की हाजीयों के लिये सहूलतें
.डाकः अपने खतूत मक्का मोअज़्ज़मा में मदरसा सौलतिया के ज़रिये मंगा सकते हैं। पता है
अमानतः मक्का पहूँचने के बाद रक़म मदरसे के शोबाये अमानत में जमा करायें और जब जितनी ज़रूरत हो हासिल करें।
क्यामः हज की सालाना छुटिटयों में मदरसे की तमाम इमारतें खाली रहती हैं जो कि हरम शरीफ के करीब हैं में माकूल मुआवजे के साथ क्याम का इन्तिजाम होता है।
तिब्बी सहूलियात का माकूल इन्तिज़ाम
मतबूआत: मदरसे से बहुत सी किताबें मुफ़्त हासिल कर सकते हैं जैसेः
1.दुआये तवाफ2.दुआये सअी 3.तवाफ विदाअ
4.मारूजे तवाफ5.हज के पाँच दिन 6.मीम नामाऐ हज
7.मनाजाते अरफात8.अक़्वाले सालिहीन आदि।

Maulana Muhammad Rahmatullah Kairanvi & Madrasa Saulatiya, Mecca -shortbook

HIS HOLYNESS THE GREAT Maulana Mohammad Rahmatullah Kairanvi & Madrasa Saulatiya, Mecca

  • Short Book

INTRODUCTION: When the war of independence, fought with the British in India, ended in 1857 C.E., the Muslims, who had beenthe rulers of the Indian sub-continent, where the worstsufferers politically disahled, and economically ruined/ theydispersed to wherever they could find a haven.

मौलाना रहमतुल्लाह कैरानवी और उनकी पुस्तकों पर एक दृष्टि for Hindi reader and

hindi book on archive – ek mujahid memar: maulana rahmatullah kairanvi

In this hour of total discomfiture, the minds of theMuslims, not only of the contemporary generation but alsoof those whicmaulana rahmtullah kairanvi shortbook-introductionh were to come one after the/oilier till far intothe twentieth century, were despoiled of their faith, andIslamic way of thought and heritage. Eminent Ulema of theIndian sub-continent had perceived that Western Political Domination would bring in its wake a new system of educa-tion, with its own system of values, and a meritorious wayof life, wholly alien to Islam. They had foreseen that newclimate would be full of reduction. There would be no placein the new order for the teaching of religion and of theclassica~ languages, in which the religious literature wascurrent. This would call for a supreme effort to keep theMuslim mind anchored to the Faith. They adopted twocourses to counteract this future trend. First they translatedpractically the entire religious literature into the vernaculartongue, Urdu, so that the Muslims of India might not behandicapped in their understanding and study of the Deen (Islam) by their ignorance of the Arabic and.Persian tongues. -The Muslims of the sub-continent are indebted to those Ulema, whose monumental work is preserved in thousands of volumes in the Urdu language for the coming generation. Secondly, they undertook a comparative study of Islam and Christianity. This was forced on them by the circumstances of that era. The U/ema had been cut to the quick by the attacks of the Christian missionaries on Islam and the Holy Prophet. They controverted their objections and arguments in open debates, and left behind a wealth of material con­ taininga critique of Christian beliefs and doctrines. They had but one objective-to make the Mustimmind immune to Christian propaganda and to ensure that the Muslims were not seduced into disbelief. The U/ema have rendered a valuable service indeed.

One party of the mujahids,* which bid farewell to the homeland, and emigrated to the land of the Holy Kaaba, was led by Mulana Rahmatullah Kairanvi. At Mecca Mukarrama, he with his characteristic faith and insight realized the need for an Islamic centre, which would keep alight the torch of Islamic learning, and lead to the resur­genceof Muslim power. His efforts for the achievement of this higher purpose were graced by Allah with success. One hundred five years ago in the year 1290 Hijri he laid the foundations of an institution in the Holy land. His efforts were rewarded and it flourished. Its record of service is a monumentto the sincerity and faith df that nobleman of action. Muslims all over the world are acquainted with the Darul Uloom Haram Saulatiya, which has been imparting education to Muslim students from all parts of the world.

for the last one hundred five years. But after the lapse of nearly a century, Muslims today, by and large, do not know much about the founder of the institution, Hazrat Maulana Rahmatullah Kairanvi, a man of great learning, who had a deep sense of honour, and whose life was spent in striving continually for the cause of Islam.

The Daru1 Uloom Haram Sau1atiya owes its position of importance in the very centre of Islam, to the life of its founder. A detailed account of MauJana’s life and services appeared in the” Nidai-Haram” of Rajab 1370 A.H. The brief account which is presented here is based on that of Nidai-Haram. It is hoped that it will enable the reader to catch a glimpse of history and recognise the value of the struggles and the services of the recent past.

Mohammad Saleem

Nazim Madrasa Saulatiya, Mecca.

Translated by :The Late Mahmood Ahmad Khan

Printed by M.K. Usmani at Technical Printers, Koocha Haji Usmani,1.1. Chundrigar Road, Karachi-Pakistan.

The Victory of Islam in the Sub-continent of India .

The month of Rajab of the year 1270 A.H. is of great significance in the religious life of the Muslims of the Indo­Pakistan sub-continent. In that month, Allah, Exalted, gran­ted success to the Muslims, inspite of the political domina­tion of the country by a Western Power, and inspite of the aggressive activities of Christian missionaries, who had fanned out throughout the country.

Times have now changed, a revolution has occurred in the ways of thought and ways of life of the people. Political rivalries, the repercussions of .international power politics, and the economic difficulties have so besieged the minds of the people, that with the so-called struggles of life and its devastating pace, it has no time for old tales. It has no time for the contemplation of the spirit and of the abiding moral values, which are the substance of life. But so long as history is read, and a living people take pride in their religious and political history and in their achievements, such old annals will continue to be read; and they will con­tinue to inspire the generations to come, and spur them on to greater achievements. People who turn their backs on their heritage, and ignore their past and do not learn from their history, do so at the cost of their survival. The British East India Company, which came out to the East to trade, snatched a country by i.ts machinations from its Muslim rulers and despoiled it. The growing power of the British in the late eighteenth century gave a stimulus to the preaching of Christianity. The initial success’ which the Christian missionaries had with a section of community of the Hindus emboldened them to work for the conversion of the entire populace.

Conversion of the people to the faith of their rulers served the political objective of the East India Company, which was to overthrow the Muslim ruling dynasty and extend its dominion over the whole sub-continent. Christian missionary activity, was accordingly organised systemati­ cally by the British East India Company. It was financed. and otherwise fully aided. Missionary organisations like the Church Mission Society, the Bible Society, the Mission Fund, Mission hospitals, scheols and colleges were establish­ed throughout the part of the country which had’ come under their control. A campaign was launched with’ the help of books, newspapers, magazines and pamphlets to undermine the religious beliefs of the people and to convert them to Christianity. This ostensibly religious activity was not for the sake of the Christian faith as such. it was actually a tool of the East India Company for furthering its political ambitions. The missionary activity was subsidised’ by the Company. Its officials regarded it as their bounden duty to aid and assist, and otherwise extend their patronage to the missionary groups. A party or an organisation, which rides the coat-tails of a government,’becomes a great force. The Christian missionary movement, in consequence, had gained so much ground that, in 1857 C.E. when the question of establishing a bishopric at Delhi arose, the proposal to convert the magnificent Jamia Masjid at Delhi into a church was under serious consideration. The Moghal Emperor was then still on the throne!

This state of affairs infuriated the muslims who already hated the British for having robbed them of their political power. As the Christian missionaries, with the assistance of the entire apparatus of government, were becoming strong and aggressive, the need was felt for a vigorous defence of the frontiers of the Islamic faith. The missionaries, who had bagged large numbers of lower caste Hindus, had misjudged the fibre of the Muslims. The Muslim scholars and religious leaders could not sit quietly in the face of this conspiracy against Islam. The Muslim Ulema met the onslaught of the missionaries and blunted its force. Their Jehad struggle saved the day for Islam. But for their monu­ mental efforts, many Musalmans of the Indian sub-continent might have fallen prey to the missionaries.

Maulana Hali, one of the greatest Indian reformers and poets of the late nineteenth century of the Christian era eulogises the Ulema in the following terms:­

“The Islamic faith in India was surrounded by grave dangers. On the one hand Christian missionaries were an set to prey upon the Muslims. Although during the days of the famine a few lean preys fell to them here and there, they were not satisfied with their progress. They were constantly in searcl1 of something big and spectacular. Their eyes were on the Muslims of India. In their sermons, newspapers and magazines a heavy barrage of propaganda was directed agamst Islam. They would falsify Islamic teaching and present it in an un favourable light. They were wont to criticise the person and character of the Holy Prophet. Several Muslims fell prey to their deceptive propaganda mostly because of their ignorance of the Islamic faith, and because they were destitute and poor, and stood to gain financially. The Ulema (Muslim Scholars) like Maulana Al-e-Hasan, Maulana Rahmatullah and Dr. Wazir Khan, recognised the growing danger. They wrote several books in affirmation of Islam and the rebuttal of Christian doctrines. They also held open debates with Christian scholars. These activities had a salutary effcet. Though these activities had not been started under the aegis of a party they were properly organised. The mosques throughout the country were the strong­holds of the Ulema. This revolutionary movement, therefore, did not face any difficulty in getting off to a start. It only wanted a leader and there could be none more eminently suitable than Maulana Rahmatullah. He organised this movement and appointed Delhi and Agra as its centres. At Agra too he continued to write and publish his works. His party included a large number of extremist Musalmans who were the followers of Hazrat Ismail Shaheed.”

Padre Fonder refers to this movement in these words: “The Ulema of Agra and the Ulema of Delhi together have been engaged for the last two or three years in the study of the Bible, the critical literature of Western scholars, and the commentaries, in order to prove our holy book as false. The result of this effort was that a scholar of Delhi, Molvi Rahmatullah (Kairanvi) wrote two books. He came to Agra with his colleagues in January, 1854, when I was not here, to make arrange­ments for the printing of his books. An open debate took place. About one hundred Muslim scholars were present to assist Molvi Rahmatullah. Their number doublcd on the following day.

” These ULema used to devote their time to the rebuttal of Christian doctrines, without any compensation or reward. Their pupils, who were present in every province and dis­trict, also used to devote their time to this task. The Ulema at the headquarters moved out only if there was something extraordinary. This used to have the desired effect both on the Christian missionaries and the Muslim populace. The reports of the missionaries mention these facts in a manner which is contentious and calculated to cover up the failure of their mission. But from the record of events and the way things have been presented by the Christian missionaries the truth is evident that in every district the Ulema met their challenge boldly and discomfited them.

Padre French, who had the charge of Multan, says in his report :

“The Mullahs, the Syeds and the Makhdooms of Multan were making a concerted effort to keep out the light of God. All of them were the friends of two well­ known persons Molvi Rahmatullah and Dr. Wazir Khan, who as champions of Islam had had a public debate with Dr. Fonder.” Maulana Syed Sulaiman Nadvi in his preface to the life of Shibli says:

“When the Btitish came to power (in India), attacks from three directions were lanuched (against the Muslims. Christian missionaries, with the help of their new found political power, began to attack the faith of Islam. From another direction, the Arya movement of the Hindus (the idol-worshippers), who had now become free from their Muslim rulers, grew bold enough to attack the faith and culture of the Musalmans. From the third direction European learning and culture with its outward glitter began to subjugate the Muslim mind. For meeting the onslaught of the Christian missionaries, Allah raised up men like Maulana Rahmatullah Kairanvi and Dr. Wazir Khan (of Agra), and later Maulana Mohammad Qasim Nanotwi, Maulana Raham Ali Manglori, Maulana Inayet RasuIChirya-koti, Mau­lana Syed Mohammad Ali Mongheri and others. They took the Christian objections and criticism apart. At this juncture the presence of Dr. Wazir Khan and Maulana Rahmatullah in particular, was a Divine help. Who could imagine that in these times of degeneration and political defeat a man like Dr. Wazir Khan, who was an accomplished scholar of Christian lore and their religious books, fully conversant with their secrets, and with the Hebrew and Greek languages, would rise to face Padre Fonder and the Christian missionaries? Who could believe that a man like Dr. Wazir Khan would turn the tables on them with the help of their own books and prove them guilty of perverting their faith! He joined hands with Maulana Rahmatullah and vindicated the position of Islam as the impregnable faith.

“The person of Maulana Mohammad Qasim was like.. wise a sign of Divine help in fighting Dayanand Saras­watlof the Hindu Aryas. Mau1.ana Mohammad Qasim and Maulana Rashid Ahmed Gangohi rose up to preach the true faith and to counte!:, the evil propaganda and the false doctrives of the mushriks. The manner in which this was done and the lasting results that were achieved are now before us.

” The memorable public debate between Maulana Rahmatullah and Padre Fonder was held at Agra in the month of Rajab 1270 A.H. The truth triumphed at Agra, as it had in other smaller districts, and the falsity of Chris­tian doctrines was exposed. An account of this confronta­tion is given elsewhere in this booklet. The Muslims of Indo­Pakistan sub-continent today know Maulana Rahmatullah as the founder of Madrasa Saulatiya at Mecca Moazzama, but generally they do not have an idea of his outstanding personality and of his dedicated efforts in the defence of Islam. A brief account of the life of Maulana Rahmatullah (May Allah have mercy on him) is presented here.

The Maulana:

Maulana Rahmatullah was born in the month of Jamadi­ul-oola 1233 A.H., at Kairana town of Muzaffarnagar District, (Northern India). His home was in Mohallah Darbar Kalan. It is mentioned in some old manuscript records that Kairana had once b~en the capital city of Chauhan Rajputs (a Hindu clan). Rana Kalsa, the Hindu ruler of Kairana was a contemporary of Sultan Mahmood of Ghazmi.. It was during his reign that Syed Salar Masood Ghazi as the head of a party of mujahids invaded India, and passing through Jhinjana attacked Kairana. The tombs of the shaheeds exist to this day in the northern and western outskirts of the town. One tomb in the north which is a few yards long is said to be the collective grave of the Arab shaheeds. The salari community which still inhabits the town is a reminder of the invasion led by Syed Salar Masood Ghazi. These people are of Arab descent. They were the first to inhabit the city and to this day most of them tend camels. During the Tughlak regime, Shaikh Alauddin Ansari was appointed as Qazi for this area. This led to the settlement of Ansars in the town. Kakarzai Afghans came to this place during the reign of Sher Shah Suri. Their descendants still live there.

The Maulaoa’s Nasab (Genealogy) This is the genealogy of Maulana Rahmatullah. . Rahmatullah son of Khalilullah alias Kha]iJur Rahman son of Hakim Najeebullah son of Hakim Habibullah, son of Hakim Abdur Rahim son of Hakim Qutbuddin, son of Hakim Shaikh Hakim Fuzail, son of Hakim Diwan Abdur Rahim (brother of Nawab Muqarrab Khan), son of Hakim Abdul Karim alias Hakim Beena, son of Hakim Hasan, son of Abdus Samad son of Bu-Ali son of Mohammad Yousuf son of Abdul Qadir son of the saint Kabirul Awlia Jalaluddin Mohammad, son of Mahmood, son of Yaqub, son of Isa, son of Ismail, son of Mohammad Taqi, son of Abi Bakr, son of Ali Naqi, son of Usman, son of Abdullah, s(m of Shahabud­din, son of Shaikh Abdur Rahman Gazroni, son of Abdul Aziz Sarakhsi, son of Khalid, son of Walid, son of Abdul Aziz, son of Abdur Rahman Kabir Madani, son of Abdullah as-Sani, son of Abdul Aziz Kabir, son of Abdullah Kabir, son of Amr son of Ameer-ul-Momineen Zun-Noorain Seyadna U sman bin Affan, (May Allah be pleased with him !)

The genealogy of the descendants of Khalifa Usman is preserved in the old records available at the shrine of Hazrat Kabirul-Awlia Makhdoom Jalaluddin at Panipat Several descendants of Hazrat Usman who live at Panipat have got copies of this family tree. The names of all Usmani Jalalis*. were recorded in the genealogical table in the presence of at least twenty prominent persons descended from Jalaluddin.

Makhdoom Kabirul Awlia, who was a contemporary of the great Saint Bu Ali Qalandar of Panipat, had on several occasions requested the Qalandar to admit him formally to his order of disciples. Qalandar Sahib used to put him off by saying, “your teacher is about to appear. Be patient. We will tell you when the time comes.” When Hazrat Khawja Shamsuddin Turk a very famous religion saint was on his way to Panipat, Qalandar Sahib asked Kabirul Awlia to go out of the town to meet and welcome his teacher to Panipat. When he rode out he met afaqir**. After salutations, Khawja Sahib said, “Young man, let me see how you manage your horse. ” He spurred his horse and rode at a gallop. Khawja Sahib was pleased and remarked “what a horse and what a rider!” Makhdoom Jalaluddin suddenly had a feeling of ecstacy, and he fell from the horse. Khawja Sahib embraced him and in the moment of embrace imparted to him the spiritual power. The Khawja admit,ted him to his order of

* descendants of Jalaluddio, a descendant of Hazrat Usman. ** A man of God,

disciples and nominated him as his khalifa. Qalandar Sahib had initiated Mokhdoom Jalaluddin into contemplation and the study of the world of spirit, which was accomplished under the tutorship of Khawja Shamsuddin Turk Panipati. Makhdoom Sahib died at Panipat on 13th Rabiul A wwal 765 AH. His descendants lived for centuries in Mohalla Makhdumzadgan but they were uprooted during the revolu­tion of 1947.

The Advent of Osmanis in India Sultan Mohmood Ghaznavi was a deeply religious man. He was a great patron of the Ulema, the poets and the Scholars. The Ulema enjoyed a distinctive position in his army. Shaikh Abdur Rahman Gazroni the ancestor of Maulana RahmatuIlah, was a Sharai Hakim* in the Sultan’s army. The office of the Qazi-e., Askar (Judge of the army) was a permanent office also during the caliphate of Osmani Turks. Prominent scholars of repute were appointed to this office until the reign of the last Khalifa Sultan Mohammad Reshad Khan V. They had absolute jurisdiction over all Sharia matters pertaining to the army. Shaikh Gazroni (Gazron is a well-known place in the vicinity of Shiraz, Persia) came to India with Sultan Mahmud as his Qazi-e­Askar. When the Sultan invaded the Hindu stronghold and temple at Somnath, the Shaikh also took part in the crusade (jehad). After the consequent of Panipat he settled there. He lies buried close to the fort of Panipat.

Maulana Rahmatullah, Hakim Mohammad Hasan, and Hakim Abdur Rahim were the great grandsons of Hakim .

*A judge who enforces the Sharia Law.

Abdul Karim known as Hakini Bina. When Moghal Em­peror Akbar was on his way back to the capital from Kash­mir, he was entertained to a deer-fight one moonlit night near Lahore. One of the deer suddenly attacked Akbar and gored his thighs with its horns. When his condition grew worse, Hakim Bina was summoned from Panipat at the ins­tance of Abul Faza1. Hakim Bina treated Akbar and he recovered after about. a month. He conferred the title of “Shaikh-uz-Zaman” on Hakim Bina and granted the estate of Kairanato his son Hakim Mohammad Hasan, who had assisted his father in the treatment of the Emperor.

Hakim Mohammad Hasan was the personal physician of Prince Saleem who conferred on him the title of Muqarrab Khan. When Saleem succeeded to the throne as Emperor Jehangir he awarded to him the titles of Muqarrabul Khaqan and Naibus Sultan, and the position of the Commander of five thousand (soldiers). Shortly after coming to the throne Jehangir appointed Nawab Muqarrab Khan as the Governor of the Deccan and Gujrat. In 1618 C.E. when Shahjehan, then a prince, was deputed to the eastern part of the empire, Muqarrab Khan was appointed Governor of Bihar. Hodges, the English traveller and painter had come to Patna in 1620 C.E. during his governorship and had been his guest. Hodges was greatly impressed by th~ man, his power and his kindly treatment of himself. His letters give an account of the Nawab, and are full of his sense of gratitude towards him. The Nawab was appointed Governor of Delhi and Agra in 1621 C.E., and, when Shahjehan ascended the throne, he awarded him an additional estate in the vicinity of Kairana. Hakim Rizqullah Khan, son of the Nawab was the Royal Physician of Shahjehan, and the Commander of eight hundred.. Emperor Aurangzeb Alamgir granted the title of Khani to Rizqullah Khan. He died in 1668 C.E.

Diwan Abdur Rahim and Diwan Abdul Hakim, the younger brothers of Nawab Muqarrab Khan, also occupied prominent positions at the court. Diwan Abdur Rahim was the Royal Physician of Emperor Jehangir. His descendants practise medicine to this day. Several descendants of Diwan Abdur Rahim rose to positions of eminence in the practice of medicine. Hakim Wajeehuddin, the author of Makhzan­e-Hikmat ] 196 A.H.), a book on eastern medicine, and Hakim Ali Akbar, brother of Maulana Rahmatullah are well known.

When Emperor Akbar granted the estate of Kairana to Hakim Bina, the house of Usmani Jalalis migrated from Panipat to settle there. They enlarged the town, built houses and public buildings, planted gardens and enriched the life of the local people. The Nawab’s garden was famous for its beauty, for its pool and pavilion, and chiefly for its variety of mangoes. Jehangir in the sixteenth year of his reign paid a visit to Kairana at the request of Muqarrab Khan. In his Memoirs, Jehangir writes:

“It was the long-standing wish of our sincere and loyal, loving and faithful friend Muqarrab Khan that I should visit his place. I paid a visit to his house and by my presence made it on enviable place. I gave the old faithful friend a gift of some precious stones and other valuables, Rupees three lacs, a garden and a large residential house.

The revolution of 1857 C.E. destroyed a rich Muslim civilization and its glorious legacies The Kairana garden, whose mangoes, according to the author of Tajul Ala’asir” were relished by the people of Delhi for centuries wasrava­ged. The ground, where it once existed, is sti1l known as Naulakha Zamin (the land of the nine hundred thousand). It is said that there were nine hundred thousand plants and trees of different kinds in the garden. The traces of the pavilion built by Muqarrab Khan still exists. When he was the governor of Gujrat he had seven ships salvaged, which had sunk in Surat harbour years ago. Among the goods recovered, there were a few solid pillars of touchstone. Pillars of this semi-precious stone are rare and of great value. Jehangir was apprised of the details of the goods recovered from the ships, which he bestowed on Muqarrab Khan as a gift. He built a small pavilion in the middle of the pool with these pi1lars as underpins. The touchstone pillars are now a part of the Qalandar Sahib’s shrine at Panipat.

East of the garden was a row of buil.dings which housed offices. courts and stables. It was known as the durbar. The palace and residential houses were on the other side of the garden. This area is now known as the Nawab Darwaza. Ruins of these imposing buildings still exists as a reminder of the glory of bye-gone years. The tomb of Nawab Muqar­rab Khan is in the compound of the shrine Qalandar Sahib at Panipat. Its headstone is of one-piece of zahr mohra, a semi precious stone. It is said to be of twenty seven maunds in weight. It is not known with certainty where Diwan Abdur Rahim is buried.

Early life of education Maulana Rahmatullah was born in one of these histo­rical buildings of his forefathers in the Mohalla Durbar. He completed the study of the Quran at the age of twelve and learnt theology and Persian from the elders of his house. He then went to Delhi and joined the M adrasa of Maulana Mohammad Hayat, where he also lodged. When the Mau­lana’s father Molvi Khalilullah in 1250 A.H., took up the position of chief agent of Maharaja Hindu Rao at Delhi, he shifted to his father’s house. After a while the Maulana with some of his colleagues went to Lucknow for further stu­dies and became the pupil of Mufti Saadullah.

The list of the teachers of Maulana Rahmatullah in­ cludes the following illustrious names:­

  1. Maulana Mohammad Hayat of Delhi.
  2. Maulana Mufti Saadullah.
  3. Maulana Ahmad Ali of Badoli (Muzaffarnagar) who later became the Prime Minister of Patiala State.
  4. Arif Billah Maulana Abdur Rahman Chishti. He was the tutor of the King and an accomplished scholar. Among the fellow pupils of the Maulana at this time were Manlana Abdur Rahman Punjabi, Maulana Syed Mohammad Ali, who was later re~ vered as a saint. Maulana Shah Abdur Rahman Chishti and Maulana Mohammad Hayat were buried in Basti Nizamuddin Aulia, Delhi. 4
  5. Molvi Imam Baksh Sahbai.
  6. Hakim Faiz Mohammad a renowned physician of his time. Following the family tradition the Mau­lana studied medicine.
  7. He also studied mathematics.

Teaching carrier The Maulana’s career in India as a teacher was brief. The times were difficult. Political and social changes had created disturbed conditions. The growing power of the Christians, and the aggressive posture of their missionaries, weighed heavily on his mind. tIe could not, therefore, settle down as a teacher. After completing his education, he set up a school in the mosque of Darbar Kairana, where he taught for a few years, until the memorable debate with the Christians at Agra brought this career to an end.

The names of a few notable Ulerna, who were his stu­dents at this time, and who later continued their education at Mecca Moazzama, are given below:

  1. Maulana Abdus Sami Rampuri, author of Harnde-bari.
  2. Maulana Ahmaduddin Chakwali,
  3. Maulana Noor Ahmad Amratsari,

4.Maulana Shah Abdul khairi,

5.Maulana Shah Sharful Haq Siddiqi,

  1. Molvi Qari Shahabuddin Usmani Kairanvi,

7.Maulana Hafizuddin Dujanvi,

  1. Maulana Imam Ali Usmani Kairanvi,

9.Maulana Abdul Wahab Vellori, founder of Mad­asa Baqiyat-us-Salehat, Madras (India),

10.Maulana Badrul Islam Usmani Kairanvi, Director of the Royal Hamidia Library at Constantinople (Istanbul).

The Maulana was married to one of his relatives in 1256 A.H. He and his father were recalled to his service by Maharaja Hindu Rao at Delhi in the following year, where he acted as the Maharaja’s chief agent. The Maulana’s father, Molvi Khalilullah died after a short while. The Maulana thereafter decided to give up service and return to Kairana, in order to attend to family problems. He had his younger brother, Molvi Mohammad Jalil, appointed in his place, and returned home. Here he set up his Madrasa and also devoted his attention to the serious situation ari­sing out of the attack of Christian missionaries on Islam, which were growing sharper. He now began work on his book, lzalatul-Auham.

While he was working on this book, he fell ill. His condition grew so serious that he could not move, and could say his daily prayers only by signs. There was no improve­ment in his condition. This was a cause Qf great anxiety to his family and his students. One day after the morning !.fajr) prayers, his eyes filled ,with tears; and he started cry­ing. Those with him thought that he had despaired of his recovery, and began to comfort him. He said to them, “By Allah’ there is apparently no indication that I shall recover, but, God willing, I will, very soon. I cried because last night I saw in a dream that the Holy Prophet, peace be on

him, had come accompanied by Siddiqi-i-Akbar, Abu Bakr. The Great Siddiq said to me, “Young man, here are good tidings for you from the Messenger of Allah: if your work on the book Tzafatul-Auham has been the cause of this ill­ness, the same will be the cause of your recovery.” I was comforted and infinitely pleased to hear the good tiding, and I wept for joy.” Christians’ attacks on Islam The Maulana recovered soon after and resumed his work on the book. Those were the days when the sordid campaign of Christian missionaries against Islam had crea­ttd unrest throughout the sub-continent. Padre C.C.P. Fonder was at the head of this campaign. His speeches and his book, Meezanul Haq had caused great resentment among the Muslims. The Ulema had so far silently ignored the missionary activity. This attitude had on the one hand em­boldened the Christians, and on the other, was beginning to have a demoralising effect on those, who were illiterate. The Ulema, therefore, decided to counter the missionary attacks in a firm manner. They collected material for this purpose in order to strive in the cause of Allah, and vindi­cate the position of Islam as the true faith. The Maulana was the first person to lead this crusade against the Chris­tians. He announced. “I have asked the leading Padre of India (Dr. Fonder) who occupies a prominent position in Christiandom, and who is the author of Mi;:,anul Haq, to meet me in an open debate, so that the truth is established, and it becomes known to all that the

U/ema had ignored the pamphlets issued by Chris­tian missionaries (containing attacks on Islam), be­cause they regarded them as unworthy and undeser­ving of rebuttal, and not because they had nothing to say in this regard.” The debate with Fonder The Maulana accompanied by his friend, Molvi Mo­hammad Amirullah, Mir Mukhtar of the Raja of Benaras (who was acquainted with Padre Fonder), called on the Padre at his house, but he was not at home. The Maulana wrote a letter to him on 23rd March, 1854 C.E.; and after the exchange of several letters, the subject of the debate and date and place for it were appointed. After the prelimina­ries had been settled by mutual agreement the first session of the debate was held on the morning of 11th Rajab, 1270 A.H. (lOth ApriI1854), in Katra Abdul Masih, Agra. Mau­lana Rahmatullah was assisted by Dr. Mohammad Wazir Khan, and Dr. Fonder was assisted by Padre French. The debate was attended by Smith, District Revenue Officer; Christians Chairman of the Provincial Board; William, the local magistrate; Lately the Government’s spokesman; Padre William Gilben, Mufti Riazuddin, Molvi Faiz Ahmad, Molvi Hazur Ahmed, Molvi Amirullah, Molvi Qamrul Islam, the Imam of Jamia Masjid, Agra; Munshi Khadim Ali, manager of the newspaper Mat/aul Akbar; and Munshi Sirajul Haq, among others. The place was full of people as they were interested in the outcome of the debate. It should be noted that the Christians had the backin~ of the Govern­ment. The British were an alien people, and their conquest of the country was both recent and ruthless, and the people .

had been cowed down and strangulated economically. But in the defence on Islam they knew no fear. First Padr~ Fonder addressed the audience in these words: “It is necessary to know how this debate waS “fixed. It is du~ to the wishes and persistence of JVfaulana . Rahmatullah. I do not think that it will be of any advantage, or a result will Come out of it. It is, however, my ardent desire to present the true nature of the Christian religion b~fore the Muslims. The subjects of this debate are: abrogation of earlier revelations and interpolations in the text of the Bible, the divinity of Christ; his life and the doctrine of trinity; and the prophethood of Mo­ hammad (peace be on him).” Maulana Rahmatullah then opened the debate on abro­gation and the corruption of the text of the Bible. He pro­ved that the text of the Bible had been forged and corrupted, both from internal evidence and by citing several works of Christian scholars in evidence. Finally Padre Fonder, in reply to a question put to him by Or. Wazir Khan, adlhitted that in seven or eight places the original text of the Bible had been changed. Molvi Qamrul Islam, the Imam of lamia Masjid, asked Munshi Khaditn Ali to record that Padre Fonder had admitted that the text of the Bible had been forged in seven or eight places. Fonder said “yes, yes, do record it, the text has been corrupted to this extent only but the holy books have not suffered from any defect because of it.” The Maulana said, “if a single item in a legal docu­ ment is proved to be forged, the entire document is regarded as unreliable. In the case of the Bible, Padre Fonder has

admitted forgery in seven or eight places, and he would still like us to believe that the book is reliable.” At this stage, the debate was adjourned at the instance of Fonder. The next day the debate was resumed at the appointed time and place. As it had received wide publicity, there was an audience of over one thousand prominent persons on the second day. A few prominent Hindus like Dr. Mukand Lal, Hakim Jawaher Lal, Raja Balwan Singh Kashi, and Pandit Jugal Kishore were also present. , I Debate was continued on the subject of forgeries in the text of the Bible. Christian scholars began to hedge and prevaricate. But they were cornered and they could not stave off defeat. It is natural for tempers to rise in such a situation. Padre French, therefore, began to show temper and, the debate proved inconclusive. Fonder thereafter avoided meeting Maulana Rahmatullah in open public debate and, entered into correspondence with Dr. Moham­mad Wazir Khan. The exchange of letters which began on 1st May, 1854 C. E. ended on 16th August, 1854. Fonder had been discomfitted in open debate. Dr. Wazir, there­fore, in his first letter to Fonder wrote: “You should first give a reply to the questions raised by Maulana Rahmatullah. If you still wish to go on with the open debate, you should admit that the text of the Bible has been forged or corrupted in several places and, that the Bible has been superseded and its laws abrogated by the Holy Quran. We will then take up the question of trinity for debate, and when that issue is settled we shall discuss the prophethood of the last of the prophets, Mohammad, peace be on him.”

The Maulana had repeatedly asserted that the Chris­tians’ call to people to embrace Christianity was a great deception as “their Gospel is not wholly authentic. It has suffered from forgeries and corruption of the text, on a large scale, at the hands of Christian priests; and since the original Gospel does not exist anywhere, the very founda­tions of the Christian faith are hollow,” It was an important condidition of the Agra confron­tation that the Maulana would embrace Christianity if he were unable to satisfy the objections of Fonder; and in the other eventuality, Fonder would embrace Islam. The Maulana’s task in the debate was (a) to prove the prophethood of the Holy Prophet, peace be on him, (b) to prove that the Holy Quran is a Divine Book, and that it has been preserved in its original and pure state to this day, no attempt having been made ever to make interpolations in the text, (c) to prove the doctrine of trinity as false and, to prove that large scale forgeries have been made in the text of the Bible. Fonder, on the other hand, had to justify the doctrine of trinity. He had to prove that the existing Gospel was the same scriptures which Jesus Christ preached, that is, there had been no attempt at forgery or replacement of the text. The Maulana, by the Grace of Allah, proved in the two-day debate that the existing Gospel which the Chris­tians are proud of, was a forgery and was not the original and complete Scriptures. Fonder admitted the fact of the forgeries before the public.

The debate was not held on the third day. Fonder , I s.void~d the public debate, and in order to save face, wrote a letter to the Maulana saying: “I accept at face value the Biblical references which you quoted in the debate. But I am sending you here. with an explanatory note which will show that the references quoted by you do not mean what you under­stood. ”

If Fonder had thought that he had made good his escape, he Was mistaken. The Maulana wrote a detailetl reply refuting his arguments. Cotrespondence 011 this sub­ ject continued till the 23rd April, 1854. The proceedings of the Agra debate were compiled by Waziruddin and pub­lished by Hafiz Abdullah at Fakhrul Matabe, Delhi, in 1270 A. H. under the title of Al-bahth al sharif-fi-isbat un­naskh wat tallrif (debate on the abrogation of earlier scrip­tures, and interpolations in the text of the Bible). It was distributed to all parts of India by order of the Crown Prince, Mirza Fakhruddin son of Sirajuddin Bahadllr Shah’ Zafar, the Moghal Emperor. The book contains the pro­ceedings of the public debate, and some letters ~xchanged between the Maulana and Padre Fonder. The proceedings were also printed in tWo volumes, at Agta (Akbar-Abad) by Matba Munamiah and published by Syed Abdullah Akbarabadi in 1211 A. H. The first part tobtairis the proceedings of the debate in the Persian lan­ guage, in which the debate was carried on between Dr. Mohammad Wazir Khan and Dr. Fonder. The Arabic translation of this book was printed on the margin of the book Izharul Huq

Huq published at Cairo in 1317 A. H., by Matba Mahmoodiah. In order to stem the onslaught of the Christian missionaries and to counter their propaganda against Islam, the Maulana wrote the following books in rejection of Christianity

 

  1. Izharul Huq (The Declaration of truth)

The book was written in Arabic at the instance of Khalifa Sultan Abdul Aziz of Turkey, and Khairuddin Pasha Tunisi, the grand wazir. It contains a detailed account of the Agra debate, and a comprehensive discussion of several other tenets of the Christian faith. The Maulana undertook this work at Constantinople (Istanbul) on the 16th Rajab, 1280 A: H. and completed it in late Zil Hijjah of the same year. It was first published at Constantinople in 1281 A. H. The Grand Wazir, had it translated into the Turkish language, and printed under the title, Abrazul Haq. The Sultan’s government had the book translated and published in several European languages which the Christian priests took great pains to suppress. The book went through several editions in Egypt. Molvi Saleemullah had translated the book into Urdu but it could not be published(now published name“Bible se quran tak”. Molvi Ghulam Mohammad Bhanja-randeri translated it into Gujrati language, which has been published. When the English translation of the b’ook was published, the Times of London, in its review, said that, the progress of Christianity would cease if people were

Original Title: Izhar ul Haq –

Truth Revealed Maulana M Rahmatullah Kairanvi Volume 4 – Volumes [Hardcover],

   

to go on reading this book. An Urdu translation of the book is now being printed by Darul-Uloom, Korangi, Karachi. This is the sole book in rejec­ tion of Christianity which has not been challenged by Christendom. The Izharul Haq consists of six detailed chapters on the following subjects:

(a) A critical examination of the books of the Old and New Testament.

(b) Proof of forgeries in the text of the Bible.

(c) Proof of the annulment of the Bible and its supercession by the Holy Quran.

  1. d) That the doctrine of trinity is concocted and false.

(e) That the Holy Quran is the Word of Allah.

(f) 2. Proof of the Prophethood of Mohammad,!I peace be on him, and answers to the criticism of the Christian priests.

 PDF izhar ul haq (english) on archive.org

part 1 pages 52, part 2 pages 133,  part 3 pages 286 ,  part 4 pages 154

اظہار الحق دفاع اسلام اور رد مسیحیت کے موضوع پر لکھی گئی ایک کتاب ہے، جس کے مصنف مولانا رحمت اللہ کیرانوی ہیں جنہوں نے یہ کتاب ایک مسیحی مبلغ کارل گوٹلیب فینڈر کی کتاب میزان الحق کے جواب میں لکھی تھی۔ دونوں کتب عربی میں ہیں۔ اظہار الحق کا اردو ترجمہ مفتی محمد تقی عثمانی نے “بائبل سے قرآن تک” کے نام سے کیا ہے۔ یہ تین جلدوں پر مشتمل ہے۔


shopy “Izharul haq” in urdu at atmazon.in

  1. lzalatul Auham (Removal of Misconceptions)

This book is in Persian and contains 564 pages. It was printed bySyed Qewamuddin at Syedul MMabe, Kucha Bulaqi Begum, Delhi in 1269 A. H. It deals with the objections raised by Padre Fonder in his book Meezanul Haq, and forcefully rejects the claim of Christianity to be the. true faith.

  1. Izalatush Shukook (Removal of Doubts)

This book contains answers to the twenty nine questions which contemporary Christian scholars

had put to the Muslim Ulema regarding Islam. It was written and published in 1268 A.H. (1854 C.E.) in two volumes (1116 pages). The book was written at the instance of the Crown Prince Mohammad Fakhruddin.

Izalah Tul Shukook ازالۃ الشکوک Vol 2

https://archive.org/details/IzalahTulShukookVol2

  1. Ijaz-i Eeswi (The Miracle of Jesus).

The book was written at Agra in 1229 A.H It was first published at Agra. The second edition was printed at Matba Rizvi, Delhi. It contain’s 200 pages and proves that the New Testament is unre­liable and is not the Divine Book which was revea. led to Jesus Christ.

  1. Ahsanul Ahadith fi Ibtalit Tathlith. (Arguments proving the doctrine of trinity to be false)

The book was written in 1271 A. H. and printed at Matba Rizvi, Delhi in 1291 A.H. 6. Burooq-e-Lamea (The Bright Flashes) The book gives proof of the prophethood of the Holy Prophet. It also proves that he was the Last Prophet, and no prophet will ever appear after him. The book is unpublished.

  1. Al-bahth-us-Sharif fi lthbat un Naskh, wat Tahrif (A treatise on the abrogation and corruption Of the Bfuk) .

Pages 56, Printed at Fakhrul Matabe Delhi in 1270 A.H.

  1. Mauddil Ewajajul Mizan* The book was written inl refutation of Fonder’s book Meezanul Haq. It was not published, but from Padre Safdar Ali’s article in the magazine, Noor A/shan of 24th July, 1884 C.E. it appears that he had a manuscript of the book with him.
  2. Taqleebul Mala’in (The Reversal of Objections) The book was written in refutation of Padre Los­ mond’s book Tahqeeq-e-Din-e-Haq. It is unpub­ lished.
  3. Mayarut Tahqeeq (The standard of Research) This book answers the various objections raised by Padre Safdar AU, the Indian Christian, in his book, Tahqeequ/-Imam. THE REVOLUTION OF 1857 C. E. The Moghal power in India had been on the decline since the latter half of the eighteenth century. The Revolu­ tion of 1857 brought ab:)ut the overthrow of the Moghals and the complete domination of the Indian sub-continent by the British. The dissensions among the Muslim rulers, and the Muslims’ neglect of their faith and their polity, led to this catastrophe. But among the Ulema there was a group, which believed in action and regarded it as a duty imposed by faith. Those Ulema took to the field of battle to do their duty.

They rolled in blood and dust, They blazed a trial of glory, May the Lord have Mercy On these lovers pure and good. (Hafiz Shirazi)

The Shaikhs and MusHm Gujars owned most of the land in the district around Kairana and ShamIi. They were deeply attached to their faith and they were courageous people. They opened a front against the British with Thana Bhawan and Kairana as its axis. The mujahids fought the British forces and attacked ShamIi tehsil. The mujahid movement had steadily gained wide support. Ha,ji lmdad­uIlah, May Allah have mercy on him, and Mol vi Abdul Hakim Thanvi were in command in Thana Bhawan. Maulana Rahmatullah and Chowdhury Azimuddill the head of the Gujar community fought against the British forces in Kairana. During this period the mujahids used to gather to the call of the drum at the step of Kairana’s lamia Masjid after asr (afternoon prayers). Before the orders of the day ~ were communicated the announcement would be made.

The land belongs to Allah and Command vests in Molvi Rahmatullah.

Kairana had developed into a strong front against the British, and there was apparently no reason to suspect that the mujahids would be defeated. But the activities of some traitors, who were in league with the British, and the cons­piracies hatched by their spies changed the. situation. British infantry and artillery entered Kairana. The artillery took up position in front of Mohallah Durbar, which was

surrounded; and men, women and children were brutally dragged out of their homes. The search was on for Maulana Rahmatullah, as the spies had reported that he was in hiding in the Durbar. The Maulana with the remnants of his followers had escaped to Panjeeth, a nearby village, inhabited by Muslim Gujars, who had also taken part in the fighting. A detachment of British cavalry was deputed to Panjeeth to arrest the Maulana. The news reached the Maulana and the headman of the village in no time. The headman immediately dis­persed the party of mujahids and asked the Maulana to pick up a hoe, go out in the field and work as a farm hand. There was no time to lose and the Maulana was out work­ing in the field. Moments later the British cavalry rode at a gallop through the field where he was working. The Maulana said in later years “I was hoeing in the field and 1 . saw them riding past by me. The dust and pebbles raised by the hoofs of tl1eir horses hit me as they galloped away.” JOURNEY TO THE HEJAZ 11’1 The British cavalry surrounded the village, arrested the headman, and searched every house, but they could not lay their hands on the Maulana. The f0rce returned to Kairana and, resistance having come to an end. the area came under the complete control of the British. Warrants for the arrest of the Maulana were issued and, he was declare~ a rebel and absconder. A reward of Rupees one thousand for his arrest was also announced. The Maulana under’ the alias of Muslehuddin journeyed on foot to I)elhi. This was a time of great trial and tribulations for him. During this period

Allah sustained his ,courage, determination and perseve­rance. He patiently endured the severe difficulties he faced. He continued his jOUlney on foot through the desert of Jodhpur and the dangerous wastes of Rajputana (now Rajisthan) and reached SUrat. It was then a prominent port on the west coast of India, well known for the traffic of Muslim pilgrims to the Hejaz. The sea voyage in those days was not an easy proposition, as the sailing ships depending on favourable winds, could sail outwards nor­mally once in a year. Carriage of a letter used to cost four Rupees. Those who wished to give up their homes and emigrate to the Holy Land of the Hejaz, had perforce to sever all connections with their family and friends for good, because of the difficult means of communication. After his departure from India, the entire estate belong­ing to the Maulana and to every member of his family was confiscated. The Maulana’s lands, serais and other property in Panipat were identified by the British spy, Kamaluddin. The entire property was sold for a song. Worth several lacs of Rupees, it was auctioned for only Rupees one thousand four hundred and twenty. This is part of the official record of Karnal district for the year 1862 C. E. Some other lands were confiscated. RAHMATULLAH IN BAITULLAH This courageous man of action, after ~oing through the perils of an arduous journey reached the centre of Islam. He wished to serve the cause of rslam in some form here at Mecca under the blessed walls of the Holy Kaabah. Several Ulema belonging to this. group of mujahids had emigrated

to the Hejaz. Hazrat Haji Imdadullah who was one of them, had reached Mecca earlier. The Maulana reached Mecca at dawn one day and headed straight for the Kaabah. While performing tauaf (circumambulation) he met Haji Sahib. They performed the tawafand sa’i (seven rounds between the rocks of Safa and Marwah) together and returned to the Dawoodia hostel. Syed Ahmad Dahlan was then the Shaikhul Ulema. He taught in the Masjid Haram and, his lectures were attended by a large number of students and other people. Sharif Abdullah bin Awn bin Mohammad was the Governor of Mecca. Sultan Abdul Aziz reigned as the Khalifa at Constantinople. The Maulana used to meet the U/ema and teachers often in the Haram and attend the lectures of the Shaikh, who belonged to the Shafei school. One day in his discourse on a point of fiqh he extolled the Shafei viewpoint and tried to show the weakness in the Hanafi standpoint on the same ques­tion. After the discourse was over, the Maulana met the Shaikh. and requested him, as a student, for a clarification of the point which had been the subject of his discourse. The Shaikh realized after a brief discussion that he was no student, and asked him to introduce himself. The Maulana did so briefly. The Shaikh invited him to dinner at his home the next day. The Maulana and his close friend Hazrat Haji Imdadullah spent a long time with the Shaikh the following day. He gave a detailed account of the revolution of 1857 in India and, of the fall of the Muslims from power, of the Christian’s missionary activities, and total discomfiture in the open debates that were held at Agra and other places. The Shaikh was highly pleased and, embraced the Maulana warmly. He gave permission

to the Maulana to teach in the Masjid Haram and hisname entered in the official roll of teachers. VISIT TO CONSTANTINOPLE Meanwhile Sultan Abdul Aziz sent afirman (order) to the Governor of Mecca asking him to compile from the reports of the Ulema and other well-informed pilgrims from India, a detailed account of the debate with Fonder and of the Indian revolution of 1857, and send it to him. The Governor mentioned this to Shaikh Syed Ahmad Dahlan. He told him that the very scholar, who had debated the issues with Fonder, was in Mecca. The Shaikh took the Maulana to meet the Governor the following day. The Governor sent a report to the Sultan who desired that the Maulana should come to Constantinople. He left for the Ottoman capital as a royal guest in ]280 A. H. (1864 C.E.) The Sultan was anxious to know the details of the events in India, because Fonder had come to C onstanti­nople. He had left India after the revolution of 1857 and spent some time in Swizerland and Germany. The Church Mission Society of London then assigned him to Turkey. He had a mischievous nature and, soon after his arrival at Constantinople, he had made it public that, the Christians had won in the debate held in India, that Islam had been vanquished and the Ulema had failed to meet the Christian’s argument and criticism. He had also announced that large. numbers of Indian Muslims were embracing Christianity. This news had upset the Sultan and the Turkish people. When Fonder learnt that his old adversary Maulana Rahmatullah was coming to Constantinople he went in hiding, and disappeared from the scene. The Sultan con

vened a meeting of the Ulerna, high officials and other scho­lars to hear the account of the events in India from the Maulana. The Sliltan’s Government, in order to check the Christian’s malicious activities, had the missionaries arres­ted and deported. Their books and other missionary lite­rature were banned. The Sultan received the Maulana in audience often after the isha prayers. Khairuddin Pasha Tunisi, the grand wazir, and the Shaikhul Islam also participated in these gatherings. The Sultan in appreciation of his notable service to the cause of Islam, awarded him the Majeedi Medal II Class and, granted him a handsome monthly allowance. It was in deference to the wishes of the Sultan and of Khairuddin Pasha that the Maulana began work on his famous book Izharul Haq in Rajab 1280 A.H. He completed it six months later, and presented it to the Sultan. The Pasha said to the Maulana that he had written the book at the instance of the Sultan and it would, therefore, have been proper, if the Sultan’s name instead of the Shaikhul Ulema’s had been mentioned in the introduction. The Maulana rep­lied that this was a service purely in the cause of Islam, and, therefore, no trace of mundane purpose or wordly gain should taint it. Besides it was the Shaikhul Ulema at Mecca who had first asked him to write the book and he had al­ready begun preliminary work on it there. The Maulana also told him, but for the Shaikh he would pot have had access to the Governor of Mecca and through him to the Sultan, to be able to render this service. The reasons given by the Maulana were highly appreciated.

During his stay at Constantinople he had frequent occa­sions to meet the Ulema and other men of learning, and dis­cuss several religious matters. He perceived that Western thought and mores had begun to penetrate this bastion of the Islamic faith also. He realised its probable repercussions and, in order to affirm belief in prophethood and revelation, resurrection and life after death, and other tenets of Islamic faith, he wrote a treatise which dealt with these subjects on a rational and logical basis. It was written in 1281 A. H. and printed at Constantinople by order of Khairuddin Pasha, the grand wazir. This treatise was also printed as an appendix to some of the editions of the lzharul Haq pub­lished at Cairo. The Maulana, on his return from Constantinople, settled down as a teacher in the Masjid-e-Haram at Mecca. First he toolcup the teaching of logic and philosophy and later introduced astronomy, which had not been taught in the Hejaz. Etymology was not taught as a separate subject but as an adjunct of the science of syntas. He introduced the study of etymology as a separate subject. I’ The Maulana gave careful thought to the problems of education, the method in force and the needs of the people. He came to the conclusion that an institution for religious education should be set up which would be worthy of Mecca, the centre of Islam. His plan envisaged that the teaching staff should be drawn from the Ulema belonging to different countries, and the syllabus should also be comprehensive enough to meet the spiritual and wordly needs of the stu­dents. The Ottoman government had been spending large sums of money on education and other development pro­

grommes in Mecca. But the effort was not properly orga­nized and the results were not satisfactory. He thought that the following factors were responsible for the static condi­tion of education :~ (a) There was no prescribed syllabus for various stages of education. (b) The Ulema did not have an organized method of teaching. There was no conception of primary or intermediate classes etc. (c) It was the teacher’s practice to read out a passage from the book and thereafter explain its meaning. The students treated it as if it were a sermon. Since they did not exercise their minds, their intel­lectual development was not satisfactory. Discus­sion on any point by the students was frowned upon. (d) As there was no curriculum, students who spent years learning lafseer (exegesis) hadith and jiqh (law) did not become accomplished scholars. It took seven years for instance to teach Tafseer Jalalayn, which the students in India studied in one year. There was neither an iterest in the study of other subjects nor adequate teaching capacity. (e) There was no arrangement for the education of the, children of the immigrants from other Muslim countries. Because of this neglect they were living in degrading conditions. (f) Mecca attracted a large number of students from all over the world but there was neit.her an orga

nized course of study nor adequate arrangements for their board and lodging. The Maulana was the first person who made an assess­ment of the needs and prepared a plan for an institution, which would be an humble successor of the glorious mad­rasa of Abdullah bin Abbas, Allah be pleased with them. He also planned to establish an industrial institution for im­parting training in handicrafts and industry to the children of the immigrants and of the local people in order to equip them to earn their livelihood. His unceasing efforts bore fruit. A large number of immigrants and pilgrims from the Indo-Pakistan sub-conti­nent gave handsome donations. The first appeal for funds, was made on the 1st Ramadhan 1290 A. H. The following is the text of the appeal ;­ “Praise b~ to Allah and salat and salam be on the Holy Prophet. Thanks to the generosity of several Muslims of India, some work for the public good has been done in the two Harams (Mecca and Medina), for instance lodging houses for pilgrims and watering places for the pnblic have been built. But as yet a ma Jrasa has not been established through. their efforts, though teaching has a prime position among good works. It is therefore reques­ted that those who wish to associate themselves with this good work, may kindly register their names together with the amount of th.eir monthly contributions. Even’if the amount is small it would be welcome. The rules for the management of the

institution will be framed after due deliberations by a body, whose members will be appointed after consultation. ” It was decided to set up the madrasa in a portion of the residential house of a prominent immigrant, Nawab Faiz Ahmad Khan of Aligarh (India). It was also decided that the immigrants from the Indo-Pakistan sub-continent should form the mainstay of this institution. Saulat-un Nisa Begum The H aj season of the year 1290 A. H. proved to be a blessing for the madrasa. Saulat-un-Nisa Begam a widow from Calcutta, came as a pilgrim to Mecca with her daugter and son-in-law. She was a generous woman of faith and determination. It is the wish of many good people of com­fortable means, who come to the Hejaz, to do some work for the public good in the two Harams, so that Allah may be pleased to count it towards their merit. The Begam had come with a similar intention. She wanted to build a lodg­ing house for the pilgrims. Her son-in-law who often atten­ded the Maulana’s lectures in the Haram, one day sought his advice about the Begam’s project. The Maulana told him that there was no dearth of lodging houses in Mecca Mukarramah and Medina Munawwarah, but there was a crying need for a good madrasa, as there was no regular institution in Mecca Mukarramah. The Begam agreed with his advice. The next day she saw the Maulana, and asked him to purchase land for the madrasa. A plot of land was purchased in Mohallah Khandreesah, and construction work was started soon thereafter. The Begam l!sed to visit the site often to see the progress of the work. She was grateful

Allah for having granted her the opportunity for doing this public service. A memorandum recorded by the Maulana in the first register of the Madrasa reads: . “Praise be to A.11ah and salat and salam be on the Holy prophet. The Madrasa Hindyah was estab­lished at Mecca Mukarramah (May Al1ah enhance its dignity) with the help of the Indian Muslims in Ramadhan 1290 A.H. But certain difficulties caused frequent dislocations during the last four months of that year. We, therefore, do not count those four months and reckon the establishment of the Madrasa as from the month of Muharram 1291 A. H. All matters concerning it are recorded with reference to this year. 0 Allah, grant that this task may be accomplished successfully. May His grace and favours be on us. “The school and the students were shifted to Madrasa Saulatiya Jadidah on Wednesday the 12th Sha’ban 1291 A. H. Nawab Mahmood Ali Khan of Chhatari has offered to contribute Rupees one hundred per month effective 1st Sha’ban 1292 A. H.” . It was due to the Begam’s munificence that the Madra­sa was established in its own buildings. The Maulana in recognition of her generous services to the cause of Islamic education named the madrasa after her as Mad­rasa Saulatiya. He thought that this would be a fitting and lasting tribute to the memory of this noble lady in the capi­tal of Islam.

Founders of new projects normally face several prob­lems but they are of the usual type. The Maulana how­ever, came up against two unusual problems which had never occurred to him. lil’ I “1 I”U’ The British Consul at Jeddah was worried by the Maulana’s activities. The Maulana’s role in the events that had occurred in India in 1857 C. E. was wen known. The British were worried by the thought that he could use the Madrasa as a cover for his anti-British activities. The Consul therefore made every effort he could, to hinder the project. The second problem was, that the Turkish settlers in the Hejaz, who knew that the Madrasa was being set up with the help of Indian Muslims, feared that this might lead to political intervention in the Hejaz by a foreign power. The Turkish fears were based on their unhappy experience with the Christian missions and their parapher­na1ia of charitable and social works in their own country. The Maulana, however, faced these new difficulties boldly and surmounted them. His sincerity and perseverance in the service of the Muslims, dispelled the fears of the local Turks, who were won over to his cause.

THE OBJECTIVES: When the Maulana established this institution he had three main objectives before him:

(a) to provide educational facilities with board and . lodging for students from all over the world, who come to Mecca with the desire to pursue their studies in the capital of Islam.

(b) to provide educational and! vocational training facilities for the children of the immigrants so that they are integrated with the community and become useful members of the society.

(c) to remove the impression that’the Indian Muslims did not, recite the Quran correctly, since Arabic become useful was not’ their mother tongue.

THE POLICY OF THE MADRASA: He laid down certain principles of behaviour for the students and teachers of the Madrasa and insisted on a strict observance of the following: (a) th~y should keep aloof from aU political activities. (b) they should abstain from a discussion of those matterswhich were controversial or were likely to raise controversies~ (c) they should eschew their rivalries and differences; and should not allow the Madrasa community to be divided into rival groups. The observance of those principles over the years enhanced the reputation and prestige of the Madrasa. Maulana Mohammad AIi, the great Indian Muslim leader and founder of Darul Uloom Nadwatul Ulerna, referred to these special features of the M adrasa in one of his writings fifty years ago: “It is the good fortune of the’ M adrasa, which is in fact a fruit ofthe late Maulana’slloble intentions; that, teachers and students have not become involved in the critical events of the time. Their ideas are sound.

They do not take up extreme positions. They niether underrate an issue nor do they give it undue emphasis. They do not have a disputant nature; and the thought of branding one Muslim or the other as a heretic or sinner is far from their minds. Praise be to Allah. It is indeed Allah’s great favour if one is able to avoid dissensions of this sort during these critical times. The Madrasa is indeed a blessed institution.” SECOND VISIT TO CONSTANTINOPLE: Usman Nuri Pasha was appointed governor. of the Hejaz in 1299 A. H. He was a soldier and was not familiar with the niceties of administration. Some selfish and mis­chievous people were successful in creating misunderstand­ings between the Governor and the Maufana. The Pasha came to regard the Madrasa as an alien movement and he became one of its chief opponents. The report of their differences reached the Sultan., The cases of both parties were presented bef~re him. It was against the exp,ectations of the Pasha that the Maulana was summoned to the capital. His diary contains a detailed account of this visit. III It is recorded that he left Mecca on 20th Rabiul A wwal, 1301 A. H. and sailed from Jeddah for a Port Said. From Elexandria he took another boat for Constantinople. He arrived there on the 5th Jamadiul Oola and was graci­ously received by the Sultan’s personal staff, and taken to the royal guest house. Several dignitaries and U/ema visited him every day. The Sultan received him warmly, showered him with gifts and favours and conferred on, 4im the honour of Nishan-e-Majeedi and the rank of Paya-e-Haramain Sharifain (Pillar of the two noble Harams). The Shaikhul

Islam also met him warmly and conferred on him the Sanad-e-Raoos (certificate declaring him as a dean). The Sultan offered financial aid for the Madrasa but the Maulana declined this gracious offer on the plea that it would deprive the Muslims of the Indian sub-continent, who were supporting the institution, of the opportunity to make provision for themselves in the Hereafter. One day the Maulana’s nephew, . Maulana Badrul Islam accompanied him to the palace. The Sultan said that he would like Maulana Badrul Islam to stay with him and take charge of Hamidia library at Yildiz Palace. Maulana Badr continued to serve the Sultan loyally and was with him at the time he was deposed. ./ It was a great day for the Madrasa when the Maulana came back to Mecca. Governor Usman Noori Pasha was prominent among those who had turned out to welcome him. The Governor embraced him warmly and asked that the earlier misunderstanding be forgotten. ZUBAIDA CANAL: ~ Zubaida, the wife of the Abbasid Khalifa Haroon Rashid had built a canal which supplied water to the parched land of Mecca. It had become dilapidated- and ­ needed extensive repairs. Shortage of water had become a chronic problem and a cause of great inconvenience to the people. It was through the Maulana’s efforts that a committee was formed with the assistance of Seth Abdul Wahid, an Indian, for renovation. of the canal. The concurrence of the Government was obtained’ for this project and a committee was set up for raising funds. The Seth,

who made a very. handsome contribution, was appointed as the treasurer. The Maulana selected his eminent pupil, MaulanaShaikh Abdur Rahman Siraj, the Shaikhul Ulema. or Mecca, as its president, while he himself acted as its, vice president. Praise be to Allah, this ambitious project was successfully completed through. their efforts. THIRD VISIr TO CONSTANTINOPLE: The Maulana after his return to Mecca from Constan­tinople had maintained regular correspondence with Khairuddin Pasha, Ali Bey, the Shaikhul Islam and other high officials. On occasions he also corresponded directly with the Sultan, regarding affairs of great moment. But old age had come upon him and his eyesight failed him in 1303 A. H. He was unable to follow his regular pur­suits. When the report of his condition reached the Sultan; he invited him to come to Constantinople. The Maulana found it hard. to undertake a journey at that time, but in deference to the Sultan’s wishes he left Mecca in Shaban 1304 A.H. and reached Constantinople on the 2nd Ramadhan. Molvi Abdullah, his pupil and one of his companions on this journey, acted as. his secretary. According to his account. the Sultan accorded hiin a gracious welcome and told him that he had. arraang~ ed’ for a board of doctors to examine him the next day. The doctors examined his eyes. and said that he would have’ to undergo surgery for cataract, and God willing, he would be cured. They, however, decided to defer surgery by two months as the eyes were not until then ripe for it. The Sultan had also expressed the wish that the Maulana should,live with him in the. Capital. The Maulana

made an ap0lo-gy to the Sultan and said : “Having left my home and my kith and kin I have sought Al1ah’>s shelter and cast myself at His doorsteps. If I spend my remaining days here and die at the doorsteps of the Sultan ‘how shaUl face my Lord on the Day of Judgement.” The Maulana found his stay at Constantinople this time wearisome and a burden on his spirit. He wanted to spend every minute of the time that was left to him, in the Haram. Patients in those days had not developed confidence in surgery. The Maulana had some fears and did not consent to the proposed treatment. The Sultan wished to be kind to him and did not insist. The Maulana, by the leave of the Sultan, returned ‘to Mecca in the month of Dhiqada. The next year however, he under­ went surgery at Mecca, but it proved unsuccessful, and he lost his sight totally. The Maulana did not have any children. He wanted that the affairs of the Madarasa should repose in ‘good hands when he was gone. He had therefore sent for Maulana Mohammad Saeed, the grandson of his elder brother, Maulana Hakim AU Akbar, from India, Maulana Saeed, then a child, bad been sent to a mission school in Ambala (India) by his fahter.Thisnews upset the Maulana, and he wrote a firm letter to his father asking that the child should come to live with him at Mecca. ‘MaulanaSaeed was twelve years old when he came to Mecca and he was brought up and educated by the Maulana. Hazrat Haji Imdad~\1ahand the Maulana both, took great pains in his education. They wanted him to ‘serve the centre .of l’slam .and the Madrasa.

Maulana Saeed in his time more than fulfilled their ex­pectations.

THE BUILDINGS OF THE MADRASA : Ii II I The Madrasa. on the holy land of Baram is the major good work of his lifetime, a work of lasting merit. It is a distinctive feature of this Madrasa that it has its own complex of buildings which house all the depart­ments of the institution. Most of the buildings which had t:>een planned for specific purposes, were completed during his lifetime. .

(a) The first building was constructed with the funds donated by the late Saulat-un-Nisa Begam of Cal­cutta. The Madrasa, and this building was named after this benefactress. It contains five halls, three rooms a large courtyard and other adj­ uncts.

(b) Darul Iqama (hostel) was the second building which was constructed in 1293 A.H. It was th­rough the generosity of Mr. Wajid Husain of Patna (India). that this hostel was built. It can accommodate fifty students. The Madrasa pro­vides free board and lodging to the students.

(c) Masjid-e-Madrasa. The Mosque is the sole ex­ample of Moghal architecture in Holy .land. It also has an historical significance. There was a building in the courtyard of the Haram, near the Zamzams spring, which housed the Royal Library. It was an obstruction for the pilgrims, parti’culady a.t prayer time. It was demolished

at the suggestion of Us man Nuri Pasha, Governor of the Hejaz. It was proposed that the material of the demolished building be auctioned. The Maulana was upset by this proposal, as this material, having been a part of the Haram, .was hallowed. There was no knowing where and for what purpose it might be used by the purchaser. He could not reconcile himself to this situation, which he regarded as sacrilegous. The Maulana requested the Governor to release the material to him for the purpose of buiiding a mosque. with it. The Governor agreed and the material was purchased for Rupees one thousand five hundred. The construction of the mosque with this material was started in 1301 A.H. The local masons did not know the technique of “uilding domes. Luckily a few masons from Panipat happened’ to be in the Hejaz that Haj season. They offered to build the domes. The mosque was eompleted in. 1304 A.H. An immigrant from Herat (Afghanistan) who was a scholar and calligraphist, and who was deeply attached to the Maulana, composed an historical epigram and wrote it in his own hand on the facade of the arch.

This mosque is a beautiful sight, The like of which the eyes will not see. ‘Khana-e-Rah­mat’*. tens its year Say rahmat-ullah+ + upon its builder.

* Khana-e-Rahmat means house of mercy. It also anudes. to Maulana’s name Rahmatullah. The dat~ is calculated by adding the nume­rical value of each letter of the words” Kbana-e;Rahmat.” ++ Rahmatullah means Allah’s mercy. There is again an aIlusion here.

The Maulana’s lecturesJU ‘the Masjid..e-Haram attracted a large number of people. The names of some of the eminent Ulema who were his pupils in Madrasa Masjid-e­Haram and in the Mardras Saulatiya is given in Appendix ‘A’. The Maulana also started classes in the art of the recitation df the Holy Quran. It had been neglected in the past. The art was revived in Pakistan and India by his pupils who established several institutions in different places. The Madrasa has continued to serve zealously the cause of Islam and religious Education. A list of some of the old students of this institution who achieved promi­nence in life is given in Appendix ‘B’. The Maulanapassed away on 22nd Ramadhan 1308 A.H. He was 75 years of age. His services were meri­torious and his career honourable. This noble Mujahid had often wished to. die and be buried in the holy land. Allah granted his wish and he was buried in the Jannatul Ma’/at graveyard at Mecca near the tombs of Khadijatul Kubra, Allah ,be ,pleased with her, and other saints and ‘shaheeds. May Allah’s rahmat be on Rahmat-ullah.

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